"शब्द जो जीवन बदल दे: जब सत्य बोले तो चेतना जागे"

संपादकीय 
3 अगस्त 2025
 *"शब्द जो जीवन बदल दे: जब सत्य बोले तो चेतना जागे"* 
आज के शोरगुल, बाजारवाद और आत्मविस्मृति के इस दौर में यदि कोई चीज है जो मनुष्य को भीतर से झकझोर सकती है, जो आत्मा को रौशनी दे सकती है, तो वह है – एक सार्थक शब्द। यह कोई उपदेशात्मक कल्पना नहीं। कभी किसी संत ने कहा था, "संसार की सबसे बड़ी क्रांति बंदूक या तलवार से नहीं, एक शब्द से होती है — वह शब्द जो आत्मा को झकझोर दे, जो तम के भीतर से उजाले को जन्म दे।" बुद्ध की धम्मदेशनाओं में वर्णित यह बात केवल किसी धर्म विशेष की नहीं, समूचे मानवीय सभ्यता की आत्मा है। आज जब समाज चारों ओर से अशांति, हिंसा, असहिष्णुता, मानसिक जहर और बौद्धिक सन्नाटे से घिर चुका है, ऐसे समय में हम यह भूल गए हैं कि एक सार्थक शब्द की शक्ति क्या होती है। आज आवश्यकता है ऐसे शब्द की, जो केवल कानों से नहीं, अंतःकरण से सुना जाए।

डॉ एमएल परिहार द्वारा संपादित बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित अंतिम पुस्तक बुद्ध और उनका धम्म के अनुसार, "हजारों निरर्थक शब्दों से कहीं श्रेष्ठ वह एक सार्थक शब्द है जो सुनकर व्यक्ति को शांति प्राप्त हो।" लेकिन अफसोस कि आज समाज की मानसिक भूख इतनी विकृत हो गई है कि अश्लीलता, सनसनी, उत्तेजना और हिंसा के लिटरेचर को ही शब्द समझ लिया गया है। आज का पत्रकारिता मंच, विशेषकर डिजिटल माध्यम, यू-ट्यूब चैनल, सोशल मीडिया रिपोर्टिंग और तमाम तथाकथित 'ओपिनियन लीडर्स' उस रद्दी साहित्य के व्यापारी बन गए हैं जहाँ केवल ‘वायरल’ ही मूल्य है, ‘सार्थक’ नहीं।

कोई भी वीडियो देखिए — "लड़की भाग गई", "प्रेमी संग पकड़ी गई", "बहू छोड़ गई घर", "लव मैरिज कर ली" — यह सब अश्लील मनोरंजन का वह जहर है, जो समाज के सोचने, समझने और सीखने की शक्ति को खोखला कर रहा है।
पाठकों और दर्शकों की मानसिकता इस कदर विषाक्त हो गई है कि यदि कोई सच बोले, तो वे कह बैठते हैं — "क्या ज्ञान बांट रहा है, कुछ मसालेदार बोल!" और जब हम सच्चाई की तलवार को कलम से निकालते हैं, तो वही समाज व्यंग्य शैली में तंज कसता है। वाह क्या ज्ञान बांट रहा है। यह प्रश्न बनकर खड़ा है कि क्या आज की पीढ़ी को सिर्फ विकृति चाहिए? क्या लोगों ने विवेक खो दिया है? क्या अब सिर्फ चीखने, भड़काने, और उकसाने वाले शब्द ही बिकेंगे? यदि ऐसा ही चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब समाज मानसिक रूप से बीमार होकर अपनी आत्मा को खो बैठेगा। लेकिन अब आवश्यकता है – एक सार्थक शब्द की क्रांति की। एक ऐसा शब्द जो शोर को तोड़कर मौन के भीतर प्रवेश करे। जो ज्ञान को फिर से आदर दिलाए। जो बच्चों को गंदगी नहीं, गरिमा सिखाए। हमें फिर से बुद्ध के उस मार्ग पर लौटना होगा जहां शब्द तपस्वी होता है, वाणी ध्यान की साधना होती है, और लेखनी सामाजिक परिवर्तन की मशाल।

और जब हम यह सच बोलेंगे, तो वही समाज कहेगा – "मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है!" — यही वह ताना है, यही वह व्यंग्य है, जो सच बोलने वालों के हिस्से आता है। लेकिन यह कहना और सहना ही आज की स्वाभिमानी पत्रकारिता का मूल है। क्योंकि मौन रहना अब अपराध है, और बोलना एक आंदोलन।
आज जब ‘भीम प्रज्ञा मीडिया हाउस’ जैसी संस्थाएं ऐसे शब्दों को मंच देने का प्रयास कर रही हैं, तो यह एक समर्पित पत्रकारिता की मिसाल है। यह उस चेतना का हिस्सा है जो यह मानती है कि शब्द सिर्फ सूचना नहीं, दिशा है। केवल व्याकरण नहीं, विचार है। केवल रचना नहीं, रचनात्मक विद्रोह है। यह पत्रकारिता की उस ‘स्वाभिमानी परंपरा’ को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है, जहां खबरें बिकें नहीं, जागें।

यदि समाज को बचाना है, तो बाजारू और घिनौने कंटेंट की जगह आत्मा को झकझोरने वाले सार्थक शब्दों को देना होगा सम्मान। तभी वह एक ‘शब्द’ फिर से बन सकेगा – दीपक, जो अंधेरे को मिटा दे। हथियार, जो अन्याय को काट दे। मंत्र, जो जीवन बदल दे। यही वह समय है — जब शब्द बोलने नहीं, सुनने की भी जिम्मेदारी है। क्योंकि एक शब्द ही जीवन बदल सकता है। और यही वह शब्द है

यह वाक्य कोई साधारण प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस क्रांतिकारी सोच का प्रतीक है जो बोलने की आज़ादी को, सच की ताकत को, और व्यवस्था से टकराने की हिम्मत को भीतर से जीता है। लेकिन क्या आज का समाज उस एक ‘सार्थक शब्द’ को सुनने लायक बचा है?

पत्रकारिता कभी मिशन थी, अब कमीशन बन चुकी है। पहले पत्रकार सच्चाई के प्रहरी थे, अब टीआरपी और व्यूज़ के नौकर बन गए हैं। पहले संवाद होता था, अब केवल विवाद होता है। और दुर्भाग्य यह है कि आज भी यदि कोई स्वाभिमानी पत्रकार, कोई धम्म-प्रेरित संपादक, कोई सच्चा लेखक सच्चाई कहने की हिम्मत करता है, तो उसे ‘असहज’, ‘अप्रासंगिक’ और ‘अवांछनीय’ घोषित कर दिया जाता है।

ऐसे समय में मैं पुनः कह रहा हूं कि ‘भीम प्रज्ञा’ जैसे प्लेटफॉर्म एक क्रांति की शुरुआत हैं — एक शुद्ध बौद्धिक आकाश में धम्म की रौशनी लाने का प्रयास। यह पत्रकारिता की उस परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश है जहाँ शब्द महज सूचना नहीं, प्रेरणा थे। जहाँ लेख सिर्फ खबर नहीं, दिशा थे। जहाँ विचार सिर्फ बहस नहीं, परिवर्तन के बीज थे।

समाज को यह समझना होगा कि यदि हम अब भी नहीं जगे, तो अश्लीलता, घृणा और मानसिक तिरस्कार की यह गंदगी हमारी अगली पीढ़ियों की आत्मा को लील जाएगी। हमें बच्चों को भजन की जगह ‘ब्रेकअप रील्स’ मिलेंगी, शिक्षा की जगह 'क्लिकबेट झूठ', और नैतिकता की जगह 'वायरल वासनाएं'।

इसलिए यह समय है चेतने का — अपने भीतर के उस सार्थक शब्द को सुनने का, जो आज भी भीतर कहीं गूंज रहा है।
"अप्प दीपो भव" — स्वयं दीपक बनो।
मत कहो कि समाज गंदा हो गया, स्वयं प्रकाश बनो। मत रोओ कि कोई सच्चाई नहीं बोलता, स्वयं बोलो — चाहे फिर कहें, "बोलता है!"
क्योंकि जब शब्द जागेंगे, तो समाज बदलेगा। जब कलम ललकारेगी, तो अंधकार हटेगा। और जब धम्म की भाषा गूंजेगी, तब सत्य, शांति और करुणा फिर से लौटेगी।

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