ग्राम स्वराज या जाति का रण? पंचायत चुनावों के आईने में गांव की सियासत
राजस्थान में पंचायत राज चुनावों की आहट के साथ ही गांवों की फिज़ा बदलने लगी है। चौपालों पर चर्चा, गलियों में समूह, खेत-खलिहानों के बीच रणनीतियाँ—लोकतंत्र का उत्सव अपने पारंपरिक रूप में दिखाई देता है। लेकिन इस उत्सव के भीतर एक कड़वी सच्चाई भी सिर उठाती है। विकास की योजनाओं और ग्राम स्वराज के सपनों की जगह जाति, धर्म, क्षेत्र और गोत्र की खींचतान हावी होने लगती है। योग्यता और इंसानियत कोने में सिमट जाती है, और वर्चस्व की राजनीति केंद्र में आ बैठती है। यहां मैंबलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हर चुनाव में यह उम्मीद जगती है कि इस बार गांव का नेतृत्व ऐसे हाथों में जाएगा जो शिक्षा, पारदर्शिता और दूरदृष्टि के साथ पंचायत चलाएंगे। लेकिन वास्तविकता अक्सर अलग तस्वीर पेश करती है। उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि या विकास दृष्टि से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि वह किस खाप से है, किस बिरादरी का समर्थन उसे मिलेगा, और कौन-सा गुट किसके खिलाफ लामबंद है। खानदान की प्रतिष्ठा, पुरानी रंजिशें और खेत की मेड़ पर हुए विवाद तक चुनावी मुद्दा बन जाते हैं। ऐसे माहौल में ग्राम पंचायत विकास योजना केवल कागज़ों तक सीमित रह जाती है।
चुनावी सरगर्मियों के बीच एक और प्रवृत्ति तेजी से उभरती है—शराब, कबाब और दबाव की राजनीति। गांव की गलियों में विकास की बहस कम और दावतों का दौर ज्यादा चलता है। सच्चे और सजग लोग किनारे हो जाते हैं, जबकि आदतन शोर मचाने वाले चेहरे “स्टार प्रचारक” बनकर उभरते हैं। पंचायत की नीति-निर्धारण में भी वही लोग सलाहकार की भूमिका में दिखने लगते हैं। परिणामस्वरूप निर्णय विकास की जरूरतों पर नहीं, बल्कि गुटबाजी और निजी हितों पर आधारित होते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पंचायत चुनाव में खर्च की होड़ बढ़ती जा रही है। अनाप-शनाप खर्च, दिखावे और दबाव की संस्कृति ने लोकतंत्र को महंगा बना दिया है। हारने वाले उम्मीदवार को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है, और जीतने वाला अक्सर उस खर्च की भरपाई के लिए सत्ता का दुरुपयोग करने के प्रलोभन में फंस जाता है। ग्राम विकास के नाम पर हेराफेरी, ठेकेदारी और संसाधनों की बंदरबांट की आशंका बढ़ जाती है। यह स्थिति न केवल गांव के भविष्य को प्रभावित करती है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भी कमजोर करती है।
समय बदल चुका है। आज पंचायत का संचालन केवल कागज़ी कार्यवाही तक सीमित नहीं है। आईटी आधारित प्रणालियाँ, ऑनलाइन पोर्टल, तकनीकी रिपोर्टिंग और पारदर्शिता की नई व्यवस्थाएँ ग्राम स्तर तक पहुंच चुकी हैं। जब हर कार्य तकनीकी माध्यम से संचालित हो रहा है, तब नेतृत्व में न्यूनतम शैक्षिक योग्यता और प्रशासनिक समझ की आवश्यकता पर गंभीर विचार होना चाहिए। क्या यह उचित नहीं कि जिस पद पर विकास योजनाओं का क्रियान्वयन, बजट का प्रबंधन और तकनीकी प्रक्रियाओं का संचालन होता है, वहां शिक्षा और दक्षता को प्राथमिकता दी जाए?
ग्राम स्वराज का सपना तभी साकार होगा जब पंचायत चुनाव जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर स्थानीय मुद्दों और विकास की ठोस योजनाओं पर लड़े जाएँ। पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पारदर्शिता जैसे विषय केंद्र में हों। गांव की सरकार चुनते समय मतदाता यह सोचें कि उम्मीदवार का दृष्टिकोण क्या है, उसकी ईमानदारी कितनी है और वह समाज को जोड़ने की क्षमता रखता है या नहीं।
यह भी आवश्यक है कि गांव के सजग और शिक्षित लोग आगे आएं। केवल आलोचना से परिवर्तन संभव नहीं। लोकतंत्र के हिमायती यदि चुनावी खर्च और गलत परंपराओं पर अंकुश लगाने की पहल नहीं करेंगे, तो असक्षम और अवसरवादी तत्व ही मैदान में छाए रहेंगे। पंचायत केवल सत्ता का पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का दायित्व है। इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या प्रतिशोध का मंच नहीं बनने देना चाहिए।
आज जरूरत है सामूहिक आत्ममंथन की। क्या हम सचमुच भारतीय संविधान और लोकतंत्र के समर्थक हैं, या फिर अनजाने में उसके मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं? क्या हम ग्राम स्वराज की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, या जातिवाद और क्षेत्रवाद के दलदल में फंस रहे हैं?
गांव का विकास ही राष्ट्र के विकास की आधारशिला है। यदि पंचायतें मजबूत और पारदर्शी होंगी, तो ही विकसित भारत का सपना साकार होगा। इसलिए इस चुनावी मौसम में फैसला केवल उम्मीदवार का नहीं, बल्कि गांव के भविष्य का है। सोच-समझकर, स्वाभिमान और जिम्मेदारी के साथ चुना गया नेतृत्व ही ग्राम स्वराज को वास्तविक अर्थों में जीवंत कर सकता है।
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