दूध या जहर? मिलावट के साए में भारत की थाली और स्वास्थ्य का भविष्य
संपादकीय0@16फरवरी2026
*दूध या जहर? मिलावट के साए में भारत की थाली और स्वास्थ्य का भविष्य*
“दूध नहीं, जहर पी रहा है इंडिया”—यह वाक्य अतिशयोक्ति प्रतीत हो सकता है, लेकिन जब उत्पादन और खपत के आंकड़ों के बीच भारी अंतर दिखाई देता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि देश में दूध का उत्पादन लगभग 14 करोड़ लीटर प्रतिदिन है और खपत 64 करोड़ लीटर तक बताई जाती है, तो शेष दूध कहाँ से आ रहा है? यह अंतर केवल सांख्यिकीय भ्रम नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारत लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश कहलाता रहा है। गांवों में पशुपालक परिवारों की मेहनत से दूध की धारा बहती है। लेकिन आज आम उपभोक्ता तक जो दूध पहुँचता है, वह सीधे पशुपालक से नहीं आता। बीच में कई परतें हैं—स्थानीय संग्रह केंद्र, फैट डेयरियाँ, प्रोसेसिंग यूनिट, पैकेजिंग प्लांट और थोक वितरक। इसी श्रृंखला में कहीं शुद्धता की जगह मिलावट प्रवेश कर जाती है।
मुनाफे की अंधी दौड़ में कुछ तत्व दूध में पानी मिलाने से आगे बढ़कर रासायनिक पदार्थों, डिटर्जेंट, सिंथेटिक दूध, स्टार्च और यूरिया तक का इस्तेमाल करने लगे हैं। दूध की गुणवत्ता बढ़ाने के नाम पर ‘फैट’ और ‘सॉलिड नॉट फैट’ का खेल चलता है। प्रयोगशालाओं में जांच होने पर कई बार चौंकाने वाले परिणाम सामने आते हैं—शुद्धता के दावों के बीच मिलावट की हकीकत। शुद्धता के नाम पर “जीरो”, और मिलावट के नाम पर “हीरो” बनते व्यापारी।
स्थिति केवल दूध तक सीमित नहीं है। विवाह-शादियों, बड़े आयोजनों और होटलों में दूध से बने उत्पादों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। पनीर की सब्जी हर दावत की शान बन चुकी है। मिठाइयों के भंडार सजे रहते हैं—रसमलाई, रसगुल्ला, खोया, काजू कतली, मिल्क केक—सब दूध आधारित। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ लागत कम करने और मुनाफा बढ़ाने के लिए थोक में सस्ते मिल्क प्रोडक्ट खरीदती हैं। सवाल यह है कि क्या इन उत्पादों की गुणवत्ता और शुद्धता की पर्याप्त जांच होती है?
खाने से लेकर अस्पताल तक का सफर आज चिंताजनक रूप से छोटा होता जा रहा है। मिलावटी खाद्य पदार्थों का सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ता है—पाचन संबंधी रोग, किडनी और लीवर की समस्याएँ, बच्चों में कुपोषण, और दीर्घकालीन बीमारियाँ। विडंबना यह है कि जिस दूध को पोषण और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, वही यदि मिलावटी हो तो वह बीमारी का कारण बन सकता है। स्वास्थ्य के नाम पर चल रहा यह कारोबार एक मौन संकट है।
इस समस्या की जड़ें केवल लालच में नहीं, बल्कि नियंत्रण और निगरानी की कमजोरी में भी हैं। खाद्य सुरक्षा के लिए कानून मौजूद हैं, प्रयोगशालाएँ भी हैं, छापेमारी भी होती है। परंतु जब तक नियमित और पारदर्शी निरीक्षण नहीं होगा, और दोषियों को कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक यह सिलसिला थमने वाला नहीं। कई बार स्थानीय स्तर पर सांठगांठ और प्रभाव के कारण कार्रवाई अधूरी रह जाती है।
दूसरी ओर उपभोक्ता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सस्ते दाम पर अधिक मात्रा की चाह अक्सर गुणवत्ता से समझौता करा देती है। “सस्ता है तो अच्छा है” की मानसिकता मिलावटखोरों को अवसर देती है। उपभोक्ताओं को जागरूक होना होगा—विश्वसनीय स्रोत से खरीदारी, पैकेजिंग और लाइसेंस की जांच, और संदेह होने पर शिकायत दर्ज कराने की आदत विकसित करनी होगी।
सरकार को भी दुग्ध आपूर्ति श्रृंखला को अधिक पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाना होगा। ट्रेसबिलिटी सिस्टम—जिससे पता चले कि दूध किस स्रोत से आया—लागू किया जा सकता है। डेयरियों में नियमित गुणवत्ता परीक्षण और परिणामों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। छोटे पशुपालकों को सीधे बाजार से जोड़ने के लिए सहकारी मॉडल को मजबूत करना होगा, ताकि बिचौलियों की भूमिका कम हो और मिलावट की गुंजाइश घटे।
इसके साथ ही विवाह समारोहों और बड़े आयोजनों में खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन सख्ती से सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों और होटलों को जवाबदेह बनाया जाए। लाइसेंस नवीनीकरण को गुणवत्ता परीक्षण से जोड़ा जाए। यदि एक भी मिलावटी उत्पाद के कारण किसी की जान खतरे में पड़ती है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक विफलता है।
भारत जैसे देश में, जहाँ दूध को मातृत्व, पोषण और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, वहां मिलावट का यह दाग गहरी चिंता का विषय है। यदि हम सचमुच स्वस्थ भारत का सपना देखते हैं, तो हमें अपनी थाली की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। दूध केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि विश्वास है—और विश्वास का टूटना सबसे बड़ा नुकसान है।
आज जरूरत है सामूहिक संकल्प की—सरकार की सख्ती, उद्योग की ईमानदारी और उपभोक्ता की सजगता। तभी हम यह सुनिश्चित कर पाएंगे कि हमारे बच्चों के गिलास में सचमुच दूध हो, जहर नहीं।
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