प्रतिभा सम्मान के बहाने तबादला सांठगांठ ?

संपादकीय
10 अक्टूबर 2025
"प्रतिभा सम्मान के  बहाने तबादला सांठगांठ ?"
समाज की असली ताकत उसके कंधों पर पसीना बहाने वाले मजदूरों, खेतों में अनाज उपजाने वाले किसानों और दस्तकारों से मापी जाती है – लेकिन अफसोस! हमारे समाज के ठेकेदारों ने इसे सरकारी नौकरी वालों की चमचमाती पोस्टिंग और मंच पर पढ़े जाने वाले भाषणों से जोड़ दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलताहै।

झुंझुनूं में होने जा रहा "प्रतिभा सम्मान समारोह" दरअसल समाज की प्रतिभाओं का नहीं, बल्कि तबादला रोकने वालों का सम्मान ज्यादा नजर आता है। दीपावली की छुट्टियों में यह तथाकथित "महाकुंभ" असल में समाज के कुछ मौसमी नेताओं और मोटिवेशन गुरुओं का सेल्फ़ी महोत्सव है, जहाँ गरीब तबका केवल तालियां बजाने और भीड़ पूरी करने के लिए बुलाया जाता है।

सोचने वाली बात है कि जब खेतड़ी  के मेघवाल समाज के 10 प्रिंसिपल्स को एक झटके में दूर-दराज जिलों में धकेल दिया गया, तब यही तथाकथित संगठन चुप क्यों थे? जब कमेरा वर्ग का बच्चा फीस और किताबों के लिए जूझता है, तब ये नेता कहाँ गायब रहते हैं? सवाल यह उत्पन्न होता है इसी समाज की जब एक महिला बीमार पति के लिए 11 सालों से दर-दर भटक रही थी बच्चों की पढ़ाई और बुढ़ी सास मां की दवाई के लिए कहां-कहां दर-दर भटकी और इसी समाज के नुमाइशों को उनका दर्द तक नहीं समझा । नस सरकारी योजनाओं का लाभ समाज की किसी तरीके की मदद नहीं मिलने की खबर पर मीडिया के सामने लाचार हाथों ने मदद की गुहार की  लेकिन अफसोस एक पाई तक रुपए देने की तथाकथित समाज के ठेकेदारों की ओर से सहायता देने की सूचना नहीं आई अन्य समाज के लोगों द्वारा मदद करने पर चुप्पी साध लेना। क्या यही सामाजिक आपसी भाईचारा है? आज बड़े लोगों की अगवानी में चंदे की लंबी-लंबी लिस्ट जारी हो रही , सवाल तो यह भी बनता है कि क्या किसी पीड़ित परिवार की मदद की भी मुहिम में ऐसी लिस्ट जारी हुई है।
लेकिन जैसे ही "उपमुख्यमंत्री" या "बड़े अफसर" आने की घोषणा होती है, तो अचानक समाज की एकता, भाईचारे और सम्मान की दुहाई देने लगते हैं। आखिर क्यों? जवाब साफ है – भीड़ चाहिए... ताकि सत्ता के गलियारों में अपनी गली निकल सके।

यहां सवाल यह उत्पन्न होता है कि समाज का असली चेहरा कौन? आज भी समाज का 84% तबका ईंट-गारे, खेत-खलियान, मजदूरी और दस्तकारी में अपनी किस्मत गढ़ रहा है। लेकिन इन मेहनतकश हाथों का न तो मंच पर नाम लिया जाता है और न ही उन्हें "प्रतिभा" की श्रेणी में रखा जाता है।
प्रतिभा केवल वही मानी जाती है, जो 16% आरक्षण के सहारे मलाई खा रहे हैं और अब अपने तबादले बचाने के लिए समाज का सहारा ले रहे हैं।

मंच पर बुलाए जाने वाले मोटिवेशनल स्पीकर और तथाकथित गुरुओं से एक सवाल –
"जब हमारे बच्चे कॉलेज-यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे, फीस और गाइडेंस के लिए दर-दर भटक रहे थे, तब आप कहाँ थे? आज जब बच्चे अपनी राह चुन चुके हैं, तो किस बात का मोटिवेशन और किस बात का मार्गदर्शन?"
यह तो वैसा ही है जैसे होली त्योहार बीत जाने के बाद बिड़कुले(गोबर के कंडे) थापना।

सच में समाज को आईना दिखाने की ज़रूरत है। आज जरूरत है समाज को यह समझाने की कि ये "प्रतिभा सम्मान" और "सम्मेलन" असल में सम्मान की आड़ में अपने रिश्तेदारों के ट्रांसफर रुकवाने की जुगाड़ भर हैं।
अगर ये नेता सचमुच ईमानदार होते, तो समाज की दस्तकारी, श्रमजीवी वर्ग और गरीब विद्यार्थियों के लिए ठोस कदम उठाते। लेकिन इनके लिए समाज सिर्फ फोटो खिंचाने, माला पहनने और नारे लगाने का मंच है।

समाज के मेहनतकश तबके को अब इन मौसमी नेताओं की पोल समझनी होगी। यह समय है गद्दारी नहीं, बल्कि वफादारी दिखाने का। असली वफादारी उन्हीं के साथ है जो 365 दिन समाज की समस्याओं पर संघर्ष करते हैं, न कि उन नेताओं के साथ जो सिर्फ मंच पर चमचागिरी कर अपनी राजनीतिक-निजी गली निकालने आते हैं।

समाज को तय करना होगा कि वह भीड़ बनकर तालियां बजाएगा या सचमुच ताकत बनकर अपनी असली पहचान गढ़ेगा।

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