तनाव के बोझ तले दबता इंसान और बचपन की तलाश*

संपादकीय 
3 सितंबर 2025
*तनाव के बोझ तले दबता इंसान और बचपन की तलाश* 
हर व्यक्ति आज अपने जीवन को तनाव और स्ट्रेस के ढेर तले ढोह रहा है। भौतिकवादी संसाधनों के पीछे भागते-भागते इंसान ने जीवन का असली आनंद ही खो दिया है। सुख की तलाश में गाड़ी, बंगला, महंगे मोबाइल, शोहरत और शानो-शौकत जुटाई जा रही है, लेकिन इस दिखावे के पीछे छिपा है एक ऐसा खालीपन—जहाँ केवल बेचैनी, भय और कुंठा पल रही है। देखने में व्यक्ति लज़री लाइफ़ का हिस्सा दिखता है, मगर भीतर से खोखला और अशांत है। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

दिनभर पैसा कमाने की भागदौड़, मोबाइल पर आभासी रिश्तों की चकाचौंध और सोशल मीडिया की चमक—यही उसकी असल दिनचर्या बन गई है। घर में भी प्रत्यक्ष संवाद मर रहा है। पत्नी, बच्चे, माता-पिता सब सामने होते हुए भी संवाद मोबाइल स्क्रीन पर सिमट जाता है। हँसना, खेलना, दिल खोलकर बतियाना—यह सब अब "इमोजी" और "स्टेटस" में कैद हो चुका है।

और यही सबसे बड़ी त्रासदी है कि जीवन की तीनों अवस्थाएँ अपने मायने खो रही हैं। बचपन—जहाँ निष्कपट हँसी और मासूम खेल थे—वह अब किताबों के बोझ और स्क्रीन की गिरफ्त में कैद है। जवानी—जहाँ उत्साह और उमंग होना चाहिए—वह अब नौकरी, पैसे और करियर की अनवरत भागदौड़ का बोझा ढोने का यंत्र बन गई है। और बुढ़ापा—जो कभी घर का अनुभव और स्नेह बाँटने का पड़ाव था—वह अब "बेकार" और "बोझ" समझा जाने लगा है।

इस संकट का सबसे बड़ा कारण है—भौतिक संसाधनों के पीछे भागती अंधी दौड़। इंसान ने यह मान लिया है कि बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, महंगे कपड़े और ब्रांडेड मोबाइल ही सफलता का पैमाना हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इन सबके बीच जीवन का असली सुख कहीं पीछे छूट गया है। आज व्यक्ति "आभासी जीवन" जी रहा है—जहाँ हजारों वर्चुअल दोस्त हैं, लेकिन असली हमदर्द एक भी नहीं।

इसलिए आज जरूरत है अपने भीतर के बच्चे को फिर से जगाने की।
एक बार सोचिए, बचपन में कितनी आसानी से हम हँसते थे, मिट्टी में खेलकर भी सुख पाते थे, बिना दिखावे के दोस्ती निभाते थे। वही सहजता और वही निश्छलता अगर आज के जीवन में लौटा लें, तो यह तनाव और कुंठा स्वतः मिट जाएगी।

भौतिक संसाधन जरूरी हैं, पर जीवन का असली सुख उनसे नहीं—बल्कि संतोष, प्रेम और सरलता से है। जब इंसान यह समझ जाएगा कि "अधिक पाने की दौड़" ही उसके दुःख की जड़ है, तभी वह शांति को पा सकेगा।

आज के इस भौतिकवादी दौर में सबसे बड़ा साहस यही है कि इंसान अपनी हँसी, अपनी सहजता और अपने रिश्तों को बचाए रखे। क्योंकि जीवन अंततः वही है—जहाँ निस्वार्थ भाव से कोई हँसी बाँटे, जहाँ परिवार संग संवाद हो, जहाँ बचपन की निश्छलता बनी रहे।

हमारे समाज में हर कोई बड़ा बनने की होड़ में है। पद, प्रतिष्ठा, पैसा और पहचान की अंधी दौड़ में हम इतने उलझ गए हैं कि मुस्कुराना, खिलखिलाना और निश्चिंत होकर जीना जैसे भूल ही गए हैं। परिणाम क्या है? हर चेहरे पर तनाव, हर कदम पर थकान और हर मन में असंतोष।
लेकिन एक सरल उपाय है—दिन में कुछ पल के लिए बच्चा बनकर देखिए। क्योंकि जीवन का असली सौंदर्य बड़े बनने में नहीं, बच्चा बने रहने में है।

बच्चे का मन निष्कपट होता है। उन्हें न अतीत का बोझ सताता है, न भविष्य की चिंता। वे वर्तमान में जीते हैं और वही उनका आनंद है। हम भी अगर यह कला सीख लें, तो जीवन का बोझ हल्का हो जाएगा। आप पाएंगे कि जब आप बच्चे जैसी निश्छलता से हंसते हैं, खेलते हैं या छोटी-सी खुशी का आनंद लेते हैं, तो आपकी सारी थकान मिट जाती है और जीवन फिर से ऊर्जा से भर उठता है।

आज की सबसे बड़ी बीमारी तनाव है। दवाइयां, डॉक्टर और इलाज हमें थोड़ी राहत भले दे दें, लेकिन सच्चा समाधान हमारे भीतर छिपा है। और वह है—बच्चा बनकर जीने की कला। यही कला हमें सिखाती है कि शिकायतें छोड़ो, कृतज्ञ बनो। हमें कितना मिला है, यह सोचो। यह संतोष का भाव ही जीवन को शांत और सुखद बनाता है।

बच्चे की मासूमियत हमें यह भी सिखाती है कि मेहनत और अभ्यास ही असली चाबी है। खेल-खेल में गिरते पड़ते हुए भी बच्चा बार-बार उठकर खड़ा हो जाता है। यही जिद, यही लगन और यही निरंतरता बड़े जीवन की सफलता का भी मूल मंत्र है।

माता-पिता के लिए भी यह संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। बच्चे को वैसे ही स्वीकारें जैसे वह है, न कि वैसे जैसे समाज उसे देखना चाहता है। उन्हें दबाव में नहीं, आनंद में पढ़ाइए। जब बच्चा वही करेगा, जिसमें उसे खुशी मिलती है, तभी उसका भविष्य उज्ज्वल होगा।

आज आवश्यकता है कि हम गंभीरता से सोचे—क्या हमारी “बड़प्पन” की होड़ ने हमें सच में खुश किया है? अगर नहीं, तो एक बार फिर अपने भीतर के बच्चे को जगाइए। हृदय को हल्का कीजिए, जीवन को सरल कीजिए। यही सच्चा उपचार है, यही सच्चा आनंद है। क्योंकि जीवन का सौंदर्य बड़े बनने में नहीं, बच्चा बने रहने में है। इसलिए आप भी अपने अंदर के बचपन की तलाश कीजिए। दिन में कम से कम एक बार बच्चा बनकर देखिए। जीवन का आनंद आएगा।

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