सरकारी नौकरी : विवाह मंडप का नया देवता
संपादकीय
31 अगस्त 2025
“सरकारी नौकरी : विवाह मंडप का नया देवता”
आजकल शादी-ब्याह का पहला सवाल होता है—“बेटा सरकारी सर्विस में है या नहीं?” बाकी योग्यता, संस्कार, मेहनत, हुनर—सबकी औकात धरी रह जाती है। मानो विवाह का मंडप अब सरकारी नौकरी का दरबार बन चुका है और वर-वधू तो बस मूर्तियाँ हैं, जिन्हें बोली लगाने वाले समाज के ठेकेदार नीलाम करते फिरते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
लड़का पढ़ाई में तेज है, लेकिन घर की जिम्मेदारियों के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में टिक नहीं पा रहा, पार्ट-टाइम नौकरी करता है, मेहनत से घर चला रहा है—यह अब विवाह बाजार की योग्यता नहीं रही। वहीं लड़की घर बैठे स्कॉलरशिप से डिग्री पर डिग्री बटोर ले तो परिवार का मानो सीना चौड़ा हो जाता है। चाहे कॉलेज का गेट देखा हो या नहीं, डिग्री चमक रही है तो सपनों के दूल्हे कम से कम प्रोफेसर से नीचे नहीं सोचे जाते।
समाज की यह विडंबना है कि प्राइवेट जॉब, छोटा-मोटा धंधा, उद्यमिता या हस्तकला से जीवन चला रहे युवक रिश्तों के बाजार में ‘अयोग्य’ ठहराए जाते हैं। उधर, जो लड़का सरकारी नौकरी में घुस गया, उसके लिए दलालों की फौज सक्रिय हो जाती है। “रिश्ता कर ले भाई, वरना देर हो जाएगी”—यह सलाह मुफ्त में हर गली-नुक्कड़ से मिलने लगती है।
पहले समाज, रिश्तेदार और पड़ोसी रिश्तों की पहल करते थे। अब सबके हाथ कांपते हैं। रिश्ते करवाने की हिम्मत किसी में नहीं। मोबाइल, व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया बायोडाटा का नया अखाड़ा बन गए हैं। यहाँ रिश्ते भी ‘फॉरवर्ड’ होते हैं और टूटते भी ‘ब्लॉक’ कर देने से। नतीजा? विवाह मंडप से ज्यादा भीड़ अब कोर्ट-कचहरियों में दिखती है, जहाँ घरेलू विवाद और झगड़े अपना जलसा कर रहे हैं।
विडंबना यह भी है कि परिवार 10-15 लाख रुपए दलालों को देकर बच्चों की भर्ती कराने में तो पीछे नहीं हटता, पर यही पैसा बच्चे को व्यवसाय या स्टार्टअप में लगाने की बात आए तो “जोखिम” दिखता है। सरकारी नौकरी की इस अंधभक्ति ने युवाओं से उनका आत्मविश्वास छीन लिया है। मेहनत और उद्यमिता से बड़ा रिश्ता कोई नहीं, पर आज हर कोई सरकारी मुहर लगा जीवनसाथी चाहता है।
समाज को सोचना होगा—क्या विवाह का रिश्ता सचमुच सरकारी जॉब की नोटिस पर टिका रहेगा? क्या रिश्तों की नींव सिर्फ वेतन पर्ची पर रखी जाएगी? अगर ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में विवाह कोई पारिवारिक संस्था नहीं, बल्कि एक “सरकारी ठेका” बनकर रह जाएगा। और तब हम सबको मानना पड़ेगा कि हमने प्रेम, विश्वास और योग्यता को दरवाजे से बाहर धकेलकर रिश्ता दलालों और फाइलों के हवाले कर दिया।
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