सत्ता बनाम चुनाव आयोग : लोकतंत्र की चौसर पर गोटियां बिखरीं
संपादकीय
23 अगस्त 2025
*सत्ता बनाम चुनाव आयोग : लोकतंत्र की चौसर पर गोटियां बिखरीं*
राजस्थान की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प खेल का मैदान बनी हुई है—खिलाड़ी वही, नियम वही, लेकिन अंपायर बेबस! सत्तारूढ़ सरकार ने "वन स्टेट, वन इलेक्शन" का राग छेड़कर मानो लोकतंत्र की धुन ही बिगाड़ दी हो। बहुत सी पंचायत राज संस्थाओं का कार्यकाल जनवरी में ही समाप्त हो चुका था, शेष का अभी होने जा रहा है। नगर निकायों का भी हाल बुरा है, लेकिन चुनाव करवाने के बजाय सत्ता पक्ष प्रशासक तंत्र के सहारे शासन का मज़ा ले रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जनता पूछ रही है—“गांव की नई सरकार कब बनेगी?” और सरकार जवाब दे रही है—“अभी परिसीमन की दरकार है।” मज़े की बात यह है कि परिसीमन को जनता सुधार मानने से ज्यादा सत्ता का ‘वोटबैंक इंजीनियरिंग’ समझ रही है। जगह-जगह विरोध हो रहा है, लेकिन सरकार को अपने हठधर्मिता के चश्मे से आगे कुछ दिख नहीं रहा।
हाईकोर्ट ने फटकार लगाई तो चुनाव आयोग ने भी दो टूक कहा कि संवैधानिक संशोधन बिना वन स्टेट, वन इलेक्शन महज़ जुमला है। लेकिन आयोग की ये दो टूक बातें भी सरकार के शोर-शराबे में कहीं खो सी जाती हैं।
दरअसल, लोकतंत्र का असली सौंदर्य जनता की भागीदारी से है। जब पंचायत राज संस्थाएं और नगर निकाय चुनाव के इंतजार में आधे साल से लटके हों, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के गले में डाला गया पत्थर है। 15वें वित्त आयोग का पैसा गांव-नगर तक नहीं पहुंच रहा, विकास कार्य ठप पड़े हैं और जनता की नाराज़गी चरम पर है।
इतिहास गवाह है, जब टी.एन. शेषन जैसे चुनाव आयुक्त ने सख्ती दिखाई थी तो राजनीति भी सहमी थी। आज वैसा ही लोहे का हाथ चुनाव आयोग से अपेक्षित है। लोकतंत्र पर धब्बा तब लगता है जब चुनाव टलते हैं, और सत्ता अपनी सुविधा के अनुसार “जनादेश” को बंधक बना लेती है।
जनता अब यह समझ चुकी है कि “परिसीमन” का असली मतलब है—“सीटों का जोड़-तोड़” और “वोटबैंक का मोड़-तोड़।” सवाल ये है कि क्या लोकतंत्र का सूरज अब सरकारी धुंधलके में डूबेगा या फिर चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाकर उसे नई रोशनी देगा?
चुनावों पर देरी लोकतंत्र पर डाका है। यदि पंचायत और निकायों की सरकारें समय पर नहीं बनेंगी तो “ग्राम स्वराज” सिर्फ किताबों का शब्द रह जाएगा। सरकार को सत्ता के मोह से बाहर निकलकर चुनाव करवाने चाहिए और आयोग को “शेषन स्टाइल” में अपने अधिकारों का उपयोग करना चाहिए।
राजस्थान की राजनीति इन दिनों किसी अधूरी बारात जैसी हो गई है—ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, पर दूल्हा ही गायब! पंचायत राज और निकाय चुनावों का मामला है। जनवरी में कार्यकाल खत्म हुआ, लेकिन चुनाव करवाने का नाम नहीं। सरकार और आयोग दोनों ही “अंधों में काना राजा” बनकर जनता को भरोसा दिलाते फिर रहे हैं।
गांव की सरकार को लोकतंत्र की रीढ़ कहा गया था, लेकिन यहां तो रीढ़ की हड्डी निकालकर सत्ता के सोफे पर गद्दी सजाई जा रही है। पंचायतें खत्म, सरपंच गायब,ए और गांव में फैसले कर रहे हैं ‘प्रशासक बाबू’। अब जनता कहे भी तो किससे कहे? वोट देने का हक छीन लिया और जवाब मिला—“वन स्टेट, वन इलेक्शन।” मानो बिना दांत के गन्ना चबाने की कोशिश हो रही हो।
हाईकोर्ट ने जब चुनाव आयोग को झकाझक कर जगाया, तब जाकर आयोग को याद आया कि वह संविधान का चौकीदार है, सत्ता का दरबारी नहीं। आयोग ने बोला—“अब ज्यादा इंतजार नहीं।” पर जनता के मन में सवाल है—“इतना समय तक आप सोए क्यों रहे? क्या आपको ‘कोमा’ से जगाने हाईकोर्ट ही चाहिए था?”
उधर, सत्ता के महारथी परिसीमन के नाम पर अपने-अपने ‘घोड़े नचाने’ में लगे हैं। गांव की सीमाएं ऐसे खींची जा रही हैं मानो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि खेती की पटवार किताब हो। वोट बैंक की खातिर जनता को मुर्गा बनाकर घेराबंदी की जा रही है। मंत्रीजी बयान फेंकते हैं—“दिसंबर तक चुनाव हो जाएंगे।” अब जनता कहे—“ऊंट के मुंह में जीरा” या “न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी”?
सबसे बड़ा तंज तो यह है कि जब लोकतंत्र की जड़ें गांव-गांव की पंचायत से सींची जाती हैं, तो इन्हीं जड़ों को सूखा छोड़ दिया गया। सत्ता और आयोग दोनों मिलकर जनता को “खाली घड़े की टंकार” सुना रहे हैं।
टी.एन. शेषन होते तो अब तक सत्ता के गलियारों की “नाक में नकेल डाल” दी होती। लेकिन मौजूदा आयोग की हालत यह है कि वह सत्ता के आगे “पानी भरने” में ही व्यस्त है
लोकतंत्र की रक्षा सत्ता नहीं करेगी, उसका पहरेदार चुनाव आयोग है। अगर आयोग ने ही “काठ की तलवार” पकड़ी रखी तो सत्ता जनता को हमेशा “आसमान से चांद तोड़कर देने” का झूठा वादा ही करती रहेगी। अब वक्त है कि आयोग साहस दिखाए, नहीं तो लोकतंत्र का हाल भी वही होगा जो आज पंचायतों का है—“न घर का, न घाट का।”
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