इलाज के नाम पर सच और झूठ का खेल — जब तक चेतना नहीं, तब तक व्यवस्था नहीं


संपादकीय@हरेश पंवार 12 फरवरी 2026

 *इलाज के नाम पर सच और झूठ का खेल — जब तक चेतना नहीं, तब तक व्यवस्था नहीं*
स्वास्थ्य योजनाएं किसी भी सभ्य समाज की संवेदनशील पहचान होती हैं। इनका उद्देश्य होता है कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी बिना भय और बोझ के इलाज पा सके। लेकिन आज की कड़वी सच्चाई यह है कि इलाज और वसूली, सेवा और सौदेबाज़ी के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। निजी अस्पतालों में मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह केवल व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का परिणाम है—जिसमें सच कम और झूठ ज़्यादा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह मान लेना कि कानून को और कठोर बना देने से, या कार्ड की प्रक्रिया को और जटिल कर देने से यह गोरखधंधा रुक जाएगा, अपने आप में एक भ्रम है। कागज़ पर कानून जितने भी सख्त क्यों न हों, ज़मीन पर जब तक नीयत नहीं बदलेगी, तब तक परिणाम नहीं बदलेंगे। आज समस्या केवल अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव-गांव फैले उस कमीशनखोरी नेटवर्क तक पहुँच चुकी है, जो कार्डधारकों की तलाश में घूम रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में एक नया “व्यवसाय” पनप चुका है। दलाल, बिचौलिए और तथाकथित समाजसेवी घर-घर जाकर कार्डधारकों को यह समझाते हैं कि “इलाज फ्री है”, “जांच करवा लो”, “अस्पताल ले चलेंगे”, “एम्बुलेंस फ्री आएगी”। बीमारी हो या न हो, मानसिक रूप से बीमारी का डर पैदा कर लोगों को अस्पताल की दहलीज तक पहुंचाया जा रहा है। गांव से शहर तक एंबुलेंस दौड़ रही हैं—मरीज कम, कार्ड ज़्यादा।

अस्पताल पहुँचते ही यह नेटवर्क आगे बढ़ जाता है। वहां मौजूद काउंसलर, एजेंट और मार्केटिंग से जुड़े लोग जांचों की एक लंबी सूची थमा देते हैं। सामान्य व्यक्ति, जिसे लगता है कि जेब से पैसा नहीं जा रहा, बिना सवाल किए सब कुछ स्वीकार कर लेता है। यही वह बिंदु है, जहाँ सच इलाज पीछे छूट जाता है और झूठा इलाज आगे आ जाता है।

सच यह है कि कई बार इलाज ज़रूरी होता है। सच यह भी है कि आधुनिक जांचें जीवन रक्षक हो सकती हैं। लेकिन झूठ यह है कि हर मरीज को भर्ती करना ज़रूरी है। झूठ यह है कि हर जांच अनिवार्य है। झूठ यह भी है कि “सरकार दे रही है” तो संसाधनों का दुरुपयोग कोई अपराध नहीं। यही झूठ धीरे-धीरे योजनाओं की आत्मा को खोखला कर रहा है।

इस पूरे खेल में अस्पताल प्रबंधन ने मार्केटिंग की नई एजेंसियाँ खड़ी कर ली हैं। ये एजेंसियाँ मरीज नहीं, बल्कि कार्ड खोजती हैं। जितना ज़्यादा क्लेम, उतना ज़्यादा मुनाफा। नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारी और ज़मीनी स्वास्थ्यकर्मी आज भी सीमित वेतन और असुरक्षित हालात में काम कर रहे हैं, जबकि असली कमाई प्रबंधन और नेटवर्क के हाथों में सिमट जाती है। यह असमानता भी इस व्यवस्था का एक बड़ा सच है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

लेकिन केवल अस्पताल और नेटवर्क को दोष देना भी अधूरा सच होगा। इस व्यवस्था को चलाने में हमारी सामूहिक मानसिकता भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। जब तक आम व्यक्ति यह नहीं समझेगा कि हर जांच जरूरी नहीं, हर भर्ती फायदेमंद नहीं और हर सुविधा मुफ्त नहीं होती—तब तक यह चक्र चलता रहेगा। जब तक लोग बिना जरूरत जांच की पर्चियाँ लेकर, दवाइयों की थैलियाँ उठाए घूमते रहेंगे, तब तक योजनाओं का दुरुपयोग रुकने वाला नहीं है।

असल बदलाव कानून से नहीं, मानसिक परिपक्वता से आएगा। मरीज को भी सवाल पूछने होंगे—“यह जांच क्यों?”, “भर्ती क्यों?”, “कोई दूसरा विकल्प?”। समाज को यह समझना होगा कि योजना का उपयोग और दुरुपयोग के बीच फर्क क्या है। जरूरतमंद का हक तभी बचेगा, जब गैर-जरूरतमंद खुद पीछे हटना सीखेगा।

यह आलेख डॉक्टरों या चिकित्सा विज्ञान के खिलाफ नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ है, जिसने इलाज को व्यापार और बीमारी को अवसर बना दिया है। अगर आज सच और झूठ के इस फर्क को नहीं पहचाना गया, तो कल वही योजनाएँ, जो आज जीवन रेखा हैं, अविश्वास और संदेह का कारण बन जाएँगी।

स्वास्थ्य सेवा तभी बचेगी, जब सरकार की निगरानी, अस्पताल की नैतिकता और नागरिक की चेतना—तीनों एक साथ जागें। वरना कार्ड तो चलते रहेंगे, एंबुलेंस भी दौड़ती रहेंगी, लेकिन इलाज कहीं पीछे छूट जाएगा।

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