“शिक्षा का बाजारीकरण: क्या ‘शेरनी का दूध’ अब अमीरों तक सीमित?"

 संपादकीय@हरेश पंवार -17 अप्रैल 2026

 “शिक्षा का बाजारीकरण: क्या ‘शेरनी का दूध’ अब अमीरों तक सीमित?”
किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज की नींव शिक्षा पर टिकी होती है। यह केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समानता और आत्मसम्मान का सबसे सशक्त उपकरण है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में शिक्षा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि यही वह माध्यम है जो सामाजिक विषमताओं को समाप्त कर एक समतामूलक नेता समाज की स्थापना कर सकता है। लेकिन आज जिस प्रकार शिक्षा का तेजी से निजीकरण हो रहा है, उसने इस मूलभूत अधिकार को एक महंगी वस्तु में परिवर्तित कर दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

डॉ. भीमराव अंबे‌‍डकर ने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था— “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वह ।” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, लेकिन विडंबना यह है कि वर्तमान दौर में यह ‘शेरनी का दूध’ अब हर किसी के लिए सुलभ नहीं रहा। शिक्षा का उद्देश्य जहां पहले ज्ञान का प्रसार और व्यक्तित्व का विकास था, वहीं आज यह धीरे-धीरे एक मुनाफे का व्यवसाय बनता जा रहा है।

निजीकरण के बढ़ते प्रभाव ने शिक्षा को दो वर्गों में बांट दिया है—एक वह, जो महंगे निजी संस्थानों में आधुनिक सुविधाओं और डिजिटल संसाधनों के साथ पढ़ता है; और दूसरा वह, जो संसाधनों की कमी से जूझते सरकारी स्कूलों में अपने भविष्य के लिए संघर्ष करता है। यह विभाजन केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी गहरा करता है।

शोषित, वंचित और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा हमेशा से उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम रही है। सरकारी स्कूल और कॉलेज उनके लिए आशा की किरण साबित हुए हैं। लेकिन जब निजी संस्थानों की फीस आसमान छूने लगती है, तो एक गरीब या मजदूर परिवार के लिए अपने बच्चों को वहां पढ़ाना केवल एक सपना बनकर रह जाता है। परिणामस्वरूप, ये बच्चे उसी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के दायरे में सीमित रह जाते हैं, जिससे निकलने का एकमात्र रास्ता शिक्षा ही थी।

संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार दिया है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती असमानता इस अधिकार को कमजोर कर रही है। निजी संस्थानों में आरक्षण की स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था का अभाव, शोषित वर्गों को उच्च शिक्षा और बेहतर अवसरों से दूर कर रहा है। इससे सामाजिक न्याय की अवधारणा पर सीधा आघात होता है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षा का निजीकरण केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनती जा रही है, जो अनजाने में ही सही, एक बड़े वर्ग को ज्ञान से वंचित कर रही है। यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा शिक्षित नहीं होगा, तो वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कैसे होगा? वह सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज कैसे उठाएगा?

गांवों, ढाणियों और झुग्गी-झोपड़ियों में आज भी अनगिनत प्रतिभाएं छिपी हुई हैं। लेकिन संसाधनों और अवसरों की कमी के कारण ये प्रतिभाएं उभर नहीं पातीं। महंगी कोचिंग, भारी-भरकम फीस और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में गरीब बच्चों के लिए आगे बढ़ना बेहद कठिन हो गया है। कई बार परिस्थितियां उन्हें पढ़ाई छोड़ने और बाल श्रम की ओर धकेल देती हैं, जो न केवल उनके भविष्य को अंधकारमय बनाता है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति को भी बाधित करता है।

निजीकरण का एक और गंभीर प्रभाव यह है कि शिक्षा का उद्देश्य सीमित होकर केवल ‘कौशल’ तक रह जाता है। इससे ऐसे लोग तैयार होते हैं, जो केवल नौकरी करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, लेकिन समाज को दिशा देने वाले विचारक, चिंतक और नेतृत्वकर्ता नहीं बन पाते। यह स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।

वास्तव में, शिक्षा का बाजारीकरण सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। यदि शिक्षा को केवल लाभ कमाने का माध्यम बना दिया गया, तो यह समाज में असमानता को और बढ़ाएगा। एक ऐसा समाज, जहां केवल संपन्न वर्ग ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सके, वह कभी भी न्यायपूर्ण और समतामूलक नहीं हो सकता।

आज आवश्यकता है कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाए। सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, ताकि वे निजी संस्थानों के समकक्ष खड़े हो सकें। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षा हर वर्ग के लिए सुलभ और किफायती हो।

यह भी जरूरी है कि शिक्षा को ‘बाजार की वस्तु’ बनने से रोका जाए। क्योंकि जब शिक्षा बिकने लगती है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है, जब उसके नागरिक शिक्षित, जागरूक और समान अवसरों से युक्त हों।

अंततः, यह समझना होगा कि शोषित समाज के बच्चों को शिक्षा से वंचित करना केवल उनके साथ अन्याय नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यदि हमें एक सशक्त, समृद्ध और न्यायपूर्ण भारत का निर्माण करना है, तो शिक्षा को हर हाल में सबके लिए सुलभ बनाना होगा।

शिक्षा अधिकार है, व्यापार नहीं—और इसे इसी रूप में बचाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

[4/17, 06:22] Adv. Haresh Panwar: *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 


“शिक्षा का असली उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने की समझ और साहस पैदा करना है।”

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