सोशल मीडिया: – बच्चों के भविष्य पर खतरे की घंटी
संपादकीय
10 सितंबर 2025
*सोशल मीडिया: – बच्चों के भविष्य पर खतरे की घंटी*
आज के आधुनिक युग में सोशल मीडिया एक वरदान बनकर हमारे जीवन में समा चुका है। यह हमें दूर बैठे रिश्तेदारों से जोड़ता है, दुनिया भर की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध कराता है और व्यक्तित्व के अभिव्यक्ति का नया मंच प्रस्तुत करता है। लेकिन इस उजली तस्वीर के पीछे छुपा एक गंभीर काला सच भी है, जो समाज और विशेष रूप से बच्चों के मानसिक विकास पर गहरे असर डाल रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जहां एक ओर सोशल मीडिया का उद्देश्य मानवता को जोड़ना था, वहीं आज यह अभद्रता, हिंसा और अश्लीलता का अड्डा बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप पर दिन-ब-दिन फैलता फेक कंटेंट और हिंसक विचार बच्चों के मानसिक विकास को जहरीला बना रहा है।
बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों के बढ़ने का मुख्य कारण उनकी मनमर्जी के अनुसार अनियंत्रित सोशल मीडिया का उपयोग है। गलत संगत, अश्लील वीडियो, हिंसक गेम्स और अपमानजनक कंटेंट बच्चों के भीतर असंयमित क्रोध, संवेदनशीलता में गिरावट, गलत आदतें और मानसिक तनाव पैदा कर रहे हैं। यह स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि माता-पिता भी इसकी गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं। मोबाइल का उपयोग समय-समय पर करना, बिना किसी निगरानी के सोशल मीडिया ऐप्स का प्रयोग, और बच्चों को बिना दिशा निर्देश दिए सोशल प्लेटफॉर्म्स पर छोड़ देना धीरे-धीरे उन्हें मानसिक अपराध की दुनिया में धकेल रहा है।
एक चिंताजनक तथ्य यह भी है कि माता-पिता स्वयं इस व्यस्त जीवन के चक्र में इतने उलझ चुके हैं कि अपने बच्चों के साथ संवाद करने का समय नहीं निकाल पाते। परिणाम स्वरूप बच्चे अकेलेपन और भ्रम के अंधकार में फंस जाते हैं। हिंसक व्यवहार, गलत बोलचाल, गुस्सैल प्रवृत्ति, माता-पिता से बेज़ारी, भाई-बहन से असहिष्णुता, और समाज के प्रति विद्रोह उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है।
समाज की इस विकराल समस्या का समाधान केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सामाजिक जागरूकता अभियान के तहत हर परिवार को यह संदेश पहुँचाना आवश्यक है कि बच्चों की सोच और मानसिकता के निर्माण में सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग करें। बच्चों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित रखने के लिए माता-पिता को स्वयं सशक्त होना पड़ेगा। मोबाइल में पेरेंटल कंट्रोल सेट करें, समय सीमा निर्धारित करें, बच्चों से खुलकर संवाद करें, उन्हें समझाएं कि कौन सी जानकारी उनके लिए सही है और कौन सी गलत। इसके साथ-साथ बच्चों के लिए खेलकूद, पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाए ताकि उन्हें मानसिक संतुलन के लिए व्यस्त रखा जा सके।
समाज में संगठित रूप से भी कदम उठाने की आवश्यकता है। शिक्षक, समाजसेवी, प्रशासन और मीडिया को मिलकर इस विषाक्त जाल को रोकने का अभियान चलाना चाहिए। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर विशेष शिक्षण कार्यक्रम, परिवारों में संवाद की महत्ता पर सेमिनार, और समाज में खुले मंचों पर विचार विमर्श की व्यवस्था की जानी चाहिए।
सोशल मीडिया को केवल फॉलोअर्स बढ़ाने और सनसनी फैलाने का माध्यम बनने से बचाकर बच्चों के उज्जवल भविष्य की दिशा में उपयोग करना हम सबकी सामाजिक जिम्मेदारी बनती है। यही समय है जब हम गहराई से सोचें और यह सुनिश्चित करें कि हमारे छोटे-छोटे कदम भविष्य की बड़ी समस्याओं को उत्पन्न न करें। एक सशक्त परिवार ही एक सशक्त समाज की नींव है, और बच्चों के उज्जवल भविष्य की जिम्मेदारी आज हम सभी पर है।
समाज के हर व्यक्ति को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने स्तर पर इस समस्या से जूझेगा, जागरूक करेगा और सही दिशा में कदम बढ़ाएगा। तभी हम डिजिटल युग के इस विकराल संकट से निपट पाएंगे।
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