वस्तु नहीं, दृष्टि तय करती है दिशा
संपादकीय@7जनवरी 2026
*वस्तु नहीं, दृष्टि तय करती है दिशा*
“अच्छाई और बुराई वस्तु में नहीं, कर्म में होती है—कोई बांस से तीर बनाता है तो कोई उसी से बांसुरी।”
यह पंक्ति केवल एक सुंदर कथन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के नैतिक दर्शन का सार है। यह हमें बताती है कि किसी भी वस्तु, संसाधन या शक्ति का मूल्य उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके उपयोग की नीयत और उद्देश्य में छिपा होता है। यही विचार आज के समाज, राजनीति, शिक्षा, तकनीक और संस्कृति—सभी क्षेत्रों में गहरे आत्ममंथन की मांग करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।।
इतिहास साक्षी है कि एक ही वस्तु ने मानवता को बचाया भी है और नष्ट भी किया है। आग से भोजन पकाया गया, जीवन सरल हुआ; उसी आग से युद्ध जले, सभ्यताएं राख हुईं।
परमाणु ऊर्जा से बिजली बनी, चिकित्सा में क्रांति आई; उसी ऊर्जा से हिरोशिमा-नागासाकी तबाह हुए। स्पष्ट है—वस्तु निर्दोष होती है, दोषी होता है उसका उपयोगकर्ता।
आज के समय में यह कथन और भी प्रासंगिक हो जाता है। तकनीक को ही देखिए। मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया—ये सभी साधन ज्ञान, संवाद और जागरूकता के अद्भुत माध्यम बन सकते हैं। लेकिन वही तकनीक अफवाह, नफरत, अश्लीलता और मानसिक गुलामी का औजार भी बन रही है। प्रश्न यह नहीं है कि मोबाइल अच्छा है या बुरा, प्रश्न यह है कि हम उससे तीर बना रहे हैं या बांसुरी।
यही बात राजनीति और सत्ता पर भी लागू होती है। सत्ता अपने आप में न तो कल्याणकारी है, न विनाशकारी। सत्ता वह बांस है, जिससे कोई जनकल्याण की बांसुरी बजा सकता है—शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और समानता की धुन छेड़ सकता है; और कोई उसी सत्ता से दमन, भय और विभाजन के तीर चला सकता है। दुर्भाग्य यह है कि आज सत्ता का उपयोग अक्सर तीर की तरह अधिक और बांसुरी की तरह कम किया जा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था भी इस विचार की कसौटी पर खरी उतरती है। शिक्षा ज्ञान का साधन है, लेकिन जब वही शिक्षा केवल अंक, डिग्री और प्रतियोगिता का हथियार बन जाए, तो वह समाज को संवेदनशील नहीं, स्वार्थी बनाती है। शिक्षक वही बांस रखते हैं—लेकिन कोई उससे चरित्र निर्माण की बांसुरी बनाता है, तो कोई केवल परीक्षा पास कराने का तीर। आज आवश्यकता है कि शिक्षा को कर्म प्रधान बनाया जाए, जहां ज्ञान का प्रयोग मानवता के लिए हो।
धर्म और आस्था भी इसी श्रेणी में आते हैं। धर्म मूलतः नैतिकता, करुणा और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाता है। लेकिन जब वही धर्म सत्ता, राजनीति और हिंसा का औजार बन जाता है, तो बांसुरी की जगह तीर चलने लगते हैं। तब धर्म मानव को जोड़ने की बजाय तोड़ने लगता है। यह दोष धर्म का नहीं, धर्म के नाम पर किए गए कर्मों का है।
समाज में अक्सर हम वस्तुओं, प्रतीकों और व्यक्तियों को दोषी ठहराने में जल्दी कर देते हैं, लेकिन अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेने से बचते हैं। हम कहते हैं—“युवा बिगड़ गए हैं”, “तकनीक खराब है”, “समय ही ऐसा है।” पर सच यह है कि समय वही होता है, जैसा हम उसे बनाते हैं। युवा वही सीखते हैं, जो हम सिखाते हैं। तकनीक वही करती है, जो हम उससे करवाते हैं।
इस विचार का सबसे बड़ा संदेश आत्ममूल्यांकन है। हमें बार-बार खुद से पूछना चाहिए—हम अपने हाथ में आई शक्ति, अवसर और संसाधनों से क्या बना रहे हैं? क्या हम संवाद की बांसुरी बजा रहे हैं या घृणा के तीर गढ़ रहे हैं? क्या हम अपने शब्दों से मरहम लगा रहे हैं या जख्म दे रहे हैं?
आज जब समाज में असहिष्णुता, कटुता और जल्दबाजी बढ़ रही है, तब इस कथन की रोशनी में रुककर सोचना जरूरी है। अच्छाई और बुराई बाहर नहीं, हमारे भीतर जन्म लेती है। वही बांस किसी के हाथ में संगीत बन जाता है और किसी के हाथ में हिंसा। फर्क हाथ का नहीं, मन का है।
अंततः, यह संपादकीय किसी वस्तु, तकनीक या व्यवस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि विवेक के पक्ष में है। यदि हमारे कर्म मानवीय, संवेदनशील और उत्तरदायी होंगे, तो साधन अपने आप साध्य बन जाएंगे। लेकिन यदि नीयत दूषित होगी, तो सबसे पवित्र वस्तु भी हथियार बन जाएगी।
समाज को आज तीर नहीं, बांसुरी चाहिए—ऐसी बांसुरी, जो संवाद, करुणा, न्याय और शांति की धुन बजा सके। और यह तभी संभव है, जब हम यह स्वीकार करें कि अच्छाई और बुराई हमारे कर्मों में बसती है, वस्तुओं में नहीं।
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