आज़ादी के साए में, लोकतंत्र का आईना

संपादकीय 
14 अगस्त 2025
  *"आज़ादी के साए में, लोकतंत्र का आईना* "

"आज़ादी हमने पाई थी, पर लगता है इसकी ईएमआई अभी भी भरनी बाकी है…!"
15 अगस्त का दिन हमें उस आज़ादी की तपिश का एहसास दिलाता है, जिसे पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने खून और सपनों को दांव पर लगाया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में जेलें भर दी गईं, फांसी के फंदे झूल गए, और आंदोलनकारियों ने यह उम्मीद की थी कि आज़ाद भारत में जनता की आवाज़ ही असली कानून होगी। पर अफ़सोस, आज वही आवाज़ चुनावी भाषणों में ताली बजाने तक सिमट गई है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आजादी के 78 साल बाद भी, राजनीति का रंग उतना ही गाढ़ा है जितना कभी अंग्रेज़ी हुकूमत का था—बस अब रंग बदलते नेता के कपड़े और पार्टी के झंडे हैं। पहले विदेशी ‘हुक्म’ चलता था, अब ‘लोकतांत्रिक हुक्म’ चलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब आदेश अंग्रेज़ी में आते थे, और अब वही आदेश देसी भाषा में लिखकर "जनहित" का ठप्पा लगाकर जारी होते हैं।

15 अगस्त का दिन हमें यह सवाल पूछने पर मजबूर करता है—क्या यह वही आज़ादी है, जिसके लिए भगत सिंह ने मुस्कुराते हुए फांसी का फंदा चूमा था? क्या यह वही समाज है, जिसका सपना बापू ने चरखे के साथ देखा था? या फिर हम एक ऐसे लोकतांत्रिक दशहरे के पात्र बन गए हैं, जिसमें रावण हर साल जलता है लेकिन भ्रष्टाचार, जातिवाद और सत्ता-लोलुपता के सिर नए-नए रूप में उग आते हैं।

आज के नेता स्वतंत्रता दिवस को भी प्रचार मंच मानते हैं—जहां तिरंगा लहराने से ज्यादा फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पोस्ट की चिंता रहती है। आज़ादी का मतलब आज आम आदमी के लिए है—"सस्ता राशन, महंगा सपना और मुफ्त वादों का बोझ"।

मैं पुनः कह रहा हूं 15 अगस्त… इतिहास के पन्नों में यह तारीख कई मायनों में मौन लेकिन गहरी चेतावनी देती है। यह वह काल है जब स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम आहटें गूंज रही थीं, जब देश के वीर अपने सीने पर गोलियां खाने को तैयार थे और नेतृत्व, जनमानस को यह यकीन दिला रहा था कि "आज़ादी" सिर्फ राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति है। उस दौर का सपना था – भूख का अंत, जातिगत बेड़ियों का टूटना, शोषण का समापन और नागरिकों के लिए समान अवसरों वाला समाज।

पर आज़ादी के 78 साल बाद, 15 अगस्त का प्रसंग हमें आईना दिखाता है कि हमने उस "सामाजिक क्रांति" को कहां छोड़ दिया। राजनीति के गलियारों में अब "स्वतंत्रता" का अर्थ सत्ता पर कब्जे की बारी-बारी रह गया है। नेताओं के भाषणों में "राष्ट्रभक्ति" है, लेकिन नीतियों में "स्वार्थभक्ति" का बोलबाला है। जिस आज़ादी के लिए लोग जेलों में सड़े, फांसी के फंदे पर झूले, आज उसकी परिभाषा वोट-बैंक के समीकरण और सोशल मीडिया ट्रेंड से तय होती है।

वर्तमान राजनीति – सामाजिक दशहरे का मंच 
आज की राजनीति किसी दशहरे के मेले जैसी हो गई है – हर पार्टी अपनी "रावण" के  पुतले  तैयार करती है और जनता को जलाने का तमाशा दिखाती है। फर्क बस इतना है कि असली रावण – भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, महंगाई, जातिवाद और नफरत – खुलेआम सड़कों पर घूम रहा है और किसी को जलाने की हिम्मत नहीं होती। वोट से पहले "जनसेवा" का रावण मार दिया जाता है, वोट के बाद वही रावण मंत्री बनकर कुर्सी पर बैठ जाता है।

आजादी का वास्तविक महत्व
स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ सिर्फ अंग्रेज़ी हुकूमत से छुटकारा नहीं था, बल्कि विचार, अभिव्यक्ति, अवसर और गरिमा की स्वतंत्रता था। आज हम भाषण में तो "वसुधैव कुटुम्बकम" बोलते हैं, लेकिन व्यवहार में मोहल्ले की सीमाओं से बाहर भाईचारा नहीं निकाल पाते। स्कूलों में तिरंगा फहराते हैं, लेकिन शिक्षा में असमानता को लहराने देते हैं। अस्पतालों में राष्ट्रगान बजता है, लेकिन इलाज में अमीरी-गरीबी का फर्क बजता रहता है।

15 अगस्त हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले हमें आत्मनिरीक्षण की ज़रूरत है – क्या हम आज़ाद भारत के नागरिक हैं, या सिर्फ सत्ता-परिवर्तन के तमाशे के दर्शक?

अगर आज़ादी एक इंसान होती, तो शायद वह कहती –
"तुम्हारे नेताओं ने मुझे भाषणों में रख दिया, और तुम्हारे समाज ने मुझे फेसबुक पोस्ट में। मेरे असली मायने तुम्हारी सड़कों, खेतों, स्कूलों और अदालतों में कहीं खो गए हैं।"

15 अगस्त हमें याद दिलाता है कि "आजादी" सिर्फ साल में एक दिन मनाने की चीज़ नहीं है, बल्कि हर दिन जीने का तरीका है। इसे बचाने के लिए हमें नेताओं से ज़्यादा खुद को बदलने की ज़रूरत है। जब जनता सवाल पूछना शुरू करेगी, तब असली "स्वतंत्रता" की बयार चलेगी – वरना अगले दशहरे तक रावण बदल जाएगा, लंका वही रहेगी।
  फिर भी सकारात्मक सोच के साथ स्वतंत्रता दिवस की सभी देशवासियों को भीम प्रज्ञा परिवार की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं।

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