विवाह बनाम बाजार: रिश्तों की पवित्रता की कुर्बानी
संपादकीय
8 सितंबर 2025
*विवाह बनाम बाजार: रिश्तों की पवित्रता की कुर्बानी*
विवाह, जिसे सदियों से समाज का पवित्र बंधन माना गया है, आज उस पवित्रता को खोता जा रहा है। यह एक ऐसा अनुबंध था, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच विश्वास, समझदारी, और एक-दूसरे के साथ जीवन यापन करने की परिकल्पना थी। परंतु आज विवाह किसी सामाजिक समझौते से कहीं अधिक व्यावसायिक समझौते में तब्दील होता जा रहा है। रिश्तों की तलाश अब प्रेम या आत्मीयता के आधार पर नहीं, बल्कि पैसों, पदों और समाज में दिखावे की प्रतियोगिता के रूप में की जाती है। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
कहते हैं कि एक अच्छा रिश्ता बनाना तो एक कला है, लेकिन आज वह कला अधूरा रह गया है। लड़के और लड़कियों के परिवार अब बायोडाटा तैयार करके व्हाट्सएप ग्रुप्स पर झोंक देते हैं। जैसे किसी प्रोडक्ट की तरह उनका मूल्य तय किया जाता है। बेटी को लेकर माँ-बाप की पहली चिंता यह हो गई है कि उसके पास कितना स्कोर है, कितनी फीस वाली नौकरी लगी है, कितने इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हैं। बेटे की वैवाहिक मांगों का स्तर भी ‘प्रोफेशनलिज्म’ तक सीमित हो चुका है। सरकारी नौकरी लगे या कोई निजी जॉब, दोनों पर आजकल शर्तें लागू हो रही हैं जैसे व्यापार में अनुबंध की लाइनें होती हैं।
समस्या की जड़ कहीं और भी गहरी है। रिश्तेदार मिलते नहीं, परिवार के बैठक स्थल घटते जा रहे हैं। पहले तो पोली पर बैठकर हर रिश्तेदार अपनी-अपनी बात कहता था। पर अब हर सदस्य अपने-अपने बेडरूम में खो गया है। संवाद गायब हो गया है। रिश्तों की जड़ें कमजोर होती जा रही हैं, क्योंकि वास्तविक संवाद की जगह अब मोबाइल की दो टूक तुनक मिजाजी की बातें हो गई हैं। आज यदि एक व्यक्ति सोशल मीडिया पर कटाक्षात्मक टिप्पणी कर देता है, तो वह रिश्ते में दरार पैदा कर देता है। आमने-सामने बैठकर समस्या सुलझाना आसान था, लेकिन आभासी दुनिया ने बातचीत के ठोस पुल तोड़ दिए हैं।
अत्यंत दुखद है कि वही समाज, जिसकी संरचना रिश्तों पर टिकी थी, अब उन रिश्तों के लिए गुनहगार बनता जा रहा है। जहां पंचायत में बोलने वाले व्यक्ति को भी अपने घर में अपने परिवार द्वारा रोका जाता है। हर कोई दूसरों को खुश रखने के लिए अपनी बात दबा देता है। सच्चाई की जगह दिखावा हावी हो चुका है। समाज में असली चेहरे छिपने लगे हैं। सही बोलने वाले लोग भी चुप हो जाते हैं, और गलत लोगों का बोलबाला जम जाता है।
इस विकट परिदृश्य में यह सोचना जरूरी है कि हम खुद को कैसे बदल सकते हैं। अगर विवाह को मात्र एक शर्तों की सूची समझने की प्रवृत्ति नहीं छोड़ेंगे, तो यह समाज का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार टूटता रहेगा। यह जरूरी नहीं कि बच्चे की शादी तब ही हो जब उसका वेतन अच्छा हो। बल्कि जरूरी यह है कि दोनों के बीच समझ और सहमति बनी हो। यह सोच बदलना होगा कि दहेज, दिखावा या बड़े पदों वाले रिश्ते ही ‘अच्छा रिश्ता’ कहलाएंगे।
समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह समझने की जरूरत है कि रिश्ते केवल सरकारी नौकरी या संपत्ति के इर्द-गिर्द घूमते नहीं हैं। रिश्ते विश्वास, स्नेह और पारिवारिक संस्कारों की नींव पर टिका होना चाहिए। इसी दिशा में हमें अपने परिवार, समाज और स्वयं को जागरूक करना पड़ेगा। पिता को बेटियों की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों से संवाद करें, उनकी इच्छाओं को समझें और उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करें।
भीम प्रज्ञा अखबार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन विचारों को समाज तक पहुंचाए। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज के अंधकार में एक दीप जलाना है। यह दीप सच्चाई, समझदारी और सरलता का प्रकाश हो ताकि हर रिश्ता दिखावे से ऊपर उठकर मानवता के आधार पर मजबूती से खड़ा हो सके।
आखिरकार, विकल्प तो अनगिनत मिलते हैं – संपन्नता, दिखावा, पद, पैसे, लेकिन असली विकल्प यही है – सच्चा, निष्कलंक रिश्ता। इसे खोजिए। इसे अपनाइए। तभी हम अपने समाज को उस पवित्रता की ओर ले जा पाएंगे, जिसके लिए यह अनमोल संस्कार सदा से समर्पित रहा है।
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