शिक्षा विभाग का रात्रि चौपाल – होली के बाद बड़कुले थापने जैसा ढकोसला

संपादकीय
8 अगस्त 2025
 *रात्रि चौपाल – होली के बाद बड़कुले थापने जैसा ढकोसला* 
राजस्थान के शिक्षा विभाग की "रात्रि चौपाल" पहल सुनने में भले नई और रचनात्मक लगे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह महज़ दिखावा बनकर रह गई है। फोटो सेशन और औपचारिक भाषणों में बच्चों की असली शिक्षा कहीं गुम हो गई है। यह वही स्थिति है जैसे होली के बाद बड़कुले थापना — समय निकल चुका है, पर रस्म अदायगी जारी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

सच यह है कि शिक्षकों की बड़ी जमात की नियत में ही खोट है।  शिक्षक भर्ती परीक्षा क्वालिफाई करने के बाद उनमें से अधिकांश अपने आपको शिथिल कर लेते हैं। न वे नई शिक्षा पद्धतियों से अपडेट होना चाहते हैं, न ही खुद को सुधारने की इच्छा रखते हैं। अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिए प्राइवेट स्कूलों से प्रतिस्पर्धा का दिखावा करते हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के सामूहिक प्रयास से कोसों दूर हैं। 

इनका बहाना भी तैयार है — "हमारे पास तो गरीब तबके के बच्चे आते हैं, अभावग्रस्त वर्ग के बच्चे हैं, ये कमजोर हैं"। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि शिक्षा के असली उद्देश्य के खिलाफ है। शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत तो वहीं है, जहाँ सदियों से अंधेरा है, जहाँ लोगों के पुरखे भी शिक्षा से वंचित रहे हैं। इन्हीं बच्चों के साथ अगर शिक्षक गद्दारी करेंगे, तो यह केवल कर्तव्यहीनता नहीं, बल्कि नैतिक पतन है।

आज स्थिति यह है कि कई शिक्षक पढ़ाई से ज्यादा समय सोशल मीडिया पर, गपशप में, या सरकारी योजनाओं की काग़जी पालना में खपा रहे हैं। एक सरकारी स्कूल का दृश्य तो और भी चौंकाने वाला था — 8 शिक्षक, 18 बच्चे, और जब एक शिक्षिका से पूछा गया कि पढ़ाई क्यों नहीं हो रही तो जवाब मिला — "शाला दर्पण पर अटेंडेंस करने में पूरा दिन लग जाता है, पोर्टल धीमा चलता है"। यह सुनकर हंसी और दुख दोनों आए — इतने निकम्मे रवैये के साथ भला शिक्षा का बेड़ा किनारे कैसे लगेगा?

"रात्रि चौपाल" की आड़ में भी यही हो रहा है। आंकड़े बनाने और फाइलें भरने का खेल। जैसे भैंस को काकडे और सरकार को आंकड़े पूरे करने हो। एक बैठक में तो कार्रवाई रजिस्टर में तारीख लिख दी गई, और अतिथियों के नाम, बाकी प्रोसिडिंग का पन्ना खाली छोड़कर नीचे उपस्थित ग्रामीणों के हस्ताक्षर करवाए गए। जब रजिस्टर मेरी ओर बढ़ाया गया तो मैंने साफ कहा — यह तो सरेआम धोखेबाज़ी है। जिस गवर्नमेंट दस्तावेज़ में भी कूट रचना करने की आदत है, वह शिक्षक अपने छात्रों के साथ ईमानदारी कैसे कर सकता है?

यह न केवल शिक्षा के साथ विश्वासघात है, बल्कि कानूनन अपराध भी है, क्योंकि बैठक की कार्यवाही का रजिस्टर सरकारी और कानूनी दस्तावेज़ होता है। लेकिन अफ़सोस, "रात्रि चौपाल" में इन मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय चाय-बिस्किट और प्रशंसा के शब्दों में समय बर्बाद किया जाता है। 

अगर शिक्षा विभाग को वाकई बदलाव लाना है तो चौपालों के ढकोसले को बंद कर कक्षा में अध्यापक और किताब में ज्ञान लौटाना होगा। बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होना चाहिए। निकम्मे और कर्तव्यहीन शिक्षकों के खिलाफ सख़्त कार्रवाई हो, और हर बैठक की कार्रवाई, तय समय में समाधान और जवाबदेही के साथ हो।

अन्यथा, यह "रात्रि चौपाल" भी पहले की तमाम योजनाओं की तरह सरकारी फाइलों के कब्रिस्तान में दफ़न हो जाएगी, और हम बस भाषणों की रोशनी में भविष्य का अंधेरा बुनते रहेंगे।

"आज शिक्षा का हाल ऐसा हो गया है कि जैसे भैंस को काकड़ा और सरकार को आंकड़ा दिखाकर संतोष कर लिया जाए—हकीकत छुपाने की होड़ में भविष्य दांव पर लग रहा है।" आज हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और उपलब्धियों के लंबे-लंबे दावे किए जाते हैं। सरकारी रिपोर्टों में आंकड़े ऐसे चमकते हैं जैसे सब कुछ ठीक हो, लेकिन जमीनी सच्चाई इन कागज़ी दावों को खोखला साबित करती है। गांव-ढाणी के सरकारी स्कूलों में शिक्षक की कमी, जर्जर भवन, पुरानी पद्धतियों और घटिया गुणवत्ता की किताबें, यह सब आंकड़ों की चादर में ढकने की कोशिश की जाती है।

शिक्षा विभाग का रवैया ऐसा हो गया है कि जैसे सिर्फ फाइलों में काम निपटाना ही लक्ष्य हो। परीक्षा परिणाम सुधारने के नाम पर बच्चों को बिना पढ़ाए पास करना, नामांकन बढ़ाने के लिए फर्जी दाखिले करना, और सरकारी योजनाओं के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना—यह सब ‘विकास’ के नाम पर हो रहा है। इस मानसिकता ने शिक्षा को सेवा नहीं, बल्कि एक ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया है, जहां लक्ष्य सिर्फ रिपोर्ट में सफलता दिखाना है।

जमीनी हकीकत यह है कि कई स्कूलों में विज्ञान और गणित जैसे महत्वपूर्ण विषय पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक ही नहीं हैं। स्मार्ट क्लास की मशीनें धूल खा रही हैं, पुस्तकालय में किताबें बंद अलमारी में पड़ी हैं, और बच्चों को पढ़ाई से ज्यादा मिड-डे मील की थाली का इंतजार रहता है। इन हालात में जब भी कोई अधिकारी निरीक्षण के लिए आता है, तो स्कूल को ‘मेकअप’ करवा दिया जाता है—दीवारों पर पुताई, बच्चों को रटे-रटाए उत्तर और ‘नमस्ते सर’ के शोर से स्वागत।

विडंबना यह है कि यह सब जानते हुए भी अधिकारी और सरकार आंकड़ों के दम पर अपनी पीठ थपथपाते हैं। नतीजा यह होता है कि समस्याएं और गहरी होती जाती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए ईमानदारी, पारदर्शिता और वास्तविक मूल्यांकन जरूरी है।

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