श्राद्ध की पूड़ियां और झूठी श्रद्धा का तमाशा”
संपादकीय
14 सितंबर 2025
*“श्राद्ध की पूड़ियां और झूठी श्रद्धा का तमाशा”*
श्राद्ध पक्ष आते ही गांव से लेकर शहर की गलियों में घी की महक और श्रद्धा की ‘घोषणाएं गूंजने लगती हैं। एक ओर थालियों में पूड़ियां सज रही हैं, पंडालों में भोज के निमंत्रण छप रहे हैं, तो दूसरी ओर मन ही मन सवाल उठता है – क्या यही श्राद्ध है? क्या यही हमारे संस्कार हैं?
जीवित रहते जिन माता-पिता के लिए दो मीठे बोल, एक गिलास पानी और थोड़ी-सी सेवा भारी पड़ती थी, उनके लिए मृत्यु के बाद दिखावे की यह अपार आस्था किसे धोखा दे रही है? माता-पिता के सामने चेहरे पर शिकन और उनके जाने के बाद शोकसभा में नकली आँसू – यह सिर्फ़ सामाजिक विडंबना नहीं, बल्कि संस्कारों का नैतिक दिवालियापन है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
श्राद्ध पक्ष आते ही समाज में श्रद्धा का नहीं बल्कि दिखावे का मौसम शुरू हो जाता है। गलियों में घी और पूड़ियों की महक फैलती है, मंडप सजते हैं, थालियाँ सजाई जाती हैं और लोग आमंत्रण पर आमंत्रण बांटते हैं। पंडित बुलाए जाते हैं, बड़े-बड़े बैनर लगते हैं और फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाते हैं। ऐसा लगता है मानो मृतक आत्मा की शांति से ज्यादा बड़ा मुद्दा यह है कि समाज देखे कि हमने कितना खर्च किया, कितनी भीड़ जुटाई और किस स्तर का आयोजन किया।
विडंबना यह है कि यही लोग जीते जी अपने माता-पिता को दो मीठे बोल तक नहीं दे पाते। माँ की दवा के लिए बहाने बनाने वाले, पिता की पीड़ा को नजरअंदाज करने वाले, बुज़ुर्गों को अकेलापन सौंप देने वाले बेटे-बेटियाँ जब माता-पिता दुनिया से चले जाते हैं तब श्रद्धा की ऐसी झूठी नुमाइश करते हैं कि मानो उन्होंने जीवनभर सेवा की हो। यह सिर्फ़ व्यक्तिगत दोहरापन नहीं बल्कि समाज के संस्कारों पर चोट है। परंपरा अब आस्था और सम्मान का माध्यम न रहकर सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा का मंच बन चुकी है।
श्राद्ध भोज अब एक सामाजिक दौड़ है—किसने ज़्यादा लोगों को बुलाया, किसने महंगे पकवान बनवाए, किसने सबसे बड़ा मंडप सजाया। श्रद्धा और कर्तव्य की जगह अब दिखावा और खर्च ने ले ली है। सवाल यह है कि क्या आत्मा की शांति पूड़ियों से मिल सकती है? क्या माँ-बाप का आशीर्वाद भोज की थाली से खरीदा जा सकता है? असली श्राद्ध तो वह है जिसमें जीते जी उनका सम्मान हो, समय दिया जाए, उनकी भावनाओं को समझा जाए और उन्हें अकेलेपन का बोझ न उठाना पड़े।
आज की पीढ़ी के लिए यह स्थिति खतरनाक है। जब बच्चे अपने घर में देखते हैं कि माँ-बाप के साथ जीते जी सख्ती, उपेक्षा और अनादर है और मृत्यु के बाद दिखावे की भीड़, तो वे यही सीखते हैं कि संस्कार का मतलब है समाज को दिखाना, न कि परिवार को निभाना। यही कारण है कि परंपरा की आत्मा मर रही है और समाज नैतिक पतन की ओर बढ़ रहा है।
जरूरत है कि श्राद्ध को भोज और थालियों से निकालकर आचरण में लाया जाए। विद्यालयों और परिवारों को बच्चों को यह शिक्षा देनी चाहिए कि असली श्रद्धा सेवा है, असली पूड़ी वह है जो अपने हाथों से बुज़ुर्ग को खिलाई जाए, असली पूजा वह है जब हम उनके दुख में साथ खड़े हों। धार्मिक संस्थाओं को भीड़ और आयोजन की जगह सेवा और सहानुभूति पर बल देना चाहिए। मीडिया और समाज को भी दिखावे की तस्वीरों की जगह सच्ची सेवा की कहानियों को महत्व देना चाहिए।
श्राद्ध की पूड़ियाँ कुछ समय के लिए पेट भर सकती हैं, लेकिन जीते जी की गई सेवा आत्मा को सदा तृप्त करती है। यदि हम सचमुच संस्कारों को बचाना चाहते हैं तो हमें दिखावे की झूठी श्रद्धा छोड़कर अपने माता-पिता की सेवा को जीवन का मूल मंत्र बनाना होगा। वरना आने वाली पीढ़ी केवल यही सीखेगी कि परंपरा का मतलब भोज है और संस्कार का मतलब फोटो—और यही सबसे बड़ा नैतिक दिवालियापन होगा।
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