*प्रकृति का सम्मान, भविष्य की पहचान
संपादकीय
13 सितंबर 2025
*प्रकृति का सम्मान, भविष्य की पहचान*
“प्रकृति से जुड़े बिना मानव जीवन अधूरा है; जो प्रकृति को नष्ट करता है, वह स्वयं के अस्तित्व को खतरे में डालता है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज का युग तकनीक और विकास का युग है। हर कोई तेजी से आगे बढ़ने में लगा है, लेकिन इस दौड़ में हम अपनी सबसे अनमोल धरोहर – प्रकृति को भूलते जा रहे हैं। हर दिन बढ़ते औद्योगीकरण, बढ़ती गाड़ियों की संख्या, फैक्ट्री की चिमनियों से निकलता धुंआ, प्लास्टिक कचरे का फैलाव और वनों की अंधाधुंध कटाई ने हमारे पर्यावरण को संकट में डाल दिया है। हम सोचते हैं कि विकास का यही अर्थ है – अधिक से अधिक निर्माण, ज्यादा से ज्यादा लाभ, लेकिन इसका मूल्य हम अपनी अगली पीढ़ी को चुकवाएंगे।
प्रकृति हमारी माता है। बिना स्वच्छ जल, ताजी हवा, हरे-भरे जंगल और जीव-जंतुओं के साथ संतुलित जीवन, मानव का अस्तित्व संभव नहीं है। परंतु आज हम प्रकृति से जुड़े हर नियम को दरकिनार कर उसे वश में करने की होड़ में लगे हैं। जल प्रदूषण से नदियाँ विषाक्त हो रही हैं, वनों की कटाई से जंगल सूख रहे हैं और जैव विविधता घट रही है। ये केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि समाज के मानसिक पतन की भी गहराई को दर्शाते हैं।
आखिरकार, यह विडंबना ही है कि जब से मानव ने प्राकृतिक संतुलन को तोड़ा, तभी से खुद को असंतुलन की चपेट में पाया है। हर आपदा – बाढ़, सूखा, भूकंप, जलवायु परिवर्तन – एक संकेत है प्रकृति की ओर से। यह चेतावनी नहीं, बल्कि सख्त संदेश है कि अब परिवर्तन जरूरी है।
हमारे छोटे-छोटे कदम, जैसे प्लास्टिक कम करना, पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना, इको फ्रेंडली उत्पादों का उपयोग करना – यही बड़े बदलाव की शुरुआत हैं। समाज को चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था में पर्यावरणीय चेतना को अनिवार्य विषय बनाया जाए। सरकार को चाहिए कि पर्यावरणीय अपराधों पर कठोर कार्रवाई करें।
व्यंग्य भी कहता है – आजकल तो लोग पेड़ लगाने का कार्यक्रम करते हैं लेकिन अगले ही दिन उसे काटने में पीछे नहीं रहते। हर फोटोग्राफर इवेंट पर ‘ग्रीन प्रोग्राम’ की तस्वीरें खींचते हैं और इंस्टाग्राम पर वायरल करते हैं, लेकिन हर साल पेड़ कटते जा रहे हैं। क्या यही है हमारी चेतना का विकास?
यदि हम अपने स्वार्थ को छोड़कर प्रकृति की सेवा करें, तभी हम सच्चे विकास की परिभाषा गढ़ पाएंगे। यह केवल राष्ट्र का कर्तव्य नहीं, हर नागरिक का नैतिक दायित्व है। भविष्य हमारी सोच पर निर्भर है। चलिए, प्रकृति के साथ समझौता करें, न कि उसे अपने व्यापारिक लाभ के लिए खत्म करें। तभी हम आने वाली पीढ़ी के लिए स्वच्छ, सुंदर और संतुलित दुनिया छोड़ पाएंगे।
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