क्रोध : मुफ्त का वाई-फाई या दिमाग का वायरस?
संपादकीय
29 सितंबर 2025
*“क्रोध : मुफ्त का वाई-फाई या दिमाग का वायरस?”*
“क्रोध वह आग है जिसमें सबसे पहले आप खुद जलते हैं और राख बाकी लोगों पर उड़ाकर दावा करते हैं – देखो मैंने उन्हें सबक सिखा दिया!”
हमारे देश में दो चीज़ें मुफ्त हैं – सलाह और क्रोध। सलाह हम हर किसी को बांटते हैं, और क्रोध हम हर किसी पर बरसाते हैं। आप गौर कीजिए, हमारी सुबह की शुरुआत ही क्रोध से होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हमारे दिन की शुरुआत सुबह होती है तो क्रोध रचना शुरू हो जाता है जैसे दूधवाला देर से आए तो क्रोध, बस वाला आगे निकल जाए तो क्रोध, टीवी पर न्यूज एंकर ज्यादा चिल्ला दे तो क्रोध और अगर घरवाले याद दिला दें कि मोबाइल चार्ज कर लो, तो क्रोध का स्तर तो जैसे संसद का शीतकालीन सत्र बन जाता है – गरमा-गरमी ही गरमा-गरमी!
लेकिन क्या आपने देखा है? महान लोग क्रोध को मुफ्त वाई-फाई की तरह इस्तेमाल नहीं करते। उनके पास उसका पासवर्ड होता है – संयम। हम जैसे सामान्य लोग बिना पासवर्ड के वाई-फाई पकड़ लेते हैं और फिर वायरस (यानी झगड़े) पूरे सिस्टम में फैल जाते हैं।गांधीजी या सरदार पटेल को ही देख लीजिए – उन पर तो अंग्रेज़ रोज़ाना “ट्रोल” करते थे, फिर भी उन्होंने शांत रहकर जवाब दिया।
हमसे कोई सोशल मीडिया पर “डिसलाइक” कर दे, तो रातभर नींद नहीं आती!
क्रोध भी बड़ा चालाक है। जब आता है तो हीरो बनकर आता है, लेकिन जाते-जाते हमें विलेन बना देता है। हम सोचते हैं – “आज मैंने उसे सबक सिखा दिया”,लेकिन बाद में पता चलता है – “सबक तो खुद मुझे मिल गया।” दफ़्तर में बॉस ने कुछ कह दिया –तुरंत हम क्रोध में अपनी इज़्ज़त की बारात निकाल देते हैं।
घर में बच्चों ने प्लेट गिरा दी –
तुरंत हम क्रोध में ताश का महल गिरा देते हैं।नतीजा? घर में तनाव, ऑफिस में दूरी और रिश्तों में दरार।
महान लोग इसीलिए महान हैं कि उन्होंने क्रोध के साथ डील करना सीख लिया है। वे जानते हैं कि क्रोध को इंस्ट्रूमेंट की तरह बजाना है, हम जैसे लोग उसे धमाका बना देते हैं। गांधीजी अगर रोज़ाना सब पर चिल्लाते रहते, तो शायद अहिंसा आंदोलन की जगह आवाज़ आंदोलन चल रहा होता।
और सरदार पटेल का “लौह पुरुष” वाला खिताब शायद “लावा पुरुष” हो गया होता।
इसलिए ज़रूरी है कि हम क्रोध को एक साइलेंट मोड में डालना सीखें। जब क्रोध आए, तो सोचें -“क्या यह इतना जरूरी है कि मेरी इमेज खराब हो जाए?”
“क्या मैं इस पर कल भी इतना ही नाराज़ रहूँगा?”
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो क्रोध को उसी वक़्त एयरप्लेन मोड पर डाल दें।
व्यंग्य की बात अलग, लेकिन संदेश यही है – “क्रोध एक मुफ्त एप है, लेकिन उसका इन-ऐप परचेज़ बहुत महंगा पड़ता है –
रिश्ते, स्वास्थ्य और दिमाग की शांति।”
तो आइए, आज ठान लें –
हम क्रोध को मुफ्त का वाई-फाई नहीं बनाएँगे,
बल्कि संयम का पासवर्ड लगाकर ही इस्तेमाल करेंगे।
तभी जीवन में नेटवर्क भी फुल रहेगा, और डेटा (यानी दिमाग) भी सुरक्षित रहेगा।
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