एसआई भर्ती रद्द — सिस्टम, साक्ष्य और राजनीतिक तमाशा
संपादकीय
30 अगस्त 2025
*एसआई भर्ती रद्द — सिस्टम, साक्ष्य और राजनीतिक तमाशा*
राजस्थान हाईकोर्ट ने 2021 की विवादित सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को रद्द कर दिया — और उस फैसले ने राज्य की सियासत, आयोग और भर्ती मशीनरी को ऐसे उजागर कर दिया मानो पर्दे के पीछे से चल रही कई सालों पुरानी ड्रामा-सीरीज़ अचानक लाइव आ गई हो। अदालत ने रद्द करने की बाज़ीगरी इसलिए खेली क्योंकि पेपर लीक और अनियमितताओं का जाल इतना गहरा था कि “धर्मसंकट” के बिना भर्ती की वैधता बताना असंभव था। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
पेपर-लीक की जंजीर किसने जोड़कर रखी थी, यह खोजने की गुंजाइश SOG की लंबी छानबीन में खुली — दर्जनों गिरफ्तारियाँ, घनघोर नेटवर्क और पूछताछ-कहानियाँ मिलीं जिनमें ‘इमाम’ की तरह काम करने वाले एजेंट, स्कूलों के माध्यम से पेपर्स की रूटिंग और पूछताछ में ज्वलंत सबूत सामने आए। यानी जो लोग सरकारी नौकरियों को ‘गिफ्ट-कॉर्ड’ समझ बैठे थे, वे अब अपनी-अपनी ईमेल नहीं मिटा पाएँगे।
और जब बात संस्थागत जवाबदेही की आती है, तो RPSC की करामाती छवि भी उजागर हो उठी — कुछ वरिष्ठ सदस्य और भर्ती प्रक्रियाओं के संबंध में गहरी प्रश्नचिन्ह वाली रिपोर्टें मीडिया के पन्नों पर आ गयीं। यह वह आयोग है जिसे "लोक-सेवा" की माला ओढ़ाई गयी थी; आज वही माला सवालों के बुनियादी तारों से लटकी नजर आती है।
लेकिन राजस्थान की राजनीति में जहां जुबान की गोलियाँ उड़ती हैं, वहाँ व्यंग्य का असली सर्कस चलता है। कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने इस पूरे मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई — अपने ही ढेंग पर, उस सरकार के भीतर रहकर विरोध की वो चाल जो हमें बताती है कि राजनीति में ‘सद्-निग्रह’ और ‘नाटक’ की दूरी अक्सर बहुत छोटा होता है। दूसरी ओर नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने दोनों सरकारों पर हमला बोला — और दोनों के बीच जो क्लैश हुआ, वह जनता के लिए ‘क्रेडिट-कौन-लेगा’ का तमाशा बन गया। जनता पूछती है: क्या यह सच में न्याय की जीत है, या फिर राजनीतिक श्रेय-वट का नया मेला?
सवाल यह भी उठता है कि सरकार — जिस पर पब्लिक-प्रेशर है — कैसे बचाव में लगी रही? एक सरकारी उप-समिति ने कहा था कि जांच चल रही है और तत्काल रद्द करना ‘प्रमेचर’ होगा; मतलब, पहले जांच खत्म करो, फिर निर्णय लो — या फिर समय काटते रहो। इस बीच अदालत ने साफ़ कर दिया कि जब विश्वास ही टूटा हो तो “प्रमेचर” बचाने का बहाना बेअसर हो जाता है। अब वही सरकार बैक-फुट पर है — करूँ क्या, न करूँ क्या — और विपक्षी चेहरे और आह्वानों के बीच फँसी है।
कानूनी मोड़ भी कम नाटकीय नहीं: एकल पीठ का फैसला सुनते ही चयनित उम्मीदवारों और कुछ हितग्राहियों ने संभावित चुनौती और उच्चतर पीठ में अपील की गूँज पैदा कर दी — यानी अभी मामला खत्म नहीं हुआ; अदालतों के गलियारे, अपील और फिर से बहस का दौर लंबा खिंच सकता है। वही युवा जो सालों की तैयारी के बाद नौकरी के क़रीब पहुँचे थे, आज ‘शून्य’ की स्थिति में खड़े हैं — उनके करियर, परिवारिक निर्णय, और जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ (जैसे नौकरी छोडना या शादी-सम्बन्धी योजनाएँ) एक झटके में बदले हुए हालात की वजह से प्रभावित हुए हैं। कुछ राहत की बातें भी हैं — अदालत ने पुनःआवेदन की अनुमति और उम्र में छूट जैसी व्यवस्थाओं पर चर्चा के संकेत दिए हैं — पर प्रश्न यही है: क्या यह ‘राहत’ खोई हुई बरसों की मेहनत की भरपाई कर पाएगी?
और तो और — हम खोजते हैं कि किसे दोष दें? आयोग की जवाबदेही, भर्ती-प्रक्रिया की तकनीकी कमियाँ, मंत्री-कठपुतली स्तर की राजनीति, या उस सामाजिक मनोवृत्ति को जो “सरकारी नौकरी = अंतिम मंज़िल” बनाती है? व्यंग्य कहे तो, हमें एक-एक करके सारे जिम्मेदारों के सिर पर ‘इन्स्पेक्टर-कपड़ा’ चढ़ा देना चाहिए — पर वास्तविक सुधार तब होगा जब इन शब्दों के पीछे नफ़ा-नुकसान और सिस्टम-रिफॉर्म की ईमानदार योजना आए।
अंततः, यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने की नहीं है। यह एक प्रशासनिक और नैतिक दर्पण है — जो दिखाता है कि जब संस्थाएँ ढहने लगती हैं, तो राजनीति टर्न-टेबल की तरह चलती है, और सबसे ज्यादा हानि वही सहता है जिसे हम ‘मेहनती युवा’ कहते हैं। अगर हम सच्चे में सुधार चाहते हैं, तो ढेर-सारे कमेटियाँ बनाने और नीतिगत भाषणों के बजाय तीन साफ कदम चाहिए: (1) भर्ती प्रक्रिया का टेक्निकल-रिबिल्ड — एंड-टू-एंड एंक्लोज्ड पेपर-प्रोटोकॉल, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन और तृतीय-पक्ष मॉनिटरिंग; (2) आयोग में पारदर्शी दण्डात्मक जवाबदेही — जो गलती करे, उसे शनैः-शनैः पैनल में न रखें; (3) राजनीतिक संस्कार — सत्ता में बैठा जो भी बोले, उसका माप-दंड जनता के सामने होना चाहिए, न कि टेली-डिबेट का ‘क्रेडिट’ और ‘ब्लेम-गेम’।
आज अदालत ने शोर मचा दी, SOG ने छानबीन कर दी, और नेता-मंत्री-सांसद अपने-अपने भाषणों में ‘न्याय’ का झंडा उठा कर चले गए — पर असली न्याय तब होगा जब भर्ती फिर से होगी, और उस प्रक्रिया का हर कदम ऐसा पारदर्शी होगा कि किसी के पास फिर पर्दे के पीछे जाकर काम करने की गुंजाइश न रहे। तब जाकर इस व्यंग्य का आख़िरी पन्ना कटेगा — वरना हम अगले सत्र में फिर वही पुराना प्रोटोकॉल देखेंगे: एक नई जांच, नया तमाशा, और फिर वही वही।
Comments
Post a Comment