सत्ता का खेल: कुर्सी नहीं, 'कुर्सी-कला' की प्रतियोगिता है!

✒️ संपादकीय 
5 अगस्त 2025
 *"सत्ता का खेल: कुर्सी नहीं, 'कुर्सी-कला' की प्रतियोगिता है!*
देश की राजनीति अब जनसेवा नहीं, जनधोखा नहीं, बल्कि “जनतमाशा” बन चुकी है। ये लोकतंत्र का मंच नहीं रहा, बल्कि एक अखाड़ा है जहाँ नैतिकता की मिट्टी पलीद करने की होड़ मची है। आजकल जो नेता जितना ज़्यादा बोलता है, वो उतना ही कम करता है — और जो चुप रहता है, वो बस 'गठजोड़' और 'घातजोड़' करता है।नेता जनता को उसी तरह याद करते हैं जैसे छात्र परीक्षा से एक दिन पहले किताब को — मजबूरी में, डर के कारण, और जैसे ही नंबर मिल गए, किताब भी बिसरी और जनता भी!

अब कोई दल स्पष्ट विचारधारा से नहीं चलता — सब “मतलबवाद” के रथ पर सवार हैं। सुबह तक जो एक-दूसरे के दुश्मन थे, वे शाम होते-होते "राजनीतिक भाई" बन जाते हैं। जैसे राजनीति का धर्म अब सिर्फ अवसरवाद हो गया हो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

देश की चावंट राजनीति अब सोशल मीडिया से चलती है — कोई वायरल वीडियो बना दे, तो पार्टी टिकट मिल जाता है। और जो ज़मीन पर काम करता है, वो नेता नहीं, “कार्यकर्ता” बना रह जाता है — ताली बजाता है और पोस्टर लगाता है।

चुनावों में मुद्दे वही पुराने होते हैं — गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य — लेकिन उनके लिए घोषणाएं सिर्फ वही नेता करता है जिसकी कुर्सी 'अस्थायी' हो। बाकी को तो कुर्सी की 'कुंडी' कसने से ही फुर्सत नहीं।

सत्तापक्ष कहता है – देश बदल रहा है।विपक्ष कहता है – सत्ता बर्बाद कर रही है।जनता कहती है – हम तो बस पांच साल में एक दिन लोकतंत्र के राजा होते हैं, फिर पूरे पांच साल "नाटक" के दर्शक।

नेता बदल जाते हैं, वादे वही रहते हैं।झंडे बदल जाते हैं, धंधे वही रहते हैं।और अफसोस की बात तो ये है किजनता की उम्मीदें बदलती नहीं, सिर्फ टूटती हैं।
क्योंकि राजनीति अब विचारों की नहीं, विचारधाराओं के सौदेबाज़ी की मंडी बन गई है। जो आज किसी सिद्धांत की शपथ लेते हैं, वे कल उसी के ख़िलाफ़ जाकर नए गठबंधन कर लेते हैं। “संघर्ष” अब मंच पर बोलने का स्टाइल बन गया है, और “जनता” केवल पोस्टर और बाइट में दिखाने का औजार। कोई नेता जब तक कुर्सी से दूर होता है, तब तक वह ईमानदारी और बदलाव की बात करता है, और जैसे ही सत्ता मिलती है, तो उसे ‘सत्ता बचाने’ की राजनीति करनी पड़ती है — यानी 'मूल्य' नहीं, 'मैनेजमेंट' की नीति चलती है।
अब नेताओं का चुनावी कैम्पेन भी एक 'ब्रांडिंग शो' है — सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग, रील्स में एक्टिंग, और मंच पर भाषण से ज़्यादा तो कैमरा कोण और बैकग्राउंड म्यूज़िक की तैयारी होती है। जो जितना ऊंचा चिल्लाता है, वो उतना बड़ा नेता समझा जाता है। “काम” अब नोटिफिकेशन से नहीं, इंस्टाग्राम स्टोरी से मापा जाता है।

विपक्ष की भूमिका अब केवल सत्ता की आलोचना तक सीमित रह गई है, पर उसके अपने शासनकाल के घाव भी ताज़ा हैं। जनता भी भ्रम में है — वो बार-बार उन्हीं वादों के जाल में उलझती है, जिनसे उसका अतीत भी घायल हुआ था। लेकिन शायद आज की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जनता अब नेताओं से ईमानदारी की नहीं, मनोरंजन की उम्मीद रखती है।

कभी नेता ज़मीनी कार्यकर्ता होते थे, अब 'इवेंट मैनेजर' बन गए हैं। वे भाषण देते हैं, लेकिन संवाद नहीं करते; रैली करते हैं, लेकिन जन-सुनवाई नहीं करते; और जब सवाल किए जाते हैं, तो या तो माइक्रोफोन बंद कर देते हैं या कैमरा ऑन कर देते हैं।

चुनावों में “विकास” एक विज्ञापन की तरह पेश किया जाता है — वही सड़क, वही पानी, वही शिक्षा की बातें — लेकिन हर बार एक नया चेहरा, एक नया नारा, और एक नई जुमलेबाज़ी। सत्ता पक्ष कहता है कि देश बदल रहा है; विपक्ष कहता है कि सरकार फिसल रही है; और जनता कहती है — “हम तो सिर्फ पांच साल में एक दिन मालिक होते हैं, बाकी  दिन सिर्फ तमाशबीन।”

अब राजनीति 'चावंट' बन चुकी है — यानी दिखावा, पाखंड और बड़बोलापन की वो मिठास, जो चाटते-चाटते जनता के मुँह में छाले पड़ जाते हैं। असली मुद्दे गायब हैं, बस नेता और कैमरा एक-दूसरे के सामने मुस्कुरा रहे हैं।
यह राजनीति अब सेवा नहीं, 'स्टेज परफॉर्मेंस' है — एक ऐसा खेल, जहां चेहरे बदलते हैं, लेकिन नकाब वही रहते हैं।
और अंत में यही कहा जा सकता है —"राजनीति अब सेवा नहीं, करिश्माई अभिनय की ऑडिशन है — जहां चेहरे बदलते हैं, नकाब वही रहते हैं!"

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