पंचायत राज चुनाव – लोकतंत्र का पर्व या सरकार का टालमटोल खेल?

संपादकीय
27 अगस्त 2025

 *पंचायत राज चुनाव – लोकतंत्र का पर्व या सरकार का टालमटोल खेल?* 
राजस्थान में पंचायत राज चुनाव हमेशा लोकतंत्र की नब्ज़ माने जाते हैं। लेकिन इस बार पंचायतों का हाल ऐसा है जैसे लोकतंत्र का हृदय धड़क रहा हो और सरकार उसे ‘ऑक्सीजन सिलेंडर’ पर जीने को मजबूर कर रही हो। पंचायत राज अधिनियम 1994 के तहत तय समय पर चुनाव होना लोकतंत्र की आत्मा है, परंतु चुनाव आयोग और सरकार के बीच “कानूनी गुथियों” और “राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी” ने इस आत्मा को कागज़ी बना दिया है। या मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है 


दरअसल, कई ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो चुका है, और वहाँ प्रशासक बैठा दिए गए हैं। यानी गांव की सरकार अब ‘मुखिया’ नहीं चला रहा, बल्कि सरकारी कुर्सी पर बैठा एक प्रशासक चला रहा है। ग्राम स्वराज का सपना इस प्रशासनिक ठेकेदारी में कैसा पूरा होगा? क्या गांव की जनता ने इसलिए वोट दिया था कि समय आने पर उनकी चुनी हुई सरकार ‘सस्पेंड’ कर दी जाए और प्रशासक ही लोकशाही का ठेका ले ले?

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने साफ कहा था कि छह महीने में चुनाव कराए जाएं। पर सरकार को शायद लगा कि पंचायत चुनाव कोई “मेले का टिकट” है, जो कभी भी टाल दिया जाए। अब डबल बेंच में मामला लटक गया है। सरकार परिसीमन की आड़ में अपने राजनीतिक समीकरण साधने में लगी हुई है। परिसीमन की गुत्थी सुलझे भी तो कैसे—किस वार्ड को कहाँ जोड़ना है, किसे नया लाभ देना है, और किसे चुनावी समीकरण से बाहर करना है—यह सब राजनीतिक खिचड़ी पकाने का सबसे आसान नुस्खा बन गया है।

जनता का सवाल बड़ा साफ है – “क्या पंचायत राज केवल किताबों में रह जाएगा? क्या पंचायत चुनाव भी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तरह ‘राजनीतिक दांवपेच’ का मोहरा बन चुके हैं?”

व्यंग्य की नजर से देखें तो स्थिति ऐसी हो गई है जैसे कोई किसान हल चलाने को तैयार है, बैल भी खड़े हैं, पर सरकार कह रही है – “पहले बैलों की जाति तय करो, फिर खेत की नापजोख करो, फिर सोचेंगे कि हल चलेगा या नहीं।” तब तक खेत सूख जाए, किसान भूखा मर जाए, किसे फर्क पड़ता है?

सच तो यह है कि पंचायत राज चुनावों को टालना लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करना है। लोकतंत्र में सबसे मजबूत कड़ी गांव की सरकार है। यदि ग्राम पंचायतों के चुनाव ही समय पर न हों, तो यह वैसा ही है जैसे किसी विशाल इमारत से नींव की ईंट निकाल देना।

अब सवाल यह है कि क्या सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी उतरेगी? या फिर “डबल बेंच”, “परिसीमन” और “कानूनी पचड़े” के नाम पर चुनावों को फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? लोकतंत्र का असली व्यंग्य यही है कि जनता वोट डालने को हमेशा तैयार रहती है, लेकिन सरकार और तंत्र वोट कराने को तैयार नहीं रहते।

लोकतंत्र का तकाज़ा है कि पंचायत चुनाव समय पर हों। सरकार चाहे परिसीमन की गुत्थी सुलझाए या राजनीतिक जोड़तोड़ में व्यस्त रहे, जनता का धैर्य अब टूट रहा है। अगर गांव की सरकार को समय पर चुना नहीं जाएगा, तो आने वाले समय में जनता का गुस्सा सरकार की राजनीति को भी उलझा देगा। क्योंकि लोकतंत्र की सच्चाई यही है – “गांव जागा तो सत्ता के महल हिलेंगे।”
लोकतंत्र की असली ताकत गांवों से आती है। यदि पंचायत चुनावों को कानूनी पेच और राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाएगा, तो जनता का गुस्सा आने वाले चुनावों में ज़रूर भारी पड़ेगा। क्योंकि गांव की जागरूकता ही वह ताकत है जो सत्ता के महलों को हिला सकती है।

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