“अहंकार की हवा और जीवन की ठोकरें”

 संपादकीय@हरेश पंवार 15 अप्रैल 2026 

*“अहंकार की हवा और जीवन की ठोकरें”*
जीवन के जटिल सत्य कई बार सरल उदाहरणों में छिपे होते हैं। एक साधारण फुटबॉल और बच्चों के खेल से जुड़ी यह छोटी-सी घटना हमें मनुष्य के स्वभाव और उसके संघर्षों का गहरा दर्शन कराती है। जब एक बालक ने संत से पूछा कि “इस फुटबॉल ने ऐसा क्या कर्म किया है, जो इसे बार-बार लातें खानी पड़ती हैं?”, तो संत का उत्तर केवल उस बच्चे के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी था—“यह इसके कर्म नहीं, बल्कि इसके भीतर भरी हवा है, जो इसे ठोकरें खाने पर मजबूर करती है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह ‘हवा’ केवल फुटबॉल के भीतर की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे उस अहंकार का प्रतीक है, जो उसे बार-बार जीवन में गिराता है। अहंकार वह अदृश्य तत्व है, जो व्यक्ति को स्वयं के भ्रम में इतना भर देता है कि वह न तो दूसरों को समझ पाता है और न ही स्वयं को सही दृष्टि से देख पाता है।

आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में यह उदाहरण और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक जीवन में उपलब्धियों, पद, प्रतिष्ठा और ज्ञान के साथ-साथ अहंकार भी तेजी से बढ़ रहा है। व्यक्ति अपने “मैं” में इतना उलझ जाता है कि वह संबंधों की गरिमा, संवाद की संवेदनशीलता और जीवन की सादगी को भूल जाता है। परिणामस्वरूप, वह बार-बार ठोकरें खाता है—कभी रिश्तों में, कभी समाज में और कभी अपने ही अंतर्मन में।

अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह व्यक्ति से उसका लचीलापन छीन लेता है। जैसे हवा से भरी फुटबॉल कठोर होकर हर ठोकर को सहती है, वैसे ही अहंकारी व्यक्ति भी हर आलोचना, हर असहमति और हर विपरीत परिस्थिति को झटका मानता है। वह झुकना नहीं जानता, और जो झुकना नहीं जानता, वह टूटना जरूर सीखता है।

इसके विपरीत, विनम्रता व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। यह उसे जीवन की चुनौतियों के प्रति सहनशील बनाती है। विनम्र व्यक्ति परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठाना जानता है। वह हर अनुभव से सीखता है और हर आलोचना को आत्मविकास का अवसर मानता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में सदैव कहा गया—“विद्या ददाति विनयं” अर्थात सच्चा ज्ञान वही है, जो मनुष्य में विनम्रता उत्पन्न करे, न कि अहंकार।

आज जब हम शिक्षा और सफलता की बात करते हैं, तो अक्सर उसका मापदंड बाहरी उपलब्धियों से करते हैं। लेकिन वास्तविक शिक्षा वह है, जो व्यक्ति के भीतर नम्रता, सहिष्णुता और समझ विकसित करे। अगर शिक्षा केवल अहंकार को बढ़ा रही है, तो वह अधूरी है।

समाज में बढ़ती असहिष्णुता, रिश्तों में दूरियाँ और संवाद की कमी—इन सबकी जड़ में कहीं न कहीं अहंकार ही है। हर व्यक्ति खुद को सही मानने की होड़ में लगा है, और यही प्रतिस्पर्धा टकराव को जन्म देती है। अगर हम इस “हवा” को थोड़ा कम कर दें, तो शायद जीवन के कई संघर्ष अपने आप समाप्त हो जाएं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अहंकार केवल बड़े पद या बड़ी उपलब्धियों से ही नहीं आता, बल्कि छोटी-छोटी बातों में भी यह पनपता है—जैसे अपनी बात को ही अंतिम मानना, दूसरों की राय को नजरअंदाज करना, या अपनी गलतियों को स्वीकार न करना। यही छोटे-छोटे अहंकार मिलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व को कठोर बना देते हैं।

फुटबॉल का उदाहरण हमें यह सिखाता है कि जितना अधिक हम अपने भीतर “हवा” भरेंगे, उतना ही जीवन हमें ठोकरों के माध्यम से खाली करने की कोशिश करेगा। यह प्रकृति का संतुलन है—जो झुकता नहीं, उसे झुकाया जाता है।

अंततः, यह हमारे हाथ में है कि हम अपने जीवन को फुटबॉल की तरह बनाना चाहते हैं या एक विनम्र और संतुलित व्यक्तित्व के रूप में ढालना चाहते हैं। अगर हम अपने भीतर से अहंकार को निकाल दें, तो जीवन की कठिनाइयाँ भी हमें उतना नहीं चोट पहुँचाएंगी।

क्योंकि सच यही है—ठोकरें हमें गिराने के लिए नहीं, बल्कि हमारे भीतर भरी अनावश्यक ‘हवा’ को निकालने के लिए आती हैं।


[4/15, 06:30] Adv. Haresh Panwar: भीम प्रज्ञा अलर्ट 

“समाज तब बदलता है जब सोच बदलती है, और सोच तब बदलती है जब हम सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जीना सीख लेते हैं।”

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