सोशल मीडिया: ज्ञान का पुल या सामाजिक विषाणु?
संपादकीय
12 सितंबर 2025
*सोशल मीडिया: ज्ञान का पुल या सामाजिक विषाणु?*
आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। जहाँ एक क्लिक पर दुनिया की हर जानकारी, हर व्यक्ति, हर विचार हाथ में होता है, वहीं इसी उन्नति ने हमें एक ऐसा सामाजिक विषाणु भी थमा दिया है, जिसका नाम है – अनियंत्रित सोशल मीडिया। यह वो माध्यम बन चुका है, जो एक ओर हमें जोड़े रखने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर यह समाज की नैतिकताएं, संस्कार, और विवेक बर्बाद करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आधुनिक यथार्थ यह है कि समाज की जड़ें कमजोर हो रही हैं और लोग केवल फॉलोअर्स, लाइक्स और वायरलिटी की दौड़ में अंधाधुंध भाग रहे हैं। एक समय था जब रिश्तों को मजबूती से निभाया जाता था, जब संवाद की मिठास होती थी, पर आजकल बच्चों का पहला प्रश्न यह बन गया है – “यह वीडियो वायरल कब होगा?” या “मुझे कितने लाइक्स मिलेंगे?” इस आत्मकेंद्रित सोच ने परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक सहयोग की परिकल्पना को छिन्न-भिन्न कर दिया है।
क्या आप जानते हैं? आजकल युवा पीढ़ी “नहीं जानना, लेकिन सबको बताना” की प्रवृत्ति में उलझ चुकी है। कल तक जो तथ्य समझकर छुपाए जाते थे, आज वही ‘सर्वाइवर स्टोरी’ बनकर फेसबुक या यूट्यूब पर परोसी जाती है। मान लीजिए, घर से भागी एक लड़की की खबर हो तो उसकी व्यक्तिगत और संवेदनशील बातें इतनी बेहिचक सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दी जाती हैं, जैसे कोई पुरस्कार वितरण समारोह हो। ऐसी पत्रकारिता नहीं, सस्ते मनोरंजन की दुकान है।
और बात करें तथाकथित यूट्यूबर पत्रकारों की तो इन्हें देखकर लगता है जैसे उन्होंने पत्रकारिता के स्थान पर ड्रामा का कोर्स कर लिया हो। बिना जांच-पड़ताल के, बिना प्रमाण के, हर छोटी सी घटना को बेमतलब के सनसनीखेज बना दिया जाता है। नतीजा? पीड़ित महिला का सम्मान तार-तार, समाज में व्याप्त असुरक्षा की भावना दोगुनी और न्यायपालिका पर भरोसे की अवमानना।
साथ ही, सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के खिलाफ खबर बनाने के नाम पर तथाकथित पत्रकार सरपंच या कर्मचारी पर व्यक्तिगत मनमानी का हमला कर देते हैं। प्रशासन को अपने पालतू बताकर मीडिया के बल पर दबाव बनाते हैं। क्या यही है पत्रकारिता का उद्देश्य? जनता की आवाज बनना? या फिर अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और व्यवसाय चमकाना?
जहाँ पहले पत्रकारिता के सिद्धांत “तथ्य, निष्पक्षता, सेवा भाव और समाज कल्याण” हुआ करते थे, आज वे सिद्धांत सिर्फ किताबों में रह गए हैं। अब तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे बन गए हैं जैसे बिकाऊ मेला, जहां बिना प्रमाणीकरण के अफवाहें फैलाई जाती हैं, और लोगों के मानस पटल पर गलत धारणाएं बैठा दी जाती हैं।
क्या यह सही है कि पीड़ित महिला से सवाल पूछना जिसकी कानूनी अनुमति केवल मजिस्ट्रेट के सामने होनी चाहिए, उसे पब्लिक प्लेटफॉर्म पर यूट्यूबर पत्रकार बेबाकी से बेतुकी बातें पूछें? क्या इसी रूप में हम पत्रकारिता को आगे बढ़ाना चाहते हैं?
अब वक्त आ गया है कि हम आत्म-चिंतन करें। पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं, धर्म है। समाज का प्रहरी है। यूट्यूब पर सनसनी फैलाकर लाइक्स बटोरने की चाह में समाज की नैतिकता को गंदा करने वाले पत्रकारों को अपनी साख पर नजर रखनी होगी। संगठनों को चाहिए कि वे ऐसे तत्वों पर कड़ा रुख अपनाएं, ताकि यह खरपतवार खत्म हो और सच्ची पत्रकारिता का पौधा फले-फूले।
समाज को समझना होगा कि गहराई से सोचने की आवश्यकता है। केवल फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए पीड़ित का दर्द बेबाकी से उजागर करना, सच का विकृत संस्करण पेश करना या व्यक्तिगत प्रतिशोध को सार्वजनिक मंच पर परोस देना पत्रकारिता नहीं, पतन है। समाज का नेतृत्व करना है तो पहले खुद के नैतिक चरित्र की जाँच करनी होगी।
समाज सुधार का सबसे प्रभावी साधन यही है कि हम समझें – “सोशल मीडिया को साधें, नहीं तो यह हमें साध लेगा।” हर नागरिक, हर माता-पिता, हर शिक्षक, और हर जागरूक नागरिक को मिलकर इस विषाक्त प्रवृत्ति के विरुद्ध कदम उठाने होंगे। ताकि सोशल मीडिया केवल कनेक्शन का माध्यम बनकर नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कार का पुल बने।
आज अगर हम सच का मार्ग अपनाएंगे तो कल के पीढ़ी को भी नैतिकता का प्रकाश मिलेगा। वरना इस डिजिटल युग में फेक न्यूज़ और सनसनीखेज कंटेंट का अंधकार लगातार बढ़ता रहेगा।
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