इलाज या वसूली? मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर चल रहा अस्पतालों का अदृश्य कारोबार
संपादकीय@Haresh panwar 11fab. 2026
*इलाज या वसूली? मेडिकल क्लेम कार्डों के नाम पर चल रहा अस्पतालों का अदृश्य कारोबार*
कभी डॉक्टर को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता था। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली थी—क्योंकि डॉक्टर का उद्देश्य केवल इलाज नहीं, बल्कि पीड़ा में पड़े इंसान को संबल देना था। लेकिन आज जब अस्पताल के प्रवेश द्वार पर मरीज से पहले उसका मेडिकल क्लेम कार्ड देखा जाता है, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या इलाज की प्राथमिकता अब स्वास्थ्य है या भुगतान की व्यवस्था?
आज देशभर में ईसीएचएस, आरजेएचएस, आयुष्मान और अन्य सरकारी–अर्धसरकारी स्वास्थ्य योजनाएँ आम आदमी के लिए जीवन रेखा बनी हैं। निस्संदेह, इन योजनाओं से लाखों जरूरतमंदों को राहत मिली है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन्हीं योजनाओं के नाम पर प्राइवेट अस्पतालों में एक संगठित गोरखधंधा पनपता दिख रहा है—जहाँ बीमारी से ज़्यादा महत्व कार्ड को दिया जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
अस्पतालों में कदम रखते ही सबसे पहले सामना होता है तथाकथित काउंसलर से। ये काउंसलर न डॉक्टर होते हैं, न ही चिकित्सा विशेषज्ञ, लेकिन इन्हीं के इशारों पर यह तय हो जाता है कि मरीज को भर्ती करना है या नहीं, कितने दिन रखना है, कौन-कौन सी जांच करानी है। सामान्य व्यक्ति, जिसे यह विश्वास दिला दिया जाता है कि “पैसा तो सरकार दे रही है”, वह जांच और भर्ती के जाल में फँस जाता है। नतीजा—चार-पांच दिन का अनावश्यक हॉस्पिटलाइजेशन, बार-बार जांचें और भारी-भरकम क्लेम।
यह कहना गलत होगा कि निजी अस्पतालों में इलाज अच्छा नहीं होता। सुविधाएँ वाकई शानदार हैं—एसी कमरे, होटल जैसी व्यवस्थाएँ, बेहतर नर्सिंग केयर। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर जांच और हर भर्ती वाकई ज़रूरी है? या फिर योजनाओं के भरोसे अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने का यह एक सुनियोजित तरीका बन चुका है?
आज हालत यह है कि अस्पतालों में बीमार कम और “बीमारी का मानसिक बोझ” उठाए लोग ज़्यादा दिखाई देते हैं। हाथ में क्लेम कार्ड, फाइलों में दवाइयाँ और चेहरे पर अनिश्चितता। क्या सच में समाज में इतनी गंभीर बीमारियाँ बढ़ रही हैं, या फिर योजनाओं की आसान उपलब्धता ने बीमारी को एक ‘सिस्टम’ में बदल दिया है?
इस पूरे तंत्र का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस मुनाफाखोरी में नर्सिंग स्टाफ और तकनीकी कर्मियों की हालत जस की तस बनी हुई है। दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करने वाले नर्स, वार्ड बॉय, टेक्नीशियन आज भी मामूली वेतन पर काम कर रहे हैं, जबकि असली कमाई अस्पताल प्रबंधन और कॉर्पोरेट ढांचे के पास सिमट कर रह गई है। डॉक्टर की महंगी पढ़ाई का तर्क अक्सर दिया जाता है, लेकिन क्या उस तर्क की कीमत मानवीय संवेदनाओं से चुकाई जानी चाहिए?
ईसीएचएस, आरजेएचएस और अन्य मेडिकल क्लेम योजनाओं का उद्देश्य मुनाफा नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा है। लेकिन जब इन योजनाओं का दुरुपयोग होता है, तो अंततः नुकसान उसी जरूरतमंद व्यक्ति का होता है, जिसके लिए ये योजनाएँ बनी थीं। सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और भविष्य में इन्हीं योजनाओं पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
अब समय आ गया है कि इस पूरे तंत्र पर ईमानदार और सख्त निगरानी हो। अस्पतालों में भर्ती और जांच की स्पष्ट गाइडलाइन तय की जाए। थर्ड पार्टी ऑडिट हो, मरीज की सहमति और जानकारी को प्राथमिकता दी जाए। काउंसलर सिस्टम की भूमिका पारदर्शी हो और डॉक्टर–प्रबंधन की जवाबदेही तय की जाए।
साथ ही समाज को भी जागरूक होना होगा। हर कार्डधारक को यह समझना होगा कि योजना का मतलब मुफ्त इलाज नहीं, बल्कि जरूरत के समय उचित इलाज है। अनावश्यक जांच और भर्ती को मना करने का साहस भी नागरिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए।
यह संपादकीय किसी डॉक्टर या अस्पताल के खिलाफ नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को बचाने की अपील है। अगर आज सवाल नहीं उठाए गए, तो कल यही योजनाएँ अविश्वास के घेरे में आ जाएँगी। इलाज व्यापार बन गया तो ‘धरती के भगवान’ की उपाधि भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।
अब फैसला समाज, सरकार और चिकित्सा जगत—तीनों को मिलकर करना है कि स्वास्थ्य सेवा को सेवा ही रहने दिया जाए या पूरी तरह सौदेबाज़ी का साधन बना दिया जाए।
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