पे बैक टू सोसाइटी” की पुकार — क्या हम बाबा साहब की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं?

 दैनिक भीम प्रज्ञा संपादकीय@ हरेश पंवार #14-04-2026

*“पे बैक टू सोसाइटी” की पुकार — क्या हम बाबा साहब की अपेक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं?*
भारतीय लोकतंत्र की नींव में यदि किसी एक व्यक्तित्व की दृष्टि, संघर्ष और दूरदर्शिता सबसे अधिक गहराई से समाहित है, तो वह हैं डॉ. भीमराव अंबेडकर। उन्होंने केवल संविधान का निर्माण नहीं किया, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की, जहां विविधताओं के बीच एकता हो, और समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान और अधिकार के साथ जीवन जी सके। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

बाबा साहब का संपूर्ण जीवन इसी लक्ष्य को समर्पित रहा—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित एक सशक्त भारत का निर्माण। उन्होंने समाज के उस वर्ग को आवाज दी, जो सदियों से वंचित, शोषित और उपेक्षित रहा। लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम उनके उस मिशन को आगे बढ़ा पा रहे हैं?

बाबा साहब को विशेष रूप से समाज के पढ़े-लिखे वर्ग से बहुत उम्मीदें थीं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी हथियार है। वे चाहते थे कि जो लोग शिक्षा और अवसरों के बल पर आगे बढ़े हैं, वे अपने समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों को भी साथ लेकर चलें।

लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई देती है। आज का शिक्षित वर्ग, जो सरकारी नौकरियों, आर्थिक संसाधनों और सामाजिक प्रतिष्ठा तक पहुंच चुका है, वह अक्सर अपने मूल समाज से कटता जा रहा है। “पे बैक टू सोसाइटी” का सिद्धांत, जो बाबा साहब की विचारधारा का मूल था, वह कहीं खोता हुआ नजर आता है।

सन् 1956 में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के एक कार्यक्रम में बाबा साहब ने गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि “मुझे समाज के पढ़े-लिखे लोगों से बहुत उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने मुझे धोखा दिया।” यह कथन केवल उस समय की स्थिति का नहीं, बल्कि आज के संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है।

यह “धोखा” केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि एक विचारधारा और सामाजिक जिम्मेदारी से विमुख होने का प्रतीक था। बाबा साहब को यह आशंका पहले से थी कि यदि शिक्षित वर्ग अपने कर्तव्यों से भटक गया, तो समाज में असंतुलन और असमानता बनी रहेगी।

यह भी एक ऐतिहासिक विडंबना है कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को उन्होंने स्वयं गढ़ा, उसी व्यवस्था में चुनाव लड़ने पर उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन उनकी नाराजगी चुनाव हारने को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बात को लेकर थी कि समाज अभी भी उस चेतना स्तर तक नहीं पहुंच पाया, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी।

आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है—क्या हम केवल अपने लिए पढ़-लिख रहे हैं? क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी, वेतन और व्यक्तिगत सुख-सुविधा तक सीमित हो गया है? यदि हां, तो यह बाबा साहब के सपनों के साथ अन्याय है।

वास्तव में, शिक्षा एक साधना है—ऐसी साधना, जो न केवल व्यक्ति को, बल्कि पूरे समाज को बदलने की क्षमता रखती है। यदि एक शिक्षित व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह अपने जीवन में कम से कम एक जरूरतमंद बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठाएगा, तो यह एक छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन एक बड़े सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।

समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग यदि गांवों में जाकर, गरीबों के बीच बैठकर, उनके साथ संवाद स्थापित करे, उनके दुःख-दर्द को समझे, तो यह केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय की दिशा में एक कदम होगा।

यह भी जरूरी है कि हम “अपनों” की परिभाषा को सीमित न रखें। केवल परिवार या अपने वर्ग तक सीमित रहकर समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता। बाबा साहब का विचार व्यापक था—वे पूरे समाज को एक परिवार के रूप में देखते थे।

आज आवश्यकता है कि हम आत्ममंथन करें। क्या हम वास्तव में बाबा साहब के विचारों को आत्मसात कर रहे हैं? या फिर केवल उनके नाम और प्रतीकों तक सीमित होकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं?

यदि हम सच में उन्हें श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर यह परिवर्तन लाना होगा। हमें अपने ज्ञान, संसाधनों और अवसरों का उपयोग केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के उत्थान के लिए करना होगा।

अंततः, यही कहा जा सकता है कि—
बाबा साहब का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से होगा।

जब समाज का हर शिक्षित व्यक्ति “पे बैक टू सोसाइटी” के सिद्धांत को अपने जीवन में उतार लेगा, तभी बाबा साहब का सपना साकार होगा और भारत वास्तव में एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और सशक्त राष्ट्र बन सकेगा।

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“ज्ञान का असली उद्देश्य ऊंचा उठना नहीं, बल्कि दूसरों को भी उठाने की क्षमता विकसित करना है; क्योंकि जो अकेले आगे बढ़ता है, वह सफल हो सकता है, लेकिन जो सबको साथ लेकर चलता है, वही सार्थक बनता है।”

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