कागज़ का किसान बनाम मिट्टी का सच: 20–25 दिन की खेती का भ्रम

 संपादकीय@हरेश पंवार 12 अप्रैल 2026

*“कागज़ का किसान बनाम मिट्टी का सच: 20–25 दिन की खेती का भ्रम”*
राजनीति में बयान अक्सर सुर्खियाँ बनते हैं, लेकिन कभी-कभी वे समाज की सबसे गहरी सच्चाइयों को भी अनजाने में उजागर कर देते हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का यह कथन कि “किसान साल भर में केवल 20–25 दिन ही खेत में काम करता है”, ऐसा ही एक बयान है—जो चर्चा से ज्यादा चिंतन की मांग करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

किसी किसान सभा में सफेद कुर्ते पजामे पहनकर रंगीन मॉडल हल कंधे पर रख देने से क्या कोई किसान  हो सकता है। भाषण में किसान का बेटा कह देने से क्या खेती का कार्य हो सकता है। खेती का काम करने वाले किसान के पास में घड़ी उसका आसमान होता है। और काम करने के समय का निर्धारण प्रकृति की हालत करते हैं। किसान परिश्रम से नाहता है जहां पानी नहीं पसीना होता है। और मिट्टी के बिछौने पर सोता  है तब जाकर हमारी थाली में अनाज का निवाला डलता है। किसान के परिश्रम के समय का निर्धारण हेलीकॉप्टर में उड़ान भरते हुए या फिर एयर कंडीशन रूम में बैठकर तय करें। क्या यह संभव है। कभी प्रकृति की मार और कभी आवारा पशु का तांडव फसल को चौपट करें और किसान सर्दी, गर्मी  बरसात के मौसम में अपने खेत की मेड़ पर अपना जीवन तिल तिल कर काट दे उसे समय का निर्धारण आप कौन सी श्रेणी के काम के घंटे में कैसे तय कर पाएंगे जरा यह भी बता देते। 

यह बयान सुनते ही एक सवाल मन में उठता है—क्या खेती सचमुच इतनी आसान है?
क्या खेत केवल 20–25 दिनों में हरे-भरे होकर अनाज उगा देते हैं?
या फिर यह सोच उस दूरी का परिणाम है, जो सत्ता और खेत की मेड़ के बीच पैदा हो चुकी है?

दरअसल, खेती को केवल “बुवाई” और “कटाई” के दो-चार खास दिनों तक सीमित कर देना वैसा ही है, जैसे किसी किताब को केवल उसके पहले और आखिरी पन्ने से समझ लेने की कोशिश करना। असल कहानी तो उन पन्नों के बीच छिपी होती है—जहाँ किसान हर दिन अपने पसीने से मिट्टी को सींचता है।

किसान का कोई तय “ऑफ डे” नहीं होता।
उसका कैलेंडर मौसम से चलता है, और घड़ी आसमान से।

वह सुबह की पहली किरण से पहले उठता है, खेत की नमी को हाथ से महसूस करता है, पौधों की हरियाली में आने वाले खतरे को आँखों से पढ़ता है। कभी कीटों का हमला, कभी पानी की कमी, कभी आवारा पशुओं का डर—ये सब उसके रोज़मर्रा के “अनकाउंटेड वर्किंग आवर्स” हैं, जिन्हें कोई सरकारी आंकड़ा दर्ज नहीं करता।

मुख्यमंत्री का यह कहना कि “रोज़ 4 घंटे काम करने से किसान की आय दोगुनी हो सकती है”, सुनने में आकर्षक जरूर है, लेकिन यह खेती को एक दफ्तर की नौकरी समझने जैसा है—जहाँ घंटे तय होते हैं और परिणाम निश्चित।
हकीकत यह है कि खेती में मेहनत की गारंटी होती है, लेकिन परिणाम की नहीं।

राजस्थान का किसान तो विशेष रूप से प्रकृति के साथ एक निरंतर संघर्ष का नाम है।
कभी बादल धोखा दे जाते हैं, कभी बारिश उम्मीद से ज्यादा हो जाती है।
कभी ओलावृष्टि खड़ी फसल को गिरा देती है, तो कभी सूखा बीज को अंकुरित होने से पहले ही मार देता है।

ऐसे में “4 घंटे” का गणित उस दर्द को नहीं समझ सकता, जो एक किसान हर दिन जीता है।

और अगर खेत में मेहनत के बाद भी किसान बच जाता है, तो अगली परीक्षा मंडी में होती है।
वहाँ उसकी उपज का मूल्य उसकी मेहनत से नहीं, बल्कि बाजार की मर्जी से तय होता है।
आढ़तियों की ऊँची आवाज़ में किसान की आवाज़ अक्सर दब जाती है।

विडंबना यह है कि जो किसान पूरे साल अपनी फसल को बचाने के लिए रातें जागता है, वही किसान अपनी उपज बेचते समय सबसे ज्यादा बेबस दिखाई देता है।

व्यंग्य की चरम स्थिति तब होती है, जब किसान को “कम काम करने वाला” बताया जाता है, जबकि वह खाद और बीज के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहता है।
जब उसकी बारी आती है, तो जवाब मिलता है—“स्टॉक खत्म है।”

अब जरा यह भी तय कर लिया जाए कि यह इंतजार किस “वर्किंग डे” में जोड़ा जाएगा?

छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति तो और भी जटिल है।
छोटे-छोटे खेत, सीमित संसाधन, महंगी मशीनें और बढ़ती लागत—इन सबके बीच खेती अब व्यवसाय कम, संघर्ष ज्यादा बन चुकी है।

सरकारी योजनाओं और मुआवजे की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है।
कहीं बिजली लाइन के लिए जमीन जाती है, तो मुआवजा इतना कम मिलता है कि नुकसान की भरपाई तो दूर, दिलासा भी नहीं बन पाता।
पड़ोसी राज्यों में बेहतर व्यवस्था देखकर किसान का मन और भी विचलित होता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या किसान को समझने की कभी गंभीर कोशिश हुई है?
क्या उसकी समस्याओं पर कोई ठोस शोध हुआ है, या सब कुछ केवल भाषणों तक सीमित है?

किसान को उपदेश नहीं, व्यवस्था चाहिए।
उसे सलाह नहीं, समर्थन चाहिए।

अगर समय पर खाद-बीज मिल जाए, उचित मूल्य सुनिश्चित हो, सिंचाई और सुरक्षा की व्यवस्था हो—तो किसान किसी प्रेरणादायक भाषण का मोहताज नहीं रहेगा। वह अपनी मेहनत से ही इतिहास लिख सकता है।

क्योंकि किसान कोई “20–25 दिन” का कर्मचारी नहीं, बल्कि “365 दिन” का साधक है—
जो मिट्टी में मिलकर जीवन उगाता है।

अंत में, एक सरल लेकिन चुभता हुआ प्रश्न—
अगर किसान सच में इतना कम काम करता है, तो फिर देश की रसोई हर दिन कैसे जलती है?

शायद यही सवाल उस बयान का सबसे सशक्त उत्तर है— जो कागज़ पर नहीं, जमीन पर लिखा गया है।

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“जो समाज अपने अन्नदाता के श्रम को आंकड़ों में मापने लगता है, वह धीरे-धीरे संवेदनाओं में दरिद्र हो जाता है।”

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