पत्रकारिता नहीं ‘प्रोफिट’ की दुकान – अब घुस आए हैं खरपतवार

संपादकीय
10 सितंबर 2025 

 *पत्रकारिता नहीं ‘प्रोफिट’ की दुकान – अब घुस आए हैं खरपतवार* 
पत्रकारिता का जन्म समाज को सच बताने और जनता की आवाज बनकर सत्ता की गलियों में जाकर उसकी नकेल कसने के लिए हुआ था। एक समय था, जब पत्रकारिता को समाज का प्रहरी माना जाता था। भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, सरकारी गलत नीतियों की पोल खोलने का पुण्य कार्य यही पत्रकार करते थे। जनता की उम्मीद थी कि उनका माइक समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज बनेगा। लेकिन आज का मंजर देखिए, पत्रकारिता का पवित्र मंच अब केवल ‘प्रोफिट सेंटर’ बन गया है। खबर नहीं, हंगामा बिक रहा है। जनहित की खोज नहीं, जनविरोध का बाजार सज रहा है। यह अब सच की खोज नहीं, सियासी रंग में रंगने की होड़ बन गई है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 

आज की पत्रकारिता का स्वरूप जितना चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं अधिक विकृत हो चला है। सच्ची पत्रकारिता समाज की अव्यवस्थाओं को उजागर करने, जनता की आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने, भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने और लोकतंत्र की आधारशिला मजबूत करने का पथप्रदर्शक है। लेकिन जिस ढंग से आज तथाकथित पत्रकारिता का चेहरा सामने आ रहा है, वह गहराई से चिंतन करने का विषय बन चुका है। कुछ लोग पत्रकारिता का नाम लेकर व्यवसाय का धंधा कर रहे हैं। वे किसी राजनीतिक दल के इशारे पर माइक थामे खड़े होकर, जैसे मानव पुलिस के इन्वेस्टिगेशन अफसर बनकर अपराधियों को ढूंढ़ने के बजाय उन्हें अपने दबाव में ढालने का काम कर रहे हैं। ऐसी पत्रकारिता समाज के लिए विष घोलने से कम नहीं। 

झुंझुनू जिले में हाल ही में दो गंभीर घटनाएं इस बात का उदाहरण बन चुकी हैं। एक तरफ गुढ़ागोड़जी थाना क्षेत्र अंतर्गत शिथल ग्राम पंचायत की  सरपंच पर भ्रष्टाचार के आरोप और सड़क गबन की रिपोर्टिंग की आड़ में तथाकथित पत्रकारों ने पत्रकारिता का कर्तव्य भूलकर एक पुलिस जांच अधिकारी की तरह से जिस प्रकार अराजकता का वातावरण बनाया, और उन पर सरपंच द्वारा मुकदमा दर्ज होना यह पत्रकारिता की मर्यादा के विरुद्ध है। पत्रकारिता का उद्देश्य होता तो प्रशासन तक आवाज पहुंचाना और समाधान करवाना होना चाहिए था, परंतु सत्ताधारी सरपंच के खिलाफ पक्षपाती कार्रवाई कर वह स्वयं अपराध की दिशा में कदम बढ़ा बैठे। दूसरी घटना नवलगढ़ में बाबा रामदेव मेले में टेंडर में गड़बड़ी की खबर उजागर करने और गोवंश के चारे की व्यवस्था करवाने की बजाय गोवंश के बड़े बंदे का खुद दरवाजा खोल बैठे, कानून की पालना करने की बजाय कानून हाथ में लेने वालों में शामिल हो गए, फोन पर आरोप लगा कि प्रशासन की छवि धूमिल करने की होड़ में तथाकथित पत्रकार सक्रिय रहे। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर खुद को न्यायाधीश मान लेना पत्रकारिता की मूल भावना का अपमान है। आजकल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध तमाम विकल्पों का उपयोग कर तथाकथित पत्रकार झूठ-फरेब के माध्यम से झूठा हंगामा खड़ा कर अपराधियों की तरह कार्य कर रहे हैं, बिना किसी जांच के बिना किसी प्रमाण के। अपने यूट्यूब चैनलों की टीआरपी बढ़ाने के लिए हर हद से गिर जाने की होड़ में ऐसे लगे हैं मानो की पूरे देश का लोड उनके कंधों पर आ गया हो। घर से भागने वाली लड़कियों और अनैतिक संबंधों के अपराध की खबरें तो ऐसे परोस रहे हैं। मानो ऐसे मामलों के वे खुद ही न्यायाधीश हो।  कई यूट्यूबर खुद ही न्यायालय चला रहे हैं
खुद की लोक अदालत बनाकर एक-एक बात को ऐसे जांच पड़ताल कर रहे हैं। कई मामलों में तो पीड़ित महिला से ऐसे ऐसे सवाल पूछते हैं मजिस्ट्रेट भी बंद कमरे में बंद लिफाफे में बयान दर्ज करने से शर्म महसूस करता है लेकिन तथाकथित पत्रकार यूट्यूब चैनल पर प्रसारित कर रहे हैं। जिनको न कानून की जानकारी है । न नियमों की कोई चिंता सीधे ताक पर धरकर सिधे समाज में परोस रहे जिनका उदाहरण यहां प्रस्तुत करने में मुझे लज्जा महसूस हो रही है। शादी के 20 साल बाद बच्चे व पति को छोड़कर प्रेमी के साथ गई महिला से सवाल पूछ रहे हैं कि नए पति के साथ आपका सफरनामा कैसा रहा ? कैसी रही आपकी जर्नी,शर्म की हदें तो जब पार  हो रही है  जब पाली पोसी 20 साल की बेटी लोफर छोरे के साथ भाग गई या भगा ले गए और तथाकथित पत्रकारों के प्लेटफार्म पर उनके मां-बाप से जान से मार देने से रोकने की अपील का वीडियो वायरल करें। भागने वाले प्रेमी युगल के पैरोंकर बनकर प्रोटेक्शन करना कितना सही है। 
फेक लिटरेचर और सनसनी फैलाने वाले वीडियो से समाज में जितना विषाक्त घोला जा रहा है उससे ज्यादा समाज देख भी तो रहा है। वे  लोग भी तो गुनहगार है। सारे कुएं में लाए यानि आग लगी हुई है आग बुझाने की उम्मीद किससे करें। समाज को आईना दिखाने वाले लोग तथाकथित पत्रकार ही आग लगाने में जुटे हुए हैं तो आग बुझाने वालों की उम्मीद किस करें अब सोचो समाज का क्या होगा?

अत्यंत पीड़ा का विषय यह है कि पत्रकारिता को व्यावसायिकता में तब्दील कर चुके लोग ना तो समाज की भलाई सोचते हैं, ना लोकतंत्र की गरिमा का सम्मान करते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक खेल बन गया है – चुनावी फायदे की खोज, राजनीतिक पार्टियों की चाटुकारिता और पर्स में भरने का साधन। इन तथाकथित पत्रकारों का रवैया यह दर्शाता है कि उन्हें जनता के अधिकारों की चिंता नहीं, बल्कि अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साजिशबद्ध ढंग से साधने का धंधा चाहिए।

कितनी ही ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जहां यूट्यूब पत्रकारिता के नाम पर अफवाह फैलाकर समाज को अराजकता की ओर धकेला गया। हरियाणा के भिवानी जिले में मनीषा मौत मामले में बिना किसी विवेचना के अफवाह फैलाने वाले पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज होना इस बात का प्रतीक है कि आज का पत्रकारिता व्यवसाय संवैधानिक जिम्मेदारियों से सटकर केवल अफवाह और जनद्रोह की खेती कर रहा है। पत्रकारिता का धर्म कभी ऐसा नहीं था। यह समाज की नब्ज पकड़ने, भ्रष्टाचार उखाड़ फेंकने और जनसाधारण के अधिकारों की रक्षा करने की प्रक्रिया थी।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पत्रकारों के बीच प्रतिस्पर्धा के नाम पर नैतिक पतन हो रहा है। एक-दूसरे को गिराने की होड़ में स्वयं वे समाज के लिए विष बनते जा रहे हैं। खेदजनक स्थिति यह है कि अब तो मीडिया माफिया की तरह गुटबंदी, दबंगई और रंगदारी के तौर पर काम करने लगे हैं। लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका बनती है सशक्त, निष्पक्ष और जनहितैषी, न कि राजनीतिक दलों का मुंह दिखाने वाला विज्ञापन मंच। भ्रष्टाचार की पोल खोलना तो दूर, अब राशन-पानी के मामले में घुसना, आधिकारिक कार्यों में दबाव बनाना, अपराधियों के साथ साठगांठ करके खुद को माइक थामे “न्यायाधीश” समझना यह सब किस संवैधानिक देश में स्वीकार्य है?

आज जब इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया की ताकत हर किसी के हाथ में पहुंच गई है, तो यह जिम्मेदारी पत्रकारिता पर और अधिक बढ़ जाती है कि वह जनता के सवालों का निष्पक्ष उत्तर दे। परंतु अफसोस, तथाकथित पत्रकारिता की यह दिशा अंधकारमय होती जा रही है। ऐसे में हर सजग पत्रकार का कर्तव्य बनता है कि वह अपने अंदर झांक कर अपने मूल उद्देश्य को समझे। उसे केवल “प्रोफेशनल कर्मचारी” समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, बल्कि सामाजिक प्रहरी के रूप में कार्य करते हुए समाज के हर वर्ग की आवाज बने।

पत्रकार संगठन, संघ, संस्था और अग्रज पत्रकारों का यह दायित्व बनता है कि वे इन अंधेरे तत्वों के विरुद्ध सख्त कदम उठाएं। अनुशासन और मर्यादा का पालन कर पत्रकारिता की गरिमा को पुनः स्थापित करें। संवाद का माध्यम बनें, हंगामे का नहीं। केवल आरोप लगाने की बजाय समाधान के पहलू पर ध्यान दें। जिम्मेदार और न्यायप्रिय पत्रकारिता का प्रचार करें ताकि हमारे लोकतंत्र की चौथी शक्ति सशक्त बने, न कि कलंकित। यह समय है आत्ममंथन का, यह समय है सच्चाई को स्वीकार कर अपने भीतर सुधार लाने का। क्योंकि समाज तभी स्वस्थ होगा, जब उसके प्रहरी खुद ईमानदार और न्यायप्रिय होंगे।

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।