लालच का बढ़ता साया: जब इच्छाएँ समाज को निगलने लगती हैं
संपादकीय@हरेश पंवार- 21 अप्रैल 2026
“लालच का बढ़ता साया: जब इच्छाएँ समाज को निगलने लगती हैं”
एक प्राचीन कथा है—एक व्यक्ति को वरदान मिला कि वह जो भी छुएगा, वह सोना बन जाएगा। शुरू में वह अत्यंत प्रसन्न हुआ; उसके घर की हर वस्तु सोने में बदलने लगी। लेकिन जब उसने भोजन को छुआ, वह भी सोना बन गया। पानी भी सोना बन गया। अंततः उसकी सबसे प्रिय बेटी भी सोने की मूर्ति में बदल गई। तब उसे समझ आया कि लालच ने उससे सब कुछ छीन लिया है। यह कथा केवल कल्पना नहीं, बल्कि आज के समाज का सजीव प्रतिबिंब है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जब समाज में लालच बढ़ता है, तो वह केवल एक व्यक्तिगत कमजोरी नहीं रहता, बल्कि एक सामाजिक बीमारी का रूप ले लेता है। लालच व्यक्ति की सोच को संकुचित कर देता है और उसे केवल अपने स्वार्थ तक सीमित कर देता है। वह यह भूल जाता है कि उसके कर्मों का प्रभाव केवल उस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है।
महात्मा बुद्ध ने स्पष्ट कहा था—“मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका लोभ और मोह है।” यह कथन आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। लालच व्यक्ति के विवेक को कुंद कर देता है। जब विवेक समाप्त होता है, तो नैतिकता, ईमानदारी और करुणा जैसे मूल्य स्वतः ही पीछे छूट जाते हैं। परिणामस्वरूप, समाज में भ्रष्टाचार, चोरी, धोखाधड़ी और अनैतिक व्यवहार तेजी से फैलने लगते हैं।
आज हम अपने चारों ओर देखें, तो पाएंगे कि अधिकांश समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं लालच से जुड़ी हुई है। रिश्वतखोरी केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का परिणाम है, जिसमें व्यक्ति अधिक पाने की चाह में सही-गलत का भेद भूल जाता है। इसी प्रकार, अनैतिक व्यापार, मिलावटखोरी, कर चोरी और अन्य अपराध भी उसी लालच की शाखाएं हैं, जो धीरे-धीरे पूरे समाज को खोखला कर रही हैं।
लालच की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि इसका कोई अंत नहीं होता। यह एक ऐसी आग है, जो जितना अधिक ईंधन पाती है, उतनी ही अधिक भड़कती जाती है। व्यक्ति सोचता है कि थोड़ा और मिल जाए, तो संतोष मिल जाएगा; लेकिन ‘थोड़ा और’ की यह चाह कभी समाप्त नहीं होती। अंततः वह इस दौड़ में इतना उलझ जाता है कि उसे यह भी याद नहीं रहता कि वह किसके लिए और क्यों भाग रहा है।
इस संदर्भ में “सन्तोष परमं सुखम” का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। संतोष का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति प्रयास करना छोड़ दे या प्रगति की इच्छा न रखे, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच संतुलन बनाए। जब व्यक्ति संतोष को समझता है, तब वह अपने जीवन में शांति और स्थिरता का अनुभव करता है।
समाज के स्तर पर भी संतोष और नैतिकता की स्थापना आवश्यक है। यदि समाज में ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को महत्व दिया जाए, तो लालच स्वतः ही नियंत्रित हो सकता है। इसके लिए शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें नैतिक मूल्यों का समावेश भी होना चाहिए। बच्चों को प्रारंभ से ही यह सिखाया जाना चाहिए कि सफलता का वास्तविक अर्थ केवल धन अर्जित करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और ईमानदार नागरिक बनना है।
इसके साथ ही, परिवार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि घर में बच्चों को यह सिखाया जाए कि जीवन में संतोष और नैतिकता का महत्व क्या है, तो वे बड़े होकर समाज में सकारात्मक योगदान देंगे। लेकिन यदि उन्हें केवल प्रतिस्पर्धा और अधिक पाने की होड़ सिखाई जाएगी, तो वे भी उसी दौड़ का हिस्सा बन जाएंगे, जो अंततः समाज को नुकसान पहुंचाती है।
यह भी आवश्यक है कि हम स्वयं आत्मनिरीक्षण करें। क्या हम अपने जीवन में कहीं न कहीं लालच के प्रभाव में तो नहीं आ रहे? क्या हम छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता तो नहीं कर रहे? यदि हम इन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर दें, तो हमें अपने भीतर झांकने का अवसर मिलेगा।
अंततः, यह समझना होगा कि लालच केवल बाहरी समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर की एक प्रवृत्ति है, जिसे नियंत्रित करना हमारे अपने हाथ में है। यदि हम इसे समय रहते नहीं रोकते, तो यह धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व, हमारे संबंधों और हमारे समाज को प्रभावित करने लगता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम संतोष, नैतिकता और आत्मसंयम को अपने जीवन का आधार बनाएं। क्योंकि जब व्यक्ति अपने लालच पर नियंत्रण पा लेता है, तभी वह सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और सुखी बन पाता है—और तभी समाज भी स्वस्थ और समृद्ध बन सकता है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“लालच क्षणिक सुख देता है, लेकिन संतोष स्थायी शांति और सच्चा सुख प्रदान करता है।”
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