जब परिवार टूटे, तो समाज कैसे संभलेगा? – रिश्तों के झगड़े पर कठोर सोच

संपादकीय
9 सितंबर 2025
*जब परिवार टूटे, तो समाज कैसे संभलेगा? – रिश्तों के झगड़े पर कठोर सोच* 
आज के आधुनिक समाज में घर-परिवार के भीतर झगड़े होना एक ऐसा दुर्भाग्य बन चुका है, जिसे न तो गंभीरता से लिया जा रहा है और न ही सही दिशा में समझने की कोशिश की जा रही है। यह एक चुभता हुआ सत्य है कि परिवार कभी केवल प्रेम, समझदारी और सहयोग का पवित्र स्थान रहा करता था, अब वह तनाव, कटुता और आपसी मनमुटाव का अखाड़ा बन चुका है। हर दूसरे घर में आपसी झगड़े आम बात बन गए हैं। यह सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों? क्या कारण है कि हम रिश्तों को सौंदर्य की जगह संघर्ष का मैदान बना चुके हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज के बच्चों के सामने घर का यह जहर प्रतिदिन परोसा जा रहा है। जब माता-पिता खुद संवाद करने की बजाय मोबाइल स्क्रीन में उलझे रहते हैं, अपने गुस्से की कहानी फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बयां करते हैं, तो उनसे बेहतर क्या उम्मीद की जा सकती है? यही पथ है जहाँ से अगली पीढ़ी भटकती जाती है – अहंकार की गहराइयों में, मतभेद के गर्त में। एक-दूसरे को नीचा दिखाने, बेइज्जती करने और सोशल मीडिया पर तुनक-मिजाजी से एक दूसरे को छलनी करने की मानसिकता ने घर को लड़ाई का मैदान बना दिया है।

यह सोचने वाली बात है कि जिस जगह पर प्रेम, समझ और सहयोग का वास होना चाहिए, वहाँ अब केवल गुस्सा, प्रतिशोध और दिखावा भरा है। क्या आज के तथाकथित ‘समझदार’ लोग भूल चुके हैं कि हर झगड़ा केवल दो लोगों का मामला नहीं, यह एक पूरी पीढ़ी की दिशा बदलने वाला झटका है? लड़के-लड़कियों के बीच रिश्ते अब प्रेम या समझौते से नहीं, एक-दूसरे पर शर्तें लगाकर तय किए जा रहे हैं। यह कारोबार बन चुका है। यहां प्यार नहीं, खरीद-फरोख्त चल रही है। संबंधों की गरिमा गिरा दी गई है, और इसकी जड़ें कहीं और नहीं – हमारे स्वयं के नैतिक पतन में हैं।

समाज की बड़ी विडंबना यह है कि जो लोग पत्रकारिता के नाम पर समाज के प्रश्नों को उजागर करने आए थे, आज वे स्वयं एक विषाक्त तत्व बन चुके हैं। बिना जांच-पड़ताल के सनसनी फैला रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप की होड़ में पीड़ितों को नया घाव दे रहे हैं। तथाकथित पत्रकारिता का मतलब अब केवल अपनी फॉलोअर संख्या बढ़ाना बन गया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर बेमतलब के बहसों से समाज का मानसिक संतुलन बिगाड़ने का काम हो रहा है। यह पत्रकारिता नहीं, यह एक नया व्यवसाय है – अंधा, बेतुका, बेहयाई का व्यवसाय।

जिस पीढ़ी को हम भविष्य मानते हैं, वही आज दिखावे और दिखावटी रिश्तों में उलझ कर खुद को खो रही है। रिश्ते आज तारिखों की तरह हो चले हैं – एक्सपायरी डेट के बाद छोड़ दिए जाते हैं। यहां प्यार नहीं, एक फॉर्मूला चलता है – “क्या फायदा मिलेगा?” इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है?

भीम प्रज्ञा अखबार ही नहीं, बल्कि समाज की एक मजबूत विचारधारा है। अपने सामाजिक शिक्षा आंदोलन के माध्यम से यही संदेश देता है – असली पत्रकारिता वह है, जो समाज के नैतिक पतन को रोकने, सच्चाई को उजागर करने और सही दिशा दिखाने का कार्य करे। यह समय केवल विरोध का नहीं, आत्ममंथन का है। आज के पत्रकारों को समझना होगा कि वे केवल माइक थामे व्यवसायी नहीं, बल्कि समाज के प्रहरी हैं। उनके शब्द एक पीढ़ी के भविष्य को आकार देते हैं। यदि पत्रकार अपने भीतर की इस खरपतवार को नहीं निकालेंगे, तो यह उनकी प्रतिष्ठा को भी निगल जाएगा और समाज के भविष्य को भी। पत्रकारिता के कार्य को समाज वीडियो ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं कहता क्योंकि वह समाज का प्रहरी और राष्ट्र का सजग प्रचेता है। पत्रकार की कलम से लिखा गया शब्द और जुबान से बोली गई वाणी लोगों के लिए अध्यादेश से काम नहीं होती है। लोग उदाहरण देते हैं और दावा करते हैं कि यह बात फलां अखबार में छपी है। फलां एंकर ने कही है। पत्रकार की बात की सत्यता का प्रमाण पत्र मानकर अखबार की कटिंग या वीडियो की क्लिप को यूनिवर्सल ट्रुथ सर्टिफिकेट माना जाता है। इसीलिए लिखने से पहले और बोलने से पहले सत्यता की तराजू पर तौले। आत्म मंथन से खंगाले, यदि खरपतवार युक्त विषैला शब्द समाज में परोस दिया गया तो मानो गंभीर विषाक्तता का कारण बनेगा। और यह पत्रकारिता की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

यह समय है कठोर सोचने का। यह समय है आत्मा को झकझोरने का। अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को समझने का। केवल दिखावे के लिए चल रही पत्रकारिता से ऊपर उठकर, समझदारी, तटस्थता और न्याय के आधार पर खड़ा होना होगा। ताकि हमारे रिश्ते फिर से प्रेम, समझ और सम्मान की नींव पर खड़े हो सकें। ताकि झगड़े का विष खत्म हो, और परिवार एक बार फिर स्नेह का मंदिर बन जाए।

भीम प्रज्ञा अखबार इसी दिशा में एक ज्वलंत मशाल बनकर लगातार समाज को जागृत करने का कार्य करता रहेगा। क्योंकि समाज तभी सुधरेगा, जब हर व्यक्ति अपने अंदर की गलती स्वीकार कर उसके सुधार की पहल करेगा।

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