"मीडिया की गटरधारा बनाम समाज की चेतना — जिम्मेदार कौन?"
संपादकीय
1 अगस्त 2025
*"मीडिया की गटरधारा बनाम समाज की चेतना — जिम्मेदार कौन?"*
"जब शब्द हथियार बनें और कैमरा साजिश का औजार — तब पत्रकारिता की आत्मा पर संकट खड़ा हो जाता है।"
आज के दौर में पत्रकारिता एक पवित्र दायित्व से गिरकर बाज़ारी तमाशे में बदल गई है। जहां कलम कभी क्रांति की जननी थी, वहां आज वह सनसनी की गुलाम बन चुकी है। सूचना का स्रोत अब सच का आईना नहीं, बल्कि मनोरंजन का भूतिया पर्दा बन गया है — जिसमें समाज की सच्चाई नहीं, बल्कि वासनात्मक फंतासियो, झूठे रोमांच और विकृत लिटरेचर की अश्लील परछाइयां दिखाई जाती हैं।
सवाल केवल यह नहीं कि मीडिया क्या दिखा रहा है, बल्कि यह भी है कि समाज क्या देखना चाहता है। अगर हम अपनी अभिरुचियों में गिरावट नहीं लाएंगे, तो पत्रकारिता में उच्चता की कोई उम्मीद करना सिर्फ़ एक ढकोसला होगा। यह समय है — चेतना की पुकार उठाने का, सच्चे पत्रकारों को मंच देने का, और मानसिक विषाक्तता फैलाने वाले मीडिया पर खुलकर बहिष्कार करने का। अब आवश्यकता टीआरपी की नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की पत्रकारिता को फिर से जीवित करने की। पत्रकारिता के वर्तमान हालातो को देखकर मन बड़ा कुंठित था। पत्रकारिता में प्रक्रिया जारी गटर धारा को देखकर मन बड़ा व्यथित था । अंदर से आत्मा बहुत कचोट रही थी। लेकिन ऐसे दौर में चुप रहना भी तो बड़ा गुनाह है, इसलिए मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
"अगर हमने अब भी पत्रकारिता की गटरधारा को रोका नहीं, तो कल हमारी पीढ़ियां इसी गंदगी को इतिहास समझकर पढ़ेंगी।"और भविष्य में नजीर के रूप में इतिहास की प्रमाणिकता का दावा करेंगे।
*जब सूचना का स्त्रोत विष बन जाए...*
आज का मीडिया, विशेषकर डिजिटल और सोशल मीडिया, सूचनाओं का माध्यम कम और "सस्ते सनसनीखेज लिटरेचर" का भट्ठा ज़्यादा बनता जा रहा है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप से लेकर तथाकथित "न्यूज पोर्टल" और "वेब रिपोर्टर" — हर कोई आज पत्रकारिता का बिल्ला तो लगाए हुए है, लेकिन उसके मूल मूल्यों को नष्ट करने में ही सबसे आगे है।
जहाँ एक ओर राष्ट्र निर्माण, सामाजिक चेतना और नैतिक विमर्श की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर हमारी स्क्रीन पर चल रहा है — "लड़की भाग गई", "भाभी जी का नया प्यार", "शादी का ड्रामा", "गांव की भूतिया कहानी", "पत्नी ने छोड़ा घर", "लव अफेयर का खुलासा" — क्या यही है आज की पत्रकारिता?
*मीडिया नहीं, अब 'मानसिक पोर्नोग्राफी' का दौर है*
इसे केवल मीडिया प्रदूषण नहीं, "मानसिक अश्लीलता" कहा जाए तो बेहतर होगा। ये कंटेंट न केवल समाज की संवेदनाओं को कुंद करता है, बल्कि युवा पीढ़ी के मानस को जहरीला और भ्रमित करता है। एक क्लिक में जिस तरह की भाषा, दृश्य और थंबनेल दिखाई जाती है, वह न केवल स्त्री-विरोधी है बल्कि समाज को मानसिक विकलांगता की ओर ढकेल रही है।
*शिक्षाप्रद और संवेदनशील पत्रकारिता क्यों दम तोड़ रही है?*
इसका उत्तर समाज की बदलती अभिरुचि में छिपा है। आज ज़्यादातर लोग "नैतिकता" या "सामाजिक सरोकार" की बात सुनना नहीं चाहते। युट्यूब के ट्रेंडिंग सेक्शन में झांको — साहित्य, संविधान, सामाजिक समता, शिक्षा, या इतिहास की बात करने वालों को 1 हज़ार व्यू भी नसीब नहीं होते, वहीं "शादी भागने", "बेटी ने की ज़िद", "साली से प्रेम" जैसे विषयों पर लाखों-करोड़ों व्यू हैं।
*यह समाज की संज्ञानात्मक गिरावट का स्पष्ट संकेत है।*
सवाल यह है — जिम्मेदार कौन है?
1. क्या ये प्लेटफ़ॉर्म? — जो सिर्फ़ एल्गोरिथ्म से तय करते हैं कि ज्यादा क्लिक्स आए तो वही 'सच्चा कंटेंट' है?
2. क्या वो यूट्यूबर और रिपोर्टर? — जो TRP और व्यूज के लिए अपने आत्मसम्मान को भी गिरवी रख देते हैं?
3. या हम खुद? — जो ऐसी गंध को देखकर भी उसे शेयर करते हैं, लाइक करते हैं, बार-बार क्लिक करते हैं?
सच तो यह है कि सभी दोषी हैं — लेकिन सबसे बड़ा दोषी है वह दर्शक, जो इस मानसिक विष को पचा रहा है, और फिर समाज से शुद्धता की अपेक्षा रखता है।
*लेकिन उम्मीद अभी बाकी है...*
कुछ पत्रकार, लेखक, विचारक आज भी नफरत और गंदगी की इस बाढ़ में एक "संयम की नाव" लेकर संघर्ष कर रहे हैं। वे जानते हैं कि "नैतिकता बिकती नहीं, लेकिन स्थायित्व वही लाती है।" ऐसे लोगों के लिए यह समय बेहद कठिन है — क्योंकि अब 'सच्चाई बोलना' गुनाह समझा जाता है। लेकिन जब समाज थक कर झूठ से ऊब जाएगा, तब यही ‘स्वाभिमानी पत्रकारिता’ ही उसे नया रास्ता दिखाएगी।
*मीडिया नहीं, हमें खुद को बदलना होगा*
अगर हम नहीं चाहते कि आने वाली पीढ़ी यूट्यूब की अश्लील थंबनेल में संस्कार खोजे, तो हमें देखने, पढ़ने, और साझा करने की आदतों में क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। तभी ‘भीम प्रज्ञा’, ‘प्रेमचंद’, ‘बाबासाहेब’, ‘फुले’, ‘नगेंद्र नाग’ और ‘कुशवाहा कांत’ की विरासत जिंदा रह पाएगी।
वरना सोशल मीडिया की ये गटरधारा अंततः हमारे विवेक को ही डुबो देगी।
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