पुस्तकालय – ज्ञान की ज्योति और समाज परिवर्तन का केंद्र”
संपादकीय-
12 अगस्त 2025
*“पुस्तकालय – ज्ञान की ज्योति और समाज परिवर्तन का केंद्र”*
(विश्व पुस्तकालय दिवस विशेष)
"कभी ये पुस्तकालय गांव व शहरों का दिल हुआ करता था… जहां पन्नों की सरसराहट में सपने जन्म लेते थे। लेकिन आज वही किताबें, धूल और जाले ओढ़े, मानो अपने पाठकों का इंतज़ार कर रही हों।"
राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस, सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि ज्ञान के उस अनंत सागर का स्मरण है, जिसमें डूबकर पीढ़ियां अपने भविष्य की दिशा तय करती रही हैं। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि हमारे कई सरकारी और ग्रामीण पुस्तकालय अपनी जीवंतता खो चुके हैं।
अलमारियों में बंद किताबें पीली पड़ रही हैं, पन्नों की महक में अब बासीपन घुल गया है और वहां बैठने वाले पाठकों की जगह अब सन्नाटा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
21वीं सदी में जहां ई-बुक, ऑडियो बुक और डिजिटल प्लेटफॉर्म का बोलबाला है, वहीं पारंपरिक पुस्तकालय अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह विडंबना है कि शिक्षा और करियर की दौड़ में युवा पीढ़ी को "ज्ञान के मंदिर" की चौखट तक आने का समय नहीं मिल रहा।
यदि हम चाहते हैं कि पुस्तकालय पुनः समाज के केंद्र बनें, तो उन्हें आधुनिक तकनीक से लैस करना होगा ,हाईस्पीड इंटरनेट, ई-बुक रीडिंग कॉर्नर, डिजिटल कैटलॉग सिस्टम, करियर और स्किल डेवलपमेंट के लिए विशेष सेक्शन, बच्चों के लिए क्रिएटिव रीडिंग स्पेस की आवश्यकता है।
हम भूल गए हैं कि एक पुस्तकालय केवल किताबों का घर नहीं होता, यह विचारों का मंदिर, समाज की स्मृति, और आने वाली पीढ़ियों की चेतना का संरक्षक होता है। गांवों और शहरों में पुस्तकालयों के दरवाज़े जंग खा रहे हैं, अलमारियों में धूल जम रही है, और किताबें अपने पाठकों का इंतज़ार करते-करते पीली पड़ चुकी हैं। स्कूल और कॉलेज में डिजिटल बहाने देकर लाइब्रेरी को हाशिए पर डाल दिया गया है। यह केवल ज्ञान का नुकसान नहीं है, यह संस्कृति और सभ्यता की रीढ़ तोड़ने जैसा अपराध है। जब हम बच्चों को केवल स्क्रीन में बंद कर देंगे, तो उनकी सोच, उनकी जिज्ञासा और उनका चरित्र भी स्क्रीन के फ्रेम में कैद हो जाएगा। पुस्तकालयों को बचाना सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर हमने आज इन्हें नहीं बचाया, तो आने वाले समय में इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।
आज के डिजिटल युग में, जब सूचनाओं का प्रवाह एक क्लिक की दूरी पर है, तब भी पुस्तकालय का महत्व कम नहीं हुआ है — बल्कि पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
पुस्तकालय केवल पुस्तकों का संग्रहालय नहीं, बल्कि विचारों का मंदिर, संस्कृति का भंडार और नवाचार का प्रेरणा-स्त्रोत है।
भीम प्रज्ञा सेंट्रल लाइब्रेरी जैसे संस्थान यह प्रमाणित करते हैं कि यदि सही दिशा और सोच के साथ प्रयास किया जाए तो पुस्तकालय, खासकर ग्रामीण क्षेत्र में, शिक्षा और जागरूकता की क्रांति ला सकते हैं।
ग्रामीण भारत में लाइब्रेरी की आज भी ज़रूरत है। गांव और ढाणियों के युवा अक्सर करियर और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उचित संसाधनों के अभाव से जूझते हैं। निजी कोचिंग महंगी है, और इंटरनेट डेटा होने के बावजूद सही मार्गदर्शन और अनुशासन का अभाव रहता है। ऐसे में, एक सुव्यवस्थित और ई-लाइब्रेरी से युक्त पुस्तकालय युवाओं को न केवल अध्ययन की सामग्री देता है, बल्कि अनुशासित अध्ययन संस्कृति भी सिखाता है।
देश के अनेक हिस्सों में आज भी पुस्तकालयों की स्थिति दयनीय है — पुरानी, फटी-पुरानी किताबें, टूटी रैक, धूल और कीड़ों से भरे पन्ने। न तो आधुनिक तकनीक का समावेश है, न पाठकों को आकर्षित करने के लिए कोई नवीन पहल। इसी स्थिति को बदलने की जिम्मेदारी आधुनिक लाइब्रेरी पैटर्न अपनाने की है — जहां किताबें, ई-बुक्स, ऑडियो-बुक्स, ऑनलाइन लेक्चर्स और डिजिटल कंटेंट एक ही स्थान पर उपलब्ध हों।
ग्रामीण क्षेत्र में स्थापित भीम प्रज्ञा सेंट्रल लाइब्रेरी ने यह साबित किया है कि लाइब्रेरी केवल “ज्ञान भंडार” नहीं, बल्कि जीवन परिवर्तन का केंद्र बन सकती है।
यहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अद्यतन पुस्तकें और ई-संसाधन उपलब्ध हैं।
गांव-ढाणी स्तर पर ई-लाइब्रेरी से जुड़े उपकेंद्र बनाए जा रहे हैं।
युवा वर्ग को पढ़ने की आदत डालने के लिए “पढ़ो और बढ़ो” अभियान चलाया जा रहा है।
यदि देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस मॉडल को अपनाया जाए तो न केवल शिक्षा का स्तर ऊंचा होगा, बल्कि रोज़गार, शोध और नवाचार की नई राहें खुलेंगी।
विश्व पुस्तकालय दिवस पर हम यह संकल्प लें कि पुस्तकालय को केवल किताबों की अलमारी नहीं, बल्कि ज्ञान की ज्योति और सामाजिक परिवर्तन का दीपस्तंभ बनाएंगे।
यदि हम पुस्तकालयों को जीवित रखना चाहते हैं, तो उन्हें सिर्फ किताब रखने का स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान और नवाचार के केंद्र बनाना होगा। युवा पीढ़ी को वहां खींचने के लिए तकनीक, रचनात्मक कार्यक्रम और प्रेरणादायक माहौल जरूरी है।
और राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस पर यह संकल्प लेना होगा —
"पुस्तकालय को सिर्फ देखने के लिए नहीं, जीने के लिए अपनाएं।"
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