बढ़ता अपराध और समाज की चुप्पी एवं रिश्तों का क्षरण
संपादकीय
18 अगस्त 2025
*“बढ़ता अपराध और समाज की चुप्पी एवं रिश्तों का क्षरण”*
आज का समाज जिस भयावह दौर से गुजर रहा है, उसमें केवल अपराध ही नहीं बढ़ रहे, बल्कि नैतिकता और संवेदनाओं का ह्रास भी हो रहा है। लोहारू क्षेत्र की लेडी टीचर के साथ हुई दरिंदगी और उसकी निर्मम हत्या ने न केवल हरियाणा बल्कि पूरे देश के दिल को झकझोर दिया है। एक ओर सिंघाना क्षेत्र में पुत्र द्वारा पिता की हत्या जैसी वीभत्स घटना सामने आती है, तो दूसरी ओर खैरथल तिजारा का मामला जहां पत्नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी और शव को नीले ड्रम में छिपा दिया—अपराध से बचने के लिए सोशल मीडिया पर पति परमेश्वर के समान दर्जा देने रील बनाकर शक जाहिर नहीं होने ड्रामा दिखाना यह सब दर्शाता है कि समाज के भीतर कहीं न कहीं दरार गहरी होती जा रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
विडंबना यह है कि यह अपराध केवल व्यक्तिगत नहीं रह गए, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना पर चोट करने लगे हैं। रिश्तों में विश्वास की डोर टूट रही है और निजी लालसाएं समाज को कलंकित कर रही हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपराधी मानसिकता को कहीं न कहीं हमारी सामाजिक प्रवृत्तियां और दिखावे की संस्कृति भी बढ़ावा दे रही हैं।
आज सोशल मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम और रील कल्चर ने एक नई बीमारी जन्म दी है—“दिखावे की होड़।” मनोरंजन और रचनात्मकता के नाम पर अश्लीलता, फूहड़पन और नंगेपन का प्रदर्शन आम हो गया है। यह प्लेटफॉर्म जहां युवा पीढ़ी को नई दिशा दे सकता था, वहीं आज मानसिक तनाव, ईर्ष्या, दिखावा और अंधानुकरण का ज़हर घोल रहा है। परिवार और रिश्ते दरक रहे हैं, क्योंकि आभासी चमक-दमक की दुनिया ने हमें वास्तविक जीवन से काट दिया है।
समाज में पनप रही यह विद्रूपता और नैतिक पतन केवल कानून से नहीं रोका जा सकता। पुलिस और अदालतें अपराधियों को सजा दे सकती हैं, लेकिन अपराध की जड़ें वहीं रहेंगी जहां समाज की चुप्पी और संवेदनहीनता मौजूद है। जब तक परिवार और समाज भीतर से नैतिक चेतना और अनुशासन की शिक्षा नहीं देंगे, तब तक यह अपराधों की श्रृंखला थमने वाली नहीं है।
यही कारण है कि आज हमारे समाज का स्वास्थ्य खतरनाक ढलान पर है। मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। दुखद यह है कि सामाजिक ताना-बाना, जो कभी हमारे संस्कार और मर्यादा की ढाल था, अब दूषित होकर अपराध की उपजाऊ भूमि बन गया है।
आज अपराध केवल सड़कों या अंधेरी गलियों में नहीं पनप रहे, बल्कि परिवारों के भीतर, रिश्तों की नींव में दरार डालते हुए उभर रहे हैं। यह सब केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं हैं, बल्कि यह पूरे समाज की संवेदनहीनता और मौन स्वीकृति का परिणाम हैं।
सोशल मीडिया पर मानसिक कचरा परोसना और टीआरपी के लिए संवेदनाओं का दोहन करना स्थिति को और विकराल बना रहा है। सत्य कहने की हिम्मत कम होती जा रही है। जिनकी छवि ईमानदारी और पारदर्शिता की है, वे अपराध के सामने मौन साध लेते हैं। यही मौन अपराधियों का हथियार बनता है, यही चुप्पी उन्हें पनाह देती है।
आज स्थिति यह है कि जिन रिश्तों पर हमें सबसे अधिक भरोसा होना चाहिए, वही संदेह के घेरे में आ रहे हैं। आस्तीन के सांपों की पहचान कठिन हो गई है। जो पवित्र बंधन कभी सुरक्षा का अहसास कराते थे, अब उन्हीं के भीतर से अपराध जन्म ले रहे हैं।
सवाल यह है कि समाज कब तक इस मौन का बोझ उठाएगा?
क्या हम यह स्वीकार कर चुके हैं कि अपराध जीवन की स्वाभाविक परिणति है?
क्या हमें यह मंज़ूर है कि रिश्ते अब विश्वास नहीं, शक का प्रतीक बन जाएं?
आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि—परिवार बच्चों को रिश्तों की पवित्रता और मानवीय मूल्यों का संस्कार दें। स्कूल और कॉलेज केवल डिग्री देने का स्थान न बनकर, चरित्र निर्माण की पाठशाला भी बनें। सोशल मीडिया पर नियंत्रण और आत्मसंयम दोनों की ज़रूरत है। मनोरंजन ज़रूरी है, लेकिन अश्लीलता और अंधानुकरण की कीमत पर नहीं।
समाज को जागृत होकर ऐसे अपराधों और प्रवृत्तियों के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी, वरना यह विषाक्तता हर घर तक पहुंच जाएगी।
हमें यह समझना होगा कि सभ्यता का अर्थ केवल तकनीकी विकास या चमक-दमक नहीं है, बल्कि रिश्तों की मर्यादा, मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी है। यदि हम अभी नहीं जागे, तो आने वाला समाज न रिश्ते पहचानेगा, न संवेदना।
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