जाट और जांटी – जड़ों पर वार, भविष्य पर प्रहार
संपादकीय-@ *दैनिक भीम प्रज्ञा*
#एडवोकेट हरेश पंवार #
10 अगस्त 2025
*जाट और जांटी – जड़ों पर वार, भविष्य पर प्रहार*
खेतों से खेजड़ी(जांटी) और राजनीति से जाट — दोनों पर पूरे देश में चल रहा है योजनाबद्ध ‘उजाड़ो अभियान’, जो पर्यावरण और सामाजिक ताकत दोनों को खत्म कर रहा है। राजस्थान की धरती पर जांटी (खेजड़ी) और जाट — दो नाम सदियों से अस्तित्व, संघर्ष और सहनशीलता के प्रतीक रहे हैं। फर्क बस इतना है कि जांटी की जड़ें मिट्टी में हैं और जाट की जड़ें समाज के दिल में।
आज दोनों को निशाना बनाने के लिए अलग-अलग औज़ार चलाए जा रहे हैं — एक पर कुल्हाड़ी, दूसरे पर कूटनीति। और यह खेल सिर्फ राजस्थान का नहीं, बल्कि हर उस राज्य का है, जहाँ जाट अपनी संख्या, मेहनत और साहस से पहचान रखते हैं। हालांकि किसी समाज के व्यक्तिगत मुद्दे को लेकर नहीं बोलना चाहिए इन दिनों राजनीतिक सुगबुगाहट को सुनकर कई दिन चुप रहा परंतु मन आहत हुआ तो रुका नहीं पाया । इसलिए एक जोखिम भरे ऐसे गंभीर मुद्दे पर यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
पहले बात जांटी की करते हैं। यह पेड़ मरुस्थल का “ऑक्सीजन बैंक” है, जो कम पानी में भी जीवन देता है। पशुओं के लिए चारा, किसानों के लिए सहारा और मिट्टी के लिए ढाल — सब कुछ। लेकिन सरकारी पौधारोपण योजनाओं में इसे लगभग गायब कर दिया गया है। एक पेड़ माँ के नाम वाली स्कीम में फोटो खिंचवाने लायक पौधे मिलते हैं, पर खेजड़ी जैसे “बिना दिखावे” वाले पेड़ नहीं। मैंने कई एनजीओ और सरकार के कार्यक्रम में पौधारोपण वितरण करते हुए देखा लेकिन कहीं पर भी राजस्थान की धरती पर जांटी के पौधे बांटते हुए नहीं देखा गया। ।
दूसरी बात राजस्थान में खेजड़ी (जांटी) को तुलसी के समान पवित्र माना जाता है। गुगा जांटी के त्योहार पर इसकी पूजा होती है। रक्षाबंधन के दिन बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो यह बंधन भाई के साथ ही जांटी से भी जुड़ा होता है।
जन्माष्टमी के दिन, गांवों में जांटी की टहनी पर यह राखी टांगी जाती है और जांटी पूजन के साथ इसका विसर्जन होता है। यह सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक संदेश है — भाई की रक्षा और प्रकृति की रक्षा एक साथ।
लेकिन अफसोस, जिस जांटी को आस्था में तुलसी का दर्जा मिला, वही आज सरकारी पौधारोपण योजनाओं से गायब है। खेतों में आधुनिक मशीनें उसकी जड़ों को इस तरह काट रही हैं, जैसे कोई पुराना कर्ज़ चुकता कर रहे हों।
अब जाट की बात करें। हरियाणा में कभी यह समाज राजनीति की धुरी था, लेकिन पिछले दशक में योजनाबद्ध तरीके से “सर्जिकल सफाया” कर दिया गया। पंजाब में किसान आंदोलन के बाद जाट नेतृत्व को तोड़ने के लिए अंदरूनी राजनीति और प्रचार का खेल चला। उत्तर प्रदेश में कभी पंचायत से लेकर संसद तक मजबूत उपस्थिति रखने वाला यह समाज अब गठबंधन राजनीति के कोनों में धकेला जा रहा है। राजस्थान में भी डबल इंजन की सत्ता ने जाटों को सिर्फ चुनावी मौसम का पत्ता बना दिया — मौसम खत्म, पत्ता गिरा।
यह महज़ इत्तेफ़ाक नहीं है। यह एक संयोजित षड्यंत्र है -हरियाणा में जाट नेतृत्व को बिखेरना। पंजाब में किसान नेतृत्व को कमजोर करना। उत्तर प्रदेश में जाट वोट को खंड-खंड कर देना। राजस्थान में नेतृत्व को सीमित और नियंत्रित रखना। और यह सब चुपचाप नहीं, बल्कि सोच-समझकर, नीतिगत तरीके से हो रहा है। किसान आंदोलन में बुलंद आवाज उठाने वालों को “देशविरोधी” बताना, पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का माइक बंद करवाना, और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को “स्वास्थ्य कारण” के नाम पर बाहर करना — यह सब सर्जिकल स्ट्राइक की तरह, लेकिन बिना बारूद के, सिर्फ सत्ता की कलम और चाल से।
जाट नेता मंच से कहते हैं “हम संस्कृति बचाएंगे” —सच बात यह है कि उनकी संस्कृति में जांटी फोटो में और जाट पोस्टर में भी अच्छे नहीं लगते हैं।
सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर करोड़ों खर्च करती है, पर खेजड़ी के पेड़ की रक्षा के लिए फंड तक नहीं।
जाट और जांटी (खेजड़ी) एक समाज है, दूसरा पेड़; पर दोनों की किस्मत अजीब तरह से एक-दूसरे से जुड़ गई है। और अफसोस यह है कि दोनों ही आज ख़तरे में हैं।
खेतों में आधुनिक यंत्रों की एंट्री के बाद तो जांटी के पेड़ जैसे “गांव छोड़कर पलायन” कर गए हों। यह मरुस्थल के लिए वैसा ही घाटा है, जैसे ऊंट के बिना रेगिस्तान — दिखेगा तो सही, पर काम का नहीं।
“डबल इंजन” की सरकार को जाट समाज की खटखटाहट शायद पसंद नहीं हो। किसान आंदोलन में आवाज बुलंद करने वालों को हाशिए पर धकेलना और वर्तमान में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का “स्वास्थ्य कारण” वाला इस्तीफा तो जैसे राजनीति का नया मुहावरा ही बन गया — जब तक चमचागिरी करते रहे, संविधान की गरिमा को पार्टी की चौपाल में गिरवी रखते रहे, सब ठीक था; पर जैसे ही थोड़ी “जाट वाली घुंटी” पीकर जुबान चलायी, कुर्सी की कड़ी निकाल दी गई।
स्थिति यह है कि न जांटी के तने बच रहे हैं, न जाट की रीढ़। फर्क बस इतना है कि जांटी को आरी से काटा जा रहा है, और जाट को नीति से। दोनों को “उजाड़ने” की यह संयुक्त कवायद तब तक जारी रहेगी, जब तक जाट समाज के आस्तीन में छुपे छछूंदर बाहर नहीं निकल जाते।
शायद वक्त आ गया है कि खेतों में जांटी के पौधे और समाज में जाट के तेवर — दोनों फिर से रोपे जाएं। वरना इतिहास जाट समाज को यह लिखकर विदा करेगा — “यह वो दौर था, जब जाट और जांटी दोनों को याद करने के लिए बस म्यूजियम और किताबें बची है।”
लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है, पर जाट की राजनीतिक आवाज को “बीमार” या “बागी” घोषित कर किनारे कर दिया जाता है।
आज जाट समाज पूरे देश में बिखरी हुई शक्ति बन गया है। संख्या है, ताकत है, लेकिन संगठित चेतना नहीं।
यह स्थिति ऐसे ही रही तो अगली पीढ़ी को यह सुनना पड़ेगा —
"जाट? हाँ, कभी थे… खेतों में जांटी और राजनीति में जाट — दोनों का सफाया हो गया।"
इसलिए ज़रूरत है एक “झटके” की — आत्मसम्मान का झटका।
जैसे किसान आंदोलन ने साबित किया कि संगठित समाज किसी भी सत्ता से टक्कर ले सकता है, वैसे ही जाटों को अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक एकजुटता फिर से खड़ी करनी होगी।
वरना यह योजनाबद्ध “उजाड़ो अभियान” जाटों को इतिहास में सिर्फ एक अध्याय बना देगा।
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