दूसरों को गिराकर नहीं, उठाकर मिलती है असली ऊँचाई
संपादकीय@ 25.02.2026
*दूसरों को गिराकर नहीं, उठाकर मिलती है असली ऊँचाई*
समाज में हम अक्सर ऐसे लोगों से रूबरू होते हैं जो दूसरों को छोटा दिखाकर स्वयं को बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं। वे आलोचना, उपहास और तिरस्कार के माध्यम से यह जताने का प्रयास करते हैं कि वे श्रेष्ठ हैं। लेकिन गहराई से देखें तो यह व्यवहार आत्मविश्वास का नहीं, बल्कि अंदरूनी डर और असुरक्षा का संकेत होता है। जो व्यक्ति अपनी काबिलियत को लेकर आश्वस्त नहीं होता, वही दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं को “सुरक्षित” महसूस करना चाहता है। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
मानव मनोविज्ञान बताता है कि असुरक्षा की भावना व्यक्ति को नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की ओर धकेलती है। जब किसी को लगता है कि उसकी तुलना में दूसरा अधिक सक्षम, लोकप्रिय या सफल है, तो वह ईर्ष्या का शिकार हो सकता है। यह ईर्ष्या कई बार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है, लेकिन जब आत्मसम्मान की कमी होती है, तो यही भावना दूसरों को गिराने के प्रयास में परिवर्तित हो जाती है। व्यक्ति को भ्रम होता है कि यदि सामने वाला कमजोर दिखेगा, तभी वह स्वयं मजबूत दिखाई देगा।
यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है; कार्यस्थलों, सामाजिक समूहों और यहाँ तक कि परिवारों में भी देखने को मिलती है। कार्यालयों में कुछ लोग सहकर्मियों की उपलब्धियों को कमतर आंकने की कोशिश करते हैं। मित्र समूहों में भी कभी-कभी व्यंग्य और कटाक्ष के माध्यम से किसी को असहज किया जाता है। परिवारों में भाई-बहनों या रिश्तेदारों के बीच तुलना और आलोचना का माहौल बन जाता है। यह सब उस मानसिकता का परिणाम है जो स्वयं को स्थापित करने के लिए दूसरों को गिराने का सहारा लेती है।
वास्तव में, ऐसा व्यवहार किसी को स्थायी लाभ नहीं देता। जो व्यक्ति दूसरों को छोटा दिखाता है, वह अपनी नकारात्मक छवि स्वयं गढ़ता है। समाज धीरे-धीरे उसकी सोच को पहचान लेता है और उससे दूरी बनाने लगता है। अल्पकालिक संतोष भले मिल जाए, लेकिन दीर्घकालिक सम्मान कभी प्राप्त नहीं होता। सम्मान अर्जित करने के लिए चरित्र, सहानुभूति और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है, न कि आलोचना और अपमान की।
सच्ची महानता दूसरों को ऊपर उठाने में है। जो व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखता है, वह दूसरों की सफलता से भयभीत नहीं होता। वह जानता है कि किसी और की प्रगति उसकी प्रगति को कम नहीं करती। बल्कि सहयोग और सकारात्मकता का वातावरण सभी के लिए लाभकारी होता है। एक स्वस्थ मस्तिष्क वही है जो अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है और दूसरों की विशिष्टताओं का सम्मान करता है।
समाज को ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है जहाँ प्रतिस्पर्धा हो, परंतु कटुता नहीं; जहाँ आलोचना हो, परंतु अपमान नहीं। सकारात्मक प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करती है, जबकि नकारात्मकता केवल संबंधों को कमजोर करती है। यदि कोई व्यक्ति दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करे, तो उसके शब्दों को अपनी आत्ममूल्य का आधार नहीं बनाना चाहिए। ऐसे लोगों से बहस करने के बजाय संयम और दूरी बनाए रखना ही बुद्धिमानी है। हर प्रतिक्रिया आवश्यक नहीं होती; कई बार मौन ही सबसे प्रभावी उत्तर होता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। किसी की उपलब्धि हमें प्रेरित कर सकती है, लेकिन तुलना का जाल हमें कमजोर कर देता है। यदि हम स्वयं पर ध्यान केंद्रित करें, अपने कौशल को विकसित करें और अपने लक्ष्य स्पष्ट रखें, तो दूसरों को गिराने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। आत्मविश्वास का वास्तविक स्रोत भीतर से आता है, बाहरी प्रशंसा या तुलना से नहीं।
भारतीय संस्कृति में भी विनम्रता को उच्च स्थान दिया गया है। कहा जाता है, “जो पेड़ फलों से लदा होता है, वह झुका रहता है।” इसका अर्थ है कि जितना व्यक्ति गुणों और उपलब्धियों से समृद्ध होता है, उतना ही विनम्र होता जाता है। जो लोग वास्तविक रूप से सक्षम होते हैं, उन्हें अपनी श्रेष्ठता साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनका आचरण और कार्य स्वयं उनकी पहचान बन जाते हैं।
आज के दौर में सोशल मीडिया ने तुलना और प्रतिस्पर्धा की भावना को और बढ़ा दिया है। लोग अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करते हैं, और कई बार दूसरों की उपलब्धियों को कमतर आंकने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे समय में मानसिक संतुलन और आत्मसम्मान को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। हमें यह समझना होगा कि असली बड़प्पन दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ने में है।
अंततः, ऊँचाई पाने के लिए पंखों की आवश्यकता होती है, न कि किसी और की नींव काटने की। यदि हम दूसरों को गिराकर ऊपर चढ़ने की कोशिश करेंगे, तो हमारी नींव ही कमजोर हो जाएगी। लेकिन यदि हम सहयोग, सम्मान और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ेंगे, तो हमारी प्रगति स्थायी और सम्मानजनक होगी।
समाज को ऐसे व्यक्तित्वों की आवश्यकता है जो प्रेरणा बनें, न कि भय का कारण। जो आत्मविश्वास से भरे हों, न कि असुरक्षा से। और जो दूसरों को छोटा दिखाने के बजाय, उन्हें साथ लेकर ऊँचाई की ओर बढ़ें। क्योंकि अंततः, सच्ची महानता वही है जो अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी प्रकाश भर दे।
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