"सब कुछ दो... पर शिक्षा मत दो!" — शिक्षा पर राजनीति का ताला
संपादकीय
8 अगस्त 2025
*सब कुछ दो... पर शिक्षा मत दो!" — शिक्षा पर राजनीति का ताला*
कभी गांव के चौपाल पर नेताजी के स्वागत में फूलों की वर्षा होती थी, अब घोषणाओं की वर्षा होती है। मंदिर बनते हैं, मस्जिद बनते हैं, गुरुद्वारा बनते हैं, पौधे बंटते हैं, राशन की थैलियां बांटी जाती हैं, मगर जब कोई बच्चा कह देता है – "गांव में स्कूल भी खुलवा दो नेताजी..." तो नेताजी का शीशा चढ़ जाता है और साथ ही बंद हो जाती है उस बच्चे की उम्मीद की खिड़की। क्योंकि सत्ता की भाषा में यह सीख दिया गया है – “सब कुछ दो, पर शिक्षा मत दो।”
दरअसल, शिक्षा वह आईना है जिसमें सत्ताएं खुद को नंगा देखती हैं। इसलिए उन्हें यह कतई गवारा नहीं कि जनता को यह आईना थमा दिया जाए। नेताजी जानते हैं – जो भूखा है, वह सिर्फ रोटी मांगेगा, पर जो पढ़ा-लिखा है, वह रोटी के साथ जवाबदेही भी मांगेगा। रोजगार भी मांगेगा और यही वह डर है, जिसके कारण शिक्षा आज 'राष्ट्र निर्माण' की प्राथमिकता नहीं, बल्कि 'सत्ता संरक्षण' की सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज शिक्षा के नाम पर राष्ट्र की आत्मा के साथ जैसा मज़ाक किया जा रहा है, वह महज़ ‘नीति’ नहीं बल्कि ‘कुनीति’ है। एक ओर मंदिरों की लंबी कतारों में घण्टे बजते हैं, दूसरी ओर स्कूलों की छतें टपकती हैं। नेता जहां धार्मिक आयोजनों में घंटों खड़े रहते हैं, वहीं शिक्षा के सवाल पर पांच मिनट भी उनके भाषण में नहीं होते।
नेताओं की नजर में स्कूल, एक खतरनाक प्रयोगशाला है – जहां से 'प्रश्न' पैदा होते हैं, 'जवाबदेही' की मांग उठती है और 'भयमुक्त विचार' आकार लेते हैं। उन्हें डर है कि कहीं बच्चा संविधान पढ़ न ले, कहीं युवती कानून के अधिकारों को समझ न ले, कहीं दलित, पिछड़ा, आदिवासी बच्चा बाबा साहब के विचारों से प्रेरणा लेकर सत्ता के गलियारे तक न पहुंच जाए। इसलिए सबसे पहले हमला शिक्षा पर ही होता है।
आप देखिए – जेएनयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, जामिया, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी... और अब नवोदय विद्यालय — एक-एक कर उन संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है जहां से ‘विचार’ निकलते हैं। जहां से तर्क, असहमति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आकार लेता है।
सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी कर दी गई है कि शिक्षक अब शिक्षक नहीं रहे – वह ‘बीएलओ’ हैं, वह राशन कार्ड अपडेट करने वाले क्लर्क हैं, वह वोटर लिस्ट में नाम काटने-जोड़ने वाला एजेंट हैं, वह मिड-डे मील की थाली गिनने वाले निरीक्षक हैं, वह महामारी रिपोर्ट भरने वाले डाकिये हैं। और भारत में शिक्षा? वह प्राथमिकता की सूची में 10वें पायदान पर भी नहीं।
सरकारें शिक्षकों को बच्चों का मार्गदर्शक नहीं, ‘सरकारी आदेश का संप्रेषक’ बनाना चाहती हैं। परिणामस्वरूप एक पीढ़ी गूगल से पढ़ रही है, लेकिन उसे यह नहीं पता कि संविधान की प्रस्तावना क्या है, और क्या है सवाल पूछने का हक़।
गांवों में धार्मिक ढांचे बनते जा रहे हैं, परंतु स्कूल अब भी किराए की छत के नीचे चल रहे हैं। नेताजी के जयकारे में डूबे गांव के लोग अगर यह नहीं समझते कि मंदिर-मस्जिद से पेट नहीं भरता, तो यह भूल एक दिन पूरे समाज को अंधकार में धकेल देगी।
नेताजी कहते हैं — "पढ़ लिख कर ये तर्क करने लगेंगे... सवाल उठाएंगे... तो हमें कौन वोट देगा?" यही है उनकी साजिश, यही है राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना। अब जरूरत है इस विडंबना को उजागर करने की, सवाल खड़े करने की, और सबसे जरूरी – शिक्षा को फिर से जन-क्रांति का औजार बनाने की।
वरना वह बच्चा, जिसने सिर्फ एक स्कूल की मांग की थी – उसका हाथ शीशे में दबाया जाएगा, और लोकतंत्र अपनी ही खिड़की पर खुद को चुप कर देगा।
संपूर्ण समाज से यही अपील है – रोटी मांगो, पानी मांगो, मंदिर-मस्जिद मांगो... पर सबसे पहले शिक्षा मांगो। क्योंकि जो पढ़ता है, वही बदलता है – और जो बदलता है, वही इतिहास लिखता है।
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