"ज्ञान से डरने वाले सत्ता के पुजारी"
संपादकीय
*"ज्ञान से डरने वाले सत्ता के पुजारी"*
6 अगस्त 2025
अब जमाना बदल गया है। पहले लोग कहते थे — “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब”, अब नेता कहते हैं — “पढ़ोगे-लिखोगे, तो पूछोगे सवाल... और फिर बनोगे बवाल!” इसलिए अब न स्कूल की ज़रूरत है, न शिक्षा की। मंदिर बनाओ, मस्जिद सजाओ, गुरुद्वारे में लंगर लगाओ, वाटिका लगाओ, तालाब खुदवाओ — पर स्कूल? अरे भाई, वो तो सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा है! यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
एक नेता जी की परिकथा सुनिए — गांव में जब उन्होंने सौ टन चूना और दो सौ बोरियों से ज्यादा सीमेंट खर्च कर मंदिर खड़ा किया, तो गांववाले झूम उठे। किसी ने फूल चढ़ाया, किसी ने मिठाई बांटी। नेता जी मुस्काए और बोले, “मैंने अपना सपना पूरा कर दिया।”
लेकिन तभी एक दुबला-पतला बच्चा झोपड़ी से निकल आया — स्कूल के कपड़े फटे थे, हाथ में पुरानी कॉपी थी। वो दौड़ता हुआ नेताजी की गाड़ी के पास आया और मासूमियत से बोला — “नेताजी, एक स्कूल भी बनवा दो...”
नेताजी की हंसी ठिठक गई। उन्होंने गाड़ी का शीशा ऊपर किया, बच्चे की उंगलियाँ शीशे में दब गईं। ड्राइवर को इशारा किया — “चला गाड़ी!” और बुदबुदाए — “पढ़ेगा तो पूछेगा, और पूछेगा तो राज नहीं कर पाऊंगा।”
क्योंकि पढ़ा-लिखा आदमी वो आईना बन जाता है, जिसमें नेता अपना चेहरा देखना ही नहीं चाहता।
इस देश में राशन मुफ्त है, भोजन मुफ्त है, मूर्ति मुफ्त में स्थापित होती है, पर शिक्षा? अरे नहीं! शिक्षा मुफ्त नहीं, क्योंकि शिक्षा मुफ्त हो गई तो ‘जागृति’ मुफ्त हो जाएगी, और फिर वोट बैंक मुफ्त चला जाएगा! इसलिए सरकारी स्कूलों के मास्टर अब बीएलओ हैं, डाटा एंट्री ऑपरेटर हैं, जनगणना अधिकारी हैं, राशन रजिस्टर लेखक हैं – और कहीं-कहीं तो सड़क उद्घाटन के पोस्टर चिपकाने वाले स्वयंसेवक भी।
शिक्षक पढ़ाने के बजाय लाइन में खड़ा है। और बच्चे? वो अपने भविष्य के लिए टिकट बुक कर रहे हैं — "गुमनामी एक्सप्रेस" में।
नेताओं को यह डर नहीं कि बच्चा भूखा है, उन्हें डर है कि कहीं बच्चा पढ़ न जाए। क्योंकि जिस दिन ये बच्चा संविधान का “अनुच्छेद 14” पढ़ लेगा, उस दिन वोट सिर्फ नाम देखकर नहीं, काम देखकर देगा। और तब चुनाव प्रचार में भजन-कीर्तन और जातीय समीकरण काम नहीं आएंगे।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी सबसे ज़्यादा उपेक्षित वही चीज़ है, जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है — विचारशील, विवेकशील शिक्षा!
क्योंकि शिक्षा वो चिंगारी है, जो भीतर जलती है — और जब भड़कती है, तो संसद की कुर्सियों तक उसकी लपट पहुंचती है। इसलिए हर सत्ता की पहली कोशिश होती है — स्कूलों को जर्जर करो, शिक्षकों को डाकिया बनाओ, और बच्चों को बस परीक्षा पास करने की मशीन बनाकर रखो।
शिक्षा नहीं चाहिए उन्हें, ताली बजाते “शाबाशीदेव” चाहिए। सोचने वाला छात्र नहीं, हां में हां मिलाने वाला युवा चाहिए।
तो आज अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे आपके जैसे ही रहें — तब स्कूल मत बनवाइए। पर अगर आप चाहते हैं कि अगली पीढ़ी आपसे बेहतर हो, तो फिर नेताओं से सिर्फ मंदिर नहीं, “विद्यालय” की मांग कीजिए। क्योंकि वोट मांगने आएगा, तब पूछिए — “कितने स्कूल खुलवाए? कितने लाइब्रेरी बनवाई?”
क्योंकि जब शिक्षा बिकती है, तब लोकतंत्र रोता है।
और जब शिक्षा दी जाती है, तब सत्ता की दीवारें हिलती हैं।
अब भी वक्त है — सवाल पूछिए, तर्क कीजिए, और सबसे पहले शिक्षा को बचाइए। नहीं तो कल को वही बच्चा, जिसकी उंगली शीशे में आई थी — एक दिन अपनी उम्मीदों के साथ राजनीति के टायर तले कुचला जाएगा।
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