दिखावे से नहीं, विचारों से जिएं — यही सच्ची श्रद्धांजलि है बाबा साहब को

संपादकीय@हरेश पंवार 13-04-2026

*दिखावे से नहीं, विचारों से जिएं — यही सच्ची श्रद्धांजलि है बाबा साहब को*
आज जब हम अंबेडकर जयंती के अवसर पर उत्सव, रैली और आयोजनों की चमक-दमक देखते हैं, तो एक गहरा प्रश्न मन में उठता है—क्या हम सच में बाबा साहब को मानते हैं, या केवल उन्हें मनाने का दिखावा करते हैं? यह विडंबना ही है कि जिन डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने पूरे जीवन को समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया, उनके अनुयायी आज उनके विचारों से भटकते हुए नजर आते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।

बाबा साहब का स्पष्ट संदेश था—“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” लेकिन आज का युवा इन तीन मूल मंत्रों को अपनाने के बजाय, केवल एक दिन के उत्सव में खोकर रह गया है। डीजे की तेज धुन, रंगों का प्रदर्शन, और दिखावटी जुलूस—क्या यही अंबेडकरवाद है? क्या यही वह क्रांति है, जिसका सपना बाबा साहब ने देखा था?

सच यह है कि यह सब बाबा साहब के विचारों के बिल्कुल विपरीत दिशा में जा रहा है। उन्होंने कभी भी समाज में अहंकार, द्वेष और दिखावे को बढ़ावा नहीं दिया। बल्कि उनका पूरा जीवन विनम्रता, अध्ययन और संघर्ष का उदाहरण रहा। वे चाहते थे कि समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग अपने कमजोर और पिछड़े भाइयों का सहारा बने, लेकिन आज वही वर्ग उनसे दूरी बनाकर अपने अहंकार में जी रहा है।

आज समाज में एक खतरनाक प्रवृत्ति पनप रही है—दिखावे का अंबेडकरवाद। सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े पोस्ट, जयंती पर भव्य आयोजन, लेकिन 364 दिन विचारों से दूरी। यह एक ऐसी मानसिकता है, जो समाज को दिशा देने के बजाय उसे भटका रही है। बाबा साहब ने स्वयं कहा था कि उन्हें मूर्तियों या तस्वीरों में सीमित न किया जाए, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारा जाए।

गांवों में होने वाले आयोजन इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। जहां एक ओर सामूहिक भोज जैसे सकारात्मक प्रयास होते हैं, वहीं दूसरी ओर समय, संसाधन और संवेदनशीलता की अनदेखी भी होती है। मजदूर वर्ग, जो दिन-भर मेहनत कर अपना जीवन चलाता है, उसके समय और श्रम का सम्मान किए बिना आयोजन करना क्या सामाजिक न्याय है? यदि एक दिन के आयोजन के कारण सैकड़ों लोगों की मजदूरी का नुकसान होता है, तो यह बाबा साहब के “अंतिम व्यक्ति” के सिद्धांत के खिलाफ है।

बाबा साहब का सपना केवल जयंती मनाना नहीं था, बल्कि समाज में चेतना, शिक्षा और आत्मसम्मान का विकास करना था। उन्होंने अपने जीवन में कठिन संघर्षों को अपनाया, विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त की, लेकिन सुख-सुविधा का जीवन त्यागकर भारत लौटे और समाज के उत्थान के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। आज जरूरत है कि हम उनके इस त्याग और समर्पण को समझें।

समाज के पढ़े-लिखे और सक्षम वर्ग की जिम्मेदारी सबसे अधिक है। जो लोग आरक्षण और अवसरों का लाभ लेकर आगे बढ़े हैं, उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे अपने समाज के पिछड़े वर्ग को भी आगे बढ़ाएं। यदि हर सक्षम व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह एक जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा का जिम्मा उठाएगा, तो यह बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

इसके साथ ही, समाज में संवाद और वैचारिक मंथन की परंपरा को मजबूत करना होगा। केवल नारे और जुलूस से परिवर्तन नहीं आता, बल्कि विचारों की गहराई और समझ से आता है। गांवों में, मोहल्लों में, स्कूलों में—बाबा साहब के जीवन और उनके विचारों पर चर्चा होनी चाहिए। उन लोगों का सम्मान किया जाना चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर सफलता हासिल की है, ताकि वे दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकें।

यह भी जरूरी है कि हम अपने भीतर झांकें। क्या हम वास्तव में बाबा साहब के विचारों को अपने जीवन में उतार रहे हैं? या फिर केवल एक दिन के उत्सव के जरिए अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं?

आज समय की मांग है कि हम दिखावे और आडंबर से ऊपर उठें और वास्तविक अंबेडकरवाद को अपनाएं। वह अंबेडकरवाद, जो शिक्षा, समानता, भाईचारे और सामाजिक न्याय पर आधारित है।

अंततः, यही कहा जा सकता है कि—बाबा साहब को मानना आसान है, लेकिन उनके विचारों को मानना कठिन।
और जब तक हम इस कठिन रास्ते को नहीं अपनाएंगे, तब तक अंबेडकर जयंती केवल एक उत्सव बनकर रह जाएगी, न कि एक सामाजिक क्रांति का माध्यम। अब निर्णय हमें करना है—हमें जश्न मनाना है, या बदलाव लाना है।

*भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“विनम्रता वह शक्ति है, जो बिना शोर किए इंसान को ऊंचा उठा देती है, जबकि अहंकार वह बोझ है, जो चुपचाप उसे नीचे गिरा देता है।”

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