बुरे वक्त की कसौटी पर रिश्तों की पहचान
संपादकीय@हरेश पंवार 20 जनवरी2026
*बुरे वक्त की कसौटी पर रिश्तों की पहचान*
जीवन के सफ़र में सुख-दुःख का आना-जाना स्वाभाविक है। जब समय अनुकूल होता है, सफलता कदम चूम रही होती है, तब हमारे चारों ओर लोगों की भीड़ जमा हो जाती है। हर कोई मित्र, शुभचिंतक और हितैषी बनने की होड़ में दिखाई देता है। मुस्कान, तारीफ और अपनत्व के शब्द इतने सहज बहने लगते हैं कि व्यक्ति को लगने लगता है—शायद यही जीवन का स्थायी सच है। लेकिन यह भ्रम अधिक समय तक टिकता नहीं। जैसे ही जीवन में कोई आर्थिक, मानसिक या शारीरिक संकट आता है, वैसे ही वही भीड़ छंटने लगती है। तब पता चलता है कि अच्छे वक्त की चमक में रिश्तों की असलियत छिपी हुई थी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
प्रायः देखा गया है कि ज़रूरत के समय लोगों के पास बहानों की कोई कमी नहीं होती। “अभी मेरी हालत ठीक नहीं है”, “मैं खुद परेशान हूं”, “थोड़ा समय दो” जैसे वाक्य रिश्तों के असली चेहरे को उजागर कर देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस समय व्यक्ति को मदद न मिलने का उतना दुख नहीं होता, जितना उन लोगों की बेरुखी से होता है जिन्हें वह अपना समझता था। संकट की घड़ी में इंसान पहले से ही मानसिक रूप से कमजोर होता है। ऐसे में सहानुभूति, दो शब्द की ढ़ाढ़स और थोड़ा साथ भी बहुत बड़ी राहत बन सकता है, लेकिन जब वही ‘अपने’ पीठ फेर लें, तो पीड़ा और गहरी हो जाती है।
दुखद विडंबना यह है कि कई बार मदद करने के बजाय लोग व्यक्ति की कमियों को गिनाने लगते हैं। “तुमने पहले ऐसा किया होता तो आज ये दिन न आते”, “मैंने पहले ही कहा था” जैसे वाक्य घावों पर नमक छिड़कने का काम करते हैं। यह व्यवहार केवल संवेदनहीनता नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के पतन का संकेत है। संकट के समय किसी को उपदेश नहीं, बल्कि सहारे की जरूरत होती है। लेकिन समाज में सहारा देने वालों की संख्या घटती जा रही है और निर्णय सुनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
हालांकि, जीवन का यही कठोर सत्य व्यक्ति को भीतर से मजबूत भी बनाता है। जब अपने ही साथ छोड़ देते हैं, तब इंसान को अपनी आत्मशक्ति का अहसास होता है। वह समझता है कि हर हाथ मिलाने वाला दोस्त नहीं होता और हर मीठी बात करने वाला अपना नहीं होता। बुरा वक्त एक कठोर शिक्षक की तरह हमें यह सिखा देता है कि रिश्ते शब्दों से नहीं, कर्मों से पहचाने जाते हैं। जो व्यक्ति संकट में भी साथ खड़ा रहे, वही वास्तव में अपना होता है; बाकी सब परिस्थितिजन्य परिचित होते हैं।
यह भी सच है कि हर व्यक्ति से हर समय मदद की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं। हर किसी की अपनी सीमाएं और मजबूरियां होती हैं। लेकिन कम से कम ईमानदारी और संवेदनशीलता तो होनी चाहिए। साफ शब्दों में स्थिति बताना और नैतिक समर्थन देना भी एक प्रकार की मदद ही है। चुपचाप दूरी बना लेना या झूठे बहाने गढ़ लेना रिश्तों में स्थायी दरार पैदा कर देता है।
समाज में यह धारणा भी प्रचलित हो गई है कि संकट में फंसा व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदार है। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी है। जीवन में परिस्थितियाँ किसी पर भी अचानक आ सकती हैं। आज जो सुरक्षित है, कल वही असहाय हो सकता है। इसलिए दूसरों के दुख को देखकर आत्मसंतोष महसूस करने के बजाय करुणा दिखाना ही एक स्वस्थ समाज की पहचान है।
इस पूरे अनुभव से सबसे बड़ा सबक यह है कि हमें दूसरों की प्रतिक्रिया पर अपना आत्मबल निर्भर नहीं करना चाहिए। यदि हम यह अपेक्षा लेकर चलेंगे कि हर कोई हमारे लिए खड़ा होगा, तो निराशा निश्चित है। इसके बजाय हमें खुद को इतना सक्षम और मजबूत बनाना चाहिए कि न किसी के बहानों से हमारा रास्ता रुके और न किसी के तानों से हमारा हौसला टूटे। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक भी होनी चाहिए।
साथ ही, हमें यह भी आत्ममंथन करना चाहिए कि जब कोई और संकट में हो, तो हमारा व्यवहार कैसा रहता है। क्या हम भी बहानों की आड़ लेते हैं, या फिर यथासंभव सहारा देने का प्रयास करते हैं? समाज तभी बेहतर बनेगा, जब हर व्यक्ति अपने स्तर पर संवेदनशीलता और जिम्मेदारी निभाएगा।
अंततः यह कहा जा सकता है कि बुरा वक्त रिश्तों को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सच्चाई उजागर करने के लिए आता है। यह हमें सिखाता है कि भीड़ में अकेले कैसे खड़ा होना है और अकेलेपन में अपनी ताकत कैसे पहचाननी है। जो व्यक्ति इस सीख को आत्मसात कर लेता है, वही जीवन की हर चुनौती का सामना आत्मविश्वास और गरिमा के साथ कर पाता है। यही जीवन का यथार्थ है और यही उसकी सबसे बड़ी सीख भी।
Comments
Post a Comment