परिवार को जोड़े रखने वाली ‘आलपीन’ की अनदेखी पीड़ा

 संपादकीय@23 फरवरी 2026

 *परिवार को जोड़े रखने वाली ‘आलपीन’ की अनदेखी पीड़ा* 
कागज़ों के एक बिखरे हुए पुलिंदे को यदि व्यवस्थित और सुरक्षित रखना हो, तो एक छोटी-सी आलपीन ही पर्याप्त होती है। वह स्वयं कागज़ों को चुभती है, पर उन्हीं कागज़ों को एक क्रम, एक दिशा और एक पहचान भी देती है। यदि वह पीन हटा दी जाए, तो वही कागज़ बिखर जाते हैं, उनका क्रम टूट जाता है और उनमें लिखी बातों का अर्थ भी बदल सकता है। ठीक इसी प्रकार परिवार में भी एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो सबको जोड़े रखने का प्रयास करता है। उसका प्रयास कई बार कठोर, अनुशासनात्मक या ‘चुभने’ वाला प्रतीत होता है, किंतु उसका उद्देश्य केवल परिवार को संगठित और सुरक्षित रखना होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज के बदलते सामाजिक परिवेश में परिवार की परिभाषा और संरचना दोनों तेजी से परिवर्तित हो रही हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और निजी निर्णयों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। यह परिवर्तन बुरा नहीं है, परंतु जब स्वतंत्रता वर्चस्व की लड़ाई में बदल जाती है, तब परिवार की एकता खतरे में पड़ जाती है। हर व्यक्ति परिवार में ‘मुख्य पृष्ठ’ बनना चाहता है, जबकि यह भूल जाता है कि किसी भी पुस्तक की मजबूती केवल उसके मुखपृष्ठ से नहीं, बल्कि सभी पृष्ठों के सुव्यवस्थित क्रम से होती है।

परिवार में जो व्यक्ति सबको जोड़कर रखने का प्रयास करता है, वह अक्सर आलोचना का शिकार बनता है। उसे नियंत्रक, हस्तक्षेप करने वाला या रूढ़िवादी कह दिया जाता है। उसकी बातों को ‘चुभन’ के रूप में देखा जाता है, जबकि वह केवल परिवार के हित में अनुशासन और संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। जैसे आलपीन का काम कागज़ों को घायल करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखना है; वैसे ही परिवार के इस ‘आलपीन’ का उद्देश्य किसी की स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि संबंधों को बिखरने से बचाना होता है।

वास्तव में परिवार एक संस्था है, जहाँ केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। यदि हर सदस्य केवल अपनी स्वतंत्रता और इच्छाओं को सर्वोपरि रखेगा, तो सामूहिक संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान आवश्यक है, परंतु वह सामूहिक उत्तरदायित्व की कीमत पर नहीं होना चाहिए। जब परिवार में संवाद की जगह अहंकार ले लेता है, तब विखंडन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

आज के समय में ‘मेरा जीवन, मेरी मर्जी’ का विचार तेजी से फैल रहा है। यह सोच व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है, लेकिन जब यही सोच रिश्तों में संवाद और समझ की जगह ले लेती है, तब समस्याएँ जन्म लेती हैं। परिवार केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं, विश्वास और परस्पर त्याग का संगम है। यदि प्रत्येक सदस्य स्वयं को केंद्र में रखकर निर्णय लेगा, तो समन्वय असंभव हो जाएगा।

परिवार को जोड़े रखने वाला व्यक्ति अक्सर मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। वह झगड़ों को शांत करता है, गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश करता है और सभी को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करता है। परंतु यही भूमिका उसे सबसे अधिक ‘चुभने’ वाली बना देती है, क्योंकि वह हर किसी को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराता है। अनुशासन और संयम की बात करना आज के दौर में अलोकप्रिय हो सकता है, परंतु बिना अनुशासन के कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती।

यदि कागज़ों का क्रम बदल जाए, तो पूरी फाइल का संदर्भ बिगड़ सकता है। ठीक वैसे ही, जब परिवार में प्राथमिकताओं का क्रम बदल जाता है—जहाँ ‘हम’ की जगह ‘मैं’ आ जाता है—तब रिश्तों का ताना-बाना कमजोर होने लगता है। संवाद खंडित हो जाता है, विश्वास कमज़ोर पड़ जाता है और अंततः संबंध औपचारिकता तक सीमित रह जाते हैं।

यह भी सत्य है कि परिवार को जोड़े रखने वाले व्यक्ति को अपनी भूमिका निभाते समय संवेदनशीलता और संतुलन बनाए रखना चाहिए। अत्यधिक कठोरता या पक्षपात भी विघटन का कारण बन सकता है। आलपीन यदि अत्यधिक दबाव से चुभे, तो कागज़ फट सकते हैं। इसलिए संयम और सहानुभूति दोनों आवश्यक हैं। परिवार में नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब परिवार के सदस्य उस ‘आलपीन’ की भूमिका और उसके महत्व को समझने से इंकार कर देते हैं। वे केवल चुभन देखते हैं, उसके उद्देश्य को नहीं। जबकि यदि थोड़ी समझदारी और संवाद से काम लिया जाए, तो वही चुभन एकता का आधार बन सकती है। परिवार में मतभेद स्वाभाविक हैं, परंतु मनभेद घातक होते हैं। मतभेद संवाद से सुलझाए जा सकते हैं, परंतु मनभेद अहंकार से जन्म लेते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम परिवार की संरचना और उसमें निभाई जाने वाली भूमिकाओं का पुनर्मूल्यांकन करें। स्वतंत्रता और संगठन के बीच संतुलन बनाना ही स्वस्थ परिवार की कुंजी है। हर सदस्य को यह समझना होगा कि व्यक्तिगत उन्नति तभी सार्थक है, जब वह सामूहिक एकता को क्षति न पहुँचाए।

अंततः, परिवार एक पुस्तक की तरह है, जिसमें हर पृष्ठ का महत्व है। कोई भी पृष्ठ स्वयं में पूर्ण नहीं, पर सभी मिलकर एक कहानी रचते हैं। उस कहानी को सुव्यवस्थित रखने के लिए यदि कोई ‘आलपीन’ बनता है, तो उसकी चुभन को समझने की आवश्यकता है, न कि उसे दोष देने की। क्योंकि जब वह हट जाती है, तब बिखराव का दर्द कहीं अधिक गहरा होता है।

परिवार को संगठित रखना एक कठिन, किंतु अत्यंत आवश्यक जिम्मेदारी है। यदि हम इस जिम्मेदारी को समझें और सम्मान दें, तो शायद हमारे रिश्ते भी उसी तरह सुरक्षित और सुव्यवस्थित रह सकेंगे, जैसे एक फाइल में सहेजे गए कागज़—एक सूत्र में बंधे, क्रमबद्ध और अर्थपूर्ण।

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

जो व्यक्ति परिस्थितियों के बदलने का इंतज़ार करता है, वह समय के साथ बह जाता है;
और जो व्यक्ति स्वयं को बदलने का साहस रखता है, वही समय की दिशा बदल देता है।

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