देवी के पंडालों में भक्ति, गलियों में बेटियों की दुर्दशा
संपादकीय
24 अक्टूबर 2025
*“देवी के पंडालों में भक्ति, गलियों में बेटियों की दुर्दशा”*
देश में नवरात्रि का माहौल है। जगह-जगह दुर्गा मां के भव्य पंडाल सज रहे हैं। भक्तजन देवी को फूल, प्रसाद, चुनरी अर्पित कर रहे हैं। घर-घर में कन्या पूजन की तैयारी है—अबोध बालिकाओं के पैर धोए जाएंगे, उन्हें देवी मानकर भोज कराया जाएगा। लेकिन ज़रा पंडाल से बाहर कदम रखिए, वही कन्याएं गलियों और घरों में असली जिंदगी जी रही हैं, जहां उनके सम्मान की कोई कीमत नहीं। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह अजीब विडंबना नहीं तो और क्या है कि देवी मां को ‘महिषासुर मर्दिनी’ के रूप में पूजने वाला समाज, अपनी ही गलियों के राक्षसों से बेटियों को बचा नहीं पा रहा? हर साल ढोल-नगाड़ों पर देवी के जयकारे गूंजते हैं, लेकिन उसी बीच अखबारों के पहले पन्ने पर ‘अबोध बच्ची से दुष्कर्म’ जैसी खबरें भी गूंजती रहती हैं। और समाज? वह मौन साध लेता है।
हम कन्याओं को थाली में हलवा-पूरी परोसकर देवी मान लेते हैं, लेकिन जब वही बच्चियां शिक्षा मांगती हैं तो स्कूलों में दो महीने तक किताबें तक नहीं मिलतीं। जब वही युवतियां सुरक्षा मांगती हैं तो उन्हें बस में, सड़क पर, दफ्तर में उत्पीड़न झेलना पड़ता है। और जब वही महिलाएं न्याय मांगती हैं, तो न्यायालय की तारीख़ों में उनका जीवन उलझकर रह जाता है। क्या यही है नवरात्रि की शिक्षा?
सोशल मीडिया का जमाना है, जहां भक्तगण रोज़ाना भक्ति की फोटो अपलोड कर ‘जय माता दी’ लिखकर लाइक बटोरते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या माता दी को इस दिखावे के फॉलोअर्स चाहिए या समाज में नारी के लिए सम्मान? अगर देवी का पूजन केवल ट्रेंडिंग पोस्ट बनकर रह जाएगा, तो असल में यह आस्था नहीं, ‘रिल्स भक्ति’ कहलाएगी।
नवरात्रि का पर्व हमें सिखाता है कि नारी शक्ति ही सृष्टि का आधार है। लेकिन हकीकत यह है कि हम नारी को देवी के रूप में तो स्वीकारते हैं, इंसान के रूप में नहीं। हम भूल जाते हैं कि पूजा का असली अर्थ दीपक जलाने में नहीं, बल्कि अंधकार मिटाने में है—और आज का सबसे बड़ा अंधकार है बेटियों के सम्मान पर होता आघात।
सच कहा जाए तो अगर समाज बेटियों को सुरक्षा और बराबरी का हक़ नहीं दे पा रहा, तो दुर्गा पूजा केवल नौ दिन का उत्सव नहीं बल्कि नौ दिन का ढोंग है। असली पूजा वही है, जिसमें घर-घर की बहन-बेटी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। वरना मंदिरों में देवी की मूर्तियां चमकेंगी, लेकिन गलियों में बेटियां सहमकर जीएंगी।
अब वक्त आ गया है कि हम देवी को केवल पंडाल में न ढूंढें, बल्कि अपने व्यवहार में खोजें। यह नवरात्रि हमें यह याद दिलाए कि आस्था का असली अर्थ तभी है जब हर नारी को समाज में महफूज जगह मिले। बाकी ढोल-नगाड़े, भजन-कीर्तन और कन्या भोज—अगर इन्हीं तक सीमित रह गए—तो मां दुर्गा की आंखें मूर्ति से बाहर आकर हम पर व्यंग्य ही करेंगी।
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