गौ सेवा या गौ के नाम पर कारोबार? — आस्था, अनुदान और आवारा सच
संपादकीय@हरेश पंवार 19/01/2026
*गौ सेवा या गौ के नाम पर कारोबार? — आस्था, अनुदान और आवारा सच*
गाय भारतीय संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आस्था का केंद्र रही है। उसे माता कहकर पूजने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी का भी प्रतीक रही है। लेकिन आज यह प्रश्न पूरे समाज के सामने खड़ा है कि क्या वास्तव में हम गौ सेवा कर रहे हैं, या गौ के नाम पर एक संगठित गोरखधंधा फल-फूल रहा है? सड़कों पर कचरा खाती, पॉलिथीन निगलती, दुर्घटनाओं का शिकार होती गायें और दूसरी ओर गौशालाओं में हवन-यज्ञ, गौ कथा, सरकारी अनुदान और चंदे का उत्सव — यह विरोधाभास हमारी संवेदनाओं पर सीधा प्रहार करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
वर्तमान समय में “गौ रक्षक”, “गौ सेवा समिति”, “गौ उपचार केंद्र” जैसे नामों से अनेक संगठन खड़े हो गए हैं। गांव-गांव में वास्तविक गौशालाओं की जगह अब प्रतीकात्मक “गौ उपचार केंद्र” खुलने का चलन बढ़ा है। दो-चार जख्मी या वृद्ध गायों को सामने बांधकर सहानुभूति जुटाई जाती है, फोटो खिंचते हैं, वीडियो बनते हैं और फिर चंदे व सरकारी अनुदान का रास्ता खुल जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि गाय का वास्तविक निवाला रसूखदार निगल रहे हैं और गाय खुद सड़कों पर भटक रही है।
धार्मिक परंपराओं में गोदान की रीति रही है। कभी यह सचमुच दूध देने वाली गाय या बछड़ी दान करने का प्रतीक था, ताकि सेवा और पालन का दायित्व आगे बढ़े। लेकिन आज गोदान चांदी की चमचमाती गाय की मूर्ति और नकद लेन-देन तक सिमट गया है। कर्मकांड के दौरान रस्सी, परात, बाल्टी सब कुछ प्रतीकात्मक हो गया है, असली गाय कहीं नहीं। और यदि कोई दबाव में आकर जीवित गाय दान कर भी दे, तो कुछ दिन बाद वही गाय सड़कों पर छोड़ दी जाती है। परिणाम वही — लाठी, भूख, कचरा और अपमान। गोदान के नाम पर धर्म का निर्वाह हो गया, लेकिन गाय का भविष्य अंधकारमय रह गया।
विडंबना यह है कि गौशालाओं में हवन-यज्ञ होते हैं, हजारों गायों के नाम पर अनुदान आता है, प्रसाद में खीर बंटती है, लेकिन दूध थैली-पैक बाजार से आता है। गौमूत्र, पंचगव्य और जैविक उत्पाद गौशालाओं से बिकते हैं, पर गायों के लिए पर्याप्त चारा, चिकित्सा और आश्रय का अभाव बना रहता है। यह कैसी गौ सेवा है, जहां उत्पाद तो “गौ आधारित” हैं, पर गाय खुद व्यवस्था से बाहर है?
सरकारी स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। डबल इंजन सरकारों द्वारा गौ संरक्षण के नाम पर साल में दो-दो किस्तें गौशालाओं और उपचार केंद्रों को दी जा रही हैं। मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर दान की बाढ़ आ जाती है। लेकिन सड़कों, बाजारों और खेतों में घूम रहे आवारा गोवंश का कोई धनी-धोरी नहीं। विशेषकर कृत्रिम गर्भाधान से उत्पन्न हाइब्रिड नस्लें — जर्सी, होल्सटीन, मिश्रित सांड — जिन्हें न तो गौशालाएं अपनाना चाहती हैं और न ही कोई नीति उन्हें समाहित करती है।
यही आवारा गोवंश किसानों की फसलों को चौपट कर रहा है, सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रहा है और कई बार निर्दोष लोगों की अकाल मृत्यु का कारण बनता है। दर्दनाक तथ्य यह है कि ऐसी मौतों को “प्राकृतिक” या “दुर्घटना” मानकर बीमा कंपनियां क्लेम तक नहीं देतीं। न नीति है, न समाधान और न ही साहसिक निर्णय लेने की इच्छाशक्ति।
स्थिति और भी विचित्र तब हो जाती है जब कोई किसान या पशुपालक अपने पशुधन को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाता है। तथाकथित गौ रक्षक दल रास्ते में आतंक की तरह टूट पड़ते हैं, वाहन रोके जाते हैं, पुलिस कार्रवाई होती है। जबकि बाजारों और हाईवे पर घूमती आवारा गायों पर कोई हाथ डालने को तैयार नहीं। यह चयनात्मक “गौ भक्ति” दरअसल सेवा नहीं, बल्कि राजनीति और भय का उपकरण बन चुकी है।
यह कहना भी अन्याय होगा कि हर जगह स्थिति एक जैसी है। कुछ गौशालाएं और उपचार केंद्र ईमानदारी से सेवा कर रहे हैं। वहां इलाज, चारा और संरक्षण का वास्तविक प्रयास दिखाई देता है। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र भी हैं, जहां भगवा गमछा, माला, गो-एंबुलेंस पर सायरन और बड़े-बड़े बोर्डों के पीछे चुपचाप कारोबार चल रहा है। यह एक ऐसा सच है, जिस पर सरकारी मशीनरी की मौन सहमति का संदेह गहराता जा रहा है।
अब समय आ गया है कि गाय को राजनीति, आडंबर और मुनाफे से बाहर निकालकर वास्तविक सहानुभूति और न्याय दिया जाए। गौ सेवा का अर्थ केवल अनुदान लेना, हवन कराना या पोस्टर लगाना नहीं, बल्कि गाय के जीवन, सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी लेना है। पारदर्शिता, सामाजिक ऑडिट, अनुदान के उपयोग की सख्त निगरानी और आवारा गोवंश के लिए ठोस नीति — यही समाधान की दिशा है। आवश्यकता पड़े तो स्टिंग ऑपरेशन और निष्पक्ष जांच से इस गोरखधंधे का पर्दाफाश होना चाहिए।
यदि हम सचमुच अपनी वैदिक संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मानवीय मूल्यों को बचाना चाहते हैं, तो गाय को केवल प्रतीक नहीं, जीवित जिम्मेदारी मानना होगा। अन्यथा इतिहास यही लिखेगा कि गाय बेचारी यूं ही बदनाम हुई और उसके नाम पर इंसान ने अपना स्वार्थ साध लिया।
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