शिक्षक सम्मेलन : चाय-समोसे में शिक्षा का भविष्य?
संपादकीय
28 सितंबर 2025
*“शिक्षक सम्मेलन : चाय-समोसे में शिक्षा का भविष्य?”*
राजस्थान में इन दिनों जगह-जगह शिक्षक संगठनों के सम्मेलन हो रहे हैं। मंच सजे हैं, पोस्टर लगे हैं, और भीड़ जुटाई जा रही है—लेकिन सवाल यह है कि इन सम्मेलनों में आखिर हो क्या रहा है? शिक्षा की गुणवत्ता पर चर्चा या फिर नेताओं की चाटुकारिता और तबादलों की राजनीति? अनेकों सवालों की उलझन में यदि यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दुःखद यह है कि जिन मंचों को नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम सुधार, शिक्षक-छात्र संवाद, और तकनीकी बदलावों पर गंभीर बहस का केन्द्र होना चाहिए, वे मंच अब सत्ता और संगठन की ताकत दिखाने के अखाड़े बन गए हैं। शिक्षक नेता अपने-अपने गुटों के साथ ‘किसका तबादला बचाना है’ और ‘किसको किक लगानी है’ जैसी फुसफुसाहटों में व्यस्त हैं। शिक्षा सुधार, नई नीति, या गरीब तबके के बच्चों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास जैसे मुद्दों पर शायद ही कोई बात हो रही हो।
यह भी कड़वी सच्चाई है कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। मंत्रिमंडल और विभागीय अधिकारी आंकड़ों की बाज़ीगरी से सुधार का दावा करते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है। बच्चों को सिर्फ़ पास कर देने, अच्छे अंक दिखाने या प्रतिशत बढ़ाने से समाज का भला नहीं होने वाला। आज जरूरत है ‘परसेंटाइल’ की नहीं, ‘अनुभव वाली शिक्षा’ की—जहाँ ज्ञान जीवन में काम आए और संस्कार भी दे।
लेकिन जब शिक्षक सम्मेलन केवल औपचारिकताओं, चाय-समोसे और मंचीय भाषणबाज़ी तक सीमित रह जाएं, तब इस पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या चमचागिरी और ट्रांसफर-बचाओ राजनीति के बल पर शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी? क्या यही अध्यापक समाज को प्रेरणा देने वाला है?
अब समय है कि शिक्षक संगठन और उनके नेता आत्ममंथन करें।
सम्मेलन ‘मिठाई-भोज’ के बजाए ‘मंथन-चिंतन’ के मंच बनें।
राजनीतिक दलों के दरवाज़े खटखटाने के बजाय बच्चों के भविष्य की चिंता करें।
नई शिक्षा नीति, शिक्षक-छात्र संवाद, तकनीकी बदलाव, और गरीब तबके के बच्चों को मुख्यधारा में लाने जैसे मुद्दों पर ठोस चर्चा करें।
अगर शिक्षक ही अपनी भूमिका भूल गए तो समाज का नैतिक और बौद्धिक भविष्य कौन गढ़ेगा? चाय-समोसे के साथ बीत जाने वाले सम्मेलन और चमचागिरी की चमक में शिक्षा का भविष्य नहीं सवरता। अब जरूरत है साहस दिखाने की—सत्ता या विपक्ष को खुश करने की नहीं, बल्कि कक्षा में बैठे उस बच्चे को ‘सशक्त’ करने की, जिसके भरोसे कल का भारत खड़ा है।
नेतृत्व कर रहे शिक्षक नेताओं की हालात यह है कि मंच से ‘गुणवत्ता सुधार’ का भाषण देते हैं, और मंच से उतरते ही किसी अफसर के कान में ‘मेरे लोगों का ट्रांसफर मत करना’ का राग गाते हैं। सम्मेलन में आई भीड़ भी समझ चुकी है कि यह सब ‘शिक्षा महाकुंभ’ नहीं, ‘तबादला महोत्सव’ है। जो जितना ज़ोर से नारे लगाएगा, उसकी फाइल उतनी तेज़ी से आगे बढ़ेगी।
वहीं, सरकार और शिक्षा विभाग आंकड़ों की घोड़ी पर सवार हैं – ‘हमने इतने स्मार्ट क्लास बनाए, इतने प्रतिशत बच्चे पास किए’ जैसी घोषणाएं काग़ज़ पर तेज़ दौड़ती हैं, पर ज़मीन पर वही पुराने जर्जर कमरे, खाली पद, और किताबों के बिना भटकते बच्चे।
सवाल यह है कि क्या ऐसे सम्मेलनों से शिक्षा सुधरेगी? या फिर ये महज़ ‘शिक्षक नेता’ बनने की ट्रेनिंग सेंटर बनकर रह जाएंगे? चाय-समोसे में भीगे इन सम्मेलनों से ‘गुणवत्ता’ का जन्म तो नहीं हो सकता। शिक्षा को बचाने के लिए सम्मेलन को ‘तबादला बचाओ मंच’ से ‘भविष्य बनाओ मंच’ बनाना पड़ेगा।
यदि शिक्षक खुद ही अपनी भूमिका भूलकर ‘चमचागिरी’ को ही उपलब्धि मान बैठेंगे, तो आने वाले समय में सरकारी स्कूल बच्चों को ज्ञान नहीं, सिर्फ़ सर्टिफिकेट बाँटने की मशीन बन जाएंगे। गरीब तबके के बच्चे और समाज के पिछड़े हिस्से की उम्मीदें ‘नेताओं की माला’ में उलझकर रह जाएँगी।
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