राष्ट्रीय उत्सवों का फीका पड़ता रंग : औपचारिकताओं की भेंट चढ़ती सांस्कृतिक चेतना

संपादकीय@हरेश पंवार,25जनवरी 2026

*राष्ट्रीय उत्सवों का फीका पड़ता रंग : औपचारिकताओं की भेंट चढ़ती सांस्कृतिक* चेतना
कभी राष्ट्रीय उत्सव केवल तिथि नहीं होते थे, वे पूरे समाज की चेतना के उत्सव हुआ करते थे। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या अन्य राष्ट्रीय पर्व आने से पहले ही स्कूलों, मोहल्लों और गांवों में हलचल शुरू हो जाती थी। स्कूलों के मैदानों में पीटी परेड की गूंज, बच्चों के कदमों की ताल, ढोल-नगाड़ों की थाप और देशभक्ति गीतों की मधुर धुन वातावरण को राष्ट्रप्रेम से भर देती थी। बच्चे परेड, जिमनास्टिक, नाटक, गीत, वादन और भाषण के लिए पूरे मन से तैयारी करते थे। किसी की आवाज में दम होता, तो उसे मंच मिलता; कोई चूक जाता, तो वह अगली बार और बेहतर करने का संकल्प लेकर लौटता था। यही प्रक्रिया बच्चों के आत्मविश्वास, अनुशासन और संस्कारों की नींव रखती थी। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज वही राष्ट्रीय उत्सव औपचारिकताओं तक सिमटते जा रहे हैं। तैयारी की जगह दिखावा, अभ्यास की जगह जल्दबाजी और संस्कार की जगह स्क्रीन ने ले ली है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर अब रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर ठुमके लगाना ही मानो पर्याप्त समझ लिया गया है। बच्चों की रचनात्मकता को मंच देने की बजाय सोशल मीडिया पर रील बनाने की होड़ ने उन्हें जकड़ लिया है। फिल्मी और कई बार फूहड़, अभद्र शब्दों वाले क्षेत्रीय गीतों पर थिरकते बच्चों को देखकर यह सवाल उठता है कि क्या यही हमारे राष्ट्र का भविष्य है?

मोबाइल स्क्रीन पर अंगुली चलाते-चलाते “रील स्क्रॉल–रील स्क्रॉल” में डूबी पीढ़ी को न तो गीतों के अर्थ से सरोकार है, न ही संस्कृति के मूल भाव से। कभी बच्चे देशभक्ति गीतों का रियाज़ करते थे, सुर-ताल साधते थे, मंच पर खड़े होकर अपनी तुतलाती आवाज में भी जब “सारे जहाँ से अच्छा” गाते थे, तो सुनने वालों की आंखें भर आती थीं। आज वह मासूम तुतलाहट, वह सच्चा भाव, वह लगन कहीं खोती जा रही है।

राष्ट्रीय उत्सवों की खुशबू सिर्फ कार्यक्रमों तक सीमित नहीं थी, वह घर-आंगन तक फैलती थी। स्कूल में बंटने वाले पतासों के लिए बच्चे एक बार नहीं, बार-बार लाइन में लगने की कोशिश करते थे। घरों में परंपरागत पकवान—गुलगुले, पकोड़े, खीर, हलवा—बनते थे। सीमित साधनों में भी उत्सव का आनंद कहीं अधिक गहरा होता था। आज बाजार में तरह-तरह की पैकिंग वाली मिठाइयों की भरमार है, फिर भी बच्चे उनसे ऊब चुके हैं। सवाल यह नहीं कि मिठाई बदल गई, सवाल यह है कि स्वाद के साथ भाव भी बदल गया।

यह विडंबना है कि राष्ट्रीय पर्व अब केवल सेल्फी, फोटो और औपचारिक भाषणों तक सिमट गए हैं। स्कूलों में ढोल-नगाड़ों की जगह डीजे ने ले ली है। देशभक्ति गीतों की जगह तेज आवाज़ वाला म्यूजिक सिस्टम है, जिस पर युवक-युवतियाँ अभिनय करते दिखते हैं। केवल एक दिन का अभिनय, एक झंडारोहण और कुछ फोटो हमारी सांस्कृतिक विरासत को नहीं बचा सकते। संस्कृति निरंतर अभ्यास, संवाद और सहभागिता से जीवित रहती है।

आज आवश्यकता है सांस्कृतिक पुनर्जागरण की। जिस तरह स्वामी दयानंद सरस्वती ने “वेदों की ओर लौटो” का आह्वान किया था, उसी तरह हमें फिर कहना होगा—अपनी संस्कृति की ओर लौटो। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिकता से मुंह मोड़ लिया जाए, बल्कि यह कि आधुनिक साधनों का उपयोग अपनी जड़ों को मजबूत करने के लिए किया जाए। सोशल मीडिया पर रील बने, लेकिन देशभक्ति गीतों, लोककला, नाटक और सृजनात्मक प्रस्तुतियों की रील बने। मंच फिर से बच्चों की प्रतिभा को निखारने का माध्यम बने, न कि केवल शोर का।

स्कूलों की भूमिका यहां सबसे अहम है। राष्ट्रीय उत्सवों को केवल रस्म अदायगी न बनाकर उन्हें शिक्षण और संस्कार का अवसर बनाया जाए। बच्चों को बोलने, गाने, अभिनय करने, वाद्य बजाने और समूह में काम करने का मौका मिले। उनकी मासूम कोशिशों को सराहा जाए, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें।

समाज और अभिभावकों को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हम अपने बच्चों को केवल उपभोक्ता और दर्शक बना रहे हैं, या उन्हें रचनाकार बनने का अवसर दे रहे हैं? राष्ट्रीय उत्सव तभी सार्थक होंगे, जब वे बच्चों के मन में राष्ट्र के प्रति सम्मान, जिम्मेदारी और गर्व का भाव जगाएँगे।

राष्ट्रीय पर्व किसी एक दिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी हैं। यदि यह कड़ी कमजोर हुई, तो केवल उत्सव ही नहीं, हमारी पहचान भी फीकी पड़ जाएगी। इसलिए जरूरी है कि हम फिर से उन मधुर आवाज़ों, सच्चे प्रयासों और सामूहिक उल्लास की ओर लौटें—जहां राष्ट्रीय उत्सव दिल से मनाए जाते थे, केवल निभाए नहीं जाते थे।

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