सच बोलने वाला चला गया: सत्यपाल मलिक और सैद्धांतिक राजनीति की विदाई"

✒️ संपादकीय 
5 अगस्त 2025 

 *"सच बोलने वाला चला गया: सत्यपाल मलिक और सैद्धांतिक राजनीति की विदाई"* 
सत्ता के गलियारों में जहाँ चाटुकारिता, चुप्पी और साजिशें आज सामान्य राजनीति का हिस्सा बन चुकी हैं, वहीं सत्यपाल मलिक जैसी शख्सियत का चले जाना सैद्धांतिक राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है। पूर्व राज्यपाल, पूर्व सांसद और किसान आंदोलन के प्रखर समर्थक के रूप में सत्यपाल मलिक एक ऐसे विरले राजनेता थे, जो पद की नहीं, विचार की राजनीति करते थे। उन्होंने कभी अपनी वाणी को सत्ता के हितों के अनुरूप मोड़ा नहीं, बल्कि बार-बार सच कहने का साहस दिखाया, चाहे उसकी कीमत उन्हें पद गंवाकर ही क्यों न चुकानी पड़ी हो। सत्य की राजनीति करने वाले सत्यपाल मलिक की आश्रुपूर्ति विदाई के समय मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

उनकी मृत्यु की सूचना से देशभर में एक ऐसी शोक लहर है जो केवल व्यक्ति की नहीं, विचार की, साहस की और नैतिक प्रतिबद्धता की विदाई पर व्यथित है। सत्यपाल मलिक का जीवन आज के नेताओं के लिए आइना है, जिसमें देखा जा सकता है कि कैसे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता के खिलाफ खड़ा हुआ जा सकता है — यदि आत्मा ज़िंदा हो और ज़मीर जागता हो।

उन्होंने जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील प्रदेश में राज्यपाल रहते हुए अनेक मुद्दों पर स्पष्ट और जनपक्षधर रुख अपनाया। किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने जिस बेबाकी से केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की और किसानों के पक्ष में खड़े हुए, वह इस बात का प्रमाण है कि उनका रिश्ता केवल पद से नहीं था, बल्कि देश के संविधान, जनसंवेदना और लोकतंत्र की आत्मा से था।

आज जब देश की राजनीति ‘दिखावटी राष्ट्रवाद’ और ‘मार्केटिंग आधारित लोकप्रियता’ के दौर से गुजर रही है, तब सत्यपाल मलिक का चले जाना इस व्यवस्था के लिए चेतावनी है। एक ऐसा व्यक्ति चला गया जो बिना लाग-लपेट के जनता के दर्द को मंच से कहने का साहस रखता था — न झुकता था, न बिकता था।

यह प्रश्न अब हमारे सामने है कि क्या अब भी राजनीति में ऐसे चेहरे बचेंगे जो सत्ता के खिलाफ बोल सकें, चाहे उनकी अपनी कुर्सी ही खतरे में क्यों न आ जाए? क्या अब भी कोई नेता होगा जो राष्ट्रहित को पार्टीहित से ऊपर रखेगा? क्या अब भी कोई ऐसा होगा जो किसानों के साथ खड़ा होगा, जब उन्हें सिर्फ वोटबैंक समझा जाता है?

सत्यपाल मलिक की विरासत हमें यही सिखाती है — “पद से बड़ी प्रतिष्ठा है, और प्रतिष्ठा से बड़ा सत्य।” उनकी मृत्यु हमें उनके जीवन की उस रेखा की याद दिलाती है, जो आज के समय में धुंधला पड़ता जा रहा है — नैतिकता, स्पष्टवादिता और जनसरोकारों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता।

भीम प्रज्ञा परिवार की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहना उचित होगा:
"सत्य की आवाज़ भले ही अब मौन हो गई हो, पर उसकी गूंज जनमानस में तब तक रहेगी, जब तक राजनीति को फिर से जनसेवा और नैतिकता के पथ पर नहीं लाया जाता। सत्यपाल मलिक अब व्यक्ति नहीं, विचार की मशाल हैं — जिसे बुझने नहीं देना है।"

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।