अहंकार का सेल्फी युग: लाइक्स के सिंहासन पर बैठे राजा

संपादकीय 
20 September 2025
*अहंकार का सेल्फी युग: लाइक्स के सिंहासन पर बैठे राजा* 
कभी अहंकार का ठिकाना महलों, सिंहासन और सोने-चाँदी के खजाने में होता था। राजा-महाराजा ताकत और संपत्ति के नशे में चूर रहते थे। लेकिन समय बदल गया है। अब अहंकार का सिंहासन बदलकर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टिक गया है, और दरबारियों की जगह फॉलोअर्स आ गए हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आजकल तो लोग एक कप चाय पी लें, तो उसका फोटो डालते हैं – “चाय विद पॉजिटिव वाइब्स”। लाइक्स आते हैं, कमेंट्स आते हैं – और अहंकार पंख लगाकर उड़ जाता है। पहले लोग मंदिर बनवाकर अपना नाम पत्थर पर खुदवाते थे, अब लोग सेल्फी डालकर इंस्टा-फेसबुक पर फीलिंग ब्लेस्ड लिख देते हैं। फर्क बस इतना है कि पहले अहंकार पत्थरों में उकेरा जाता था, अब डिजिटल स्क्रीन पर।

ज्ञान का अहंकार भी खूब बिक रहा है। दो लाइनें पढ़कर कोई यूट्यूब पर “मोटिवेशनल स्पीकर” बन जाता है और फिर अपनी ही तारीफ में घंटेभर की वीडियो डाल देता है। जिनकी खुद की जिंदगी का बैलेंस शीट गड़बड़ है, वे दूसरों को “लाइफ बैलेंस” सिखाने में लगे हैं।

दान का अहंकार भी अब नया रूप ले चुका है। पहले लोग मंदिर में गुप्तदान करते थे, अब लोग गरीब को कंबल देते हैं, पर उससे पहले मोबाइल निकालकर दस बार फोटो खींचते हैं, ताकि “आज 50 कंबल बांटे – कृपया आशीर्वाद दें” वाली पोस्ट डाली जा सके। सच तो यह है कि दान से ज्यादा फिक्र उन्हें अपने लाइक्स और कमेंट्स की रहती है।

छोटी-छोटी उपलब्धियां भी अब अहंकार का कारण बन गई हैं। किसी ने 5 किलो वजन घटा लिया, तो तुरंत पहले और बाद की तस्वीर डाल दी। किसी ने ऑफिस में “बेस्ट एम्प्लॉयी” का सर्टिफिकेट पा लिया, तो फ्रेम कराकर इंस्टा पर डाल दिया। और तो और, “पहली बार 5 किलोमीटर वॉक पूरी की” जैसी पोस्ट भी ऐसे लिखी जाती हैं जैसे एवरेस्ट फतह कर लिया हो।

यह अहंकार का नया संस्करण है – “सोशल मीडिया अहंकार”। यहां लोग अपने असली गुण नहीं, बल्कि एडिटेड फोटो और हैशटैग्स के जरिए महानता साबित करते हैं। कोई अपने रूप-रंग का घमंड कर रहा है, कोई अपनी छुट्टी की जगह का, तो कोई अपने खाने-पीने तक का। यह सब देखकर लगता है कि इंसान की सबसे बड़ी उपलब्धि अब दूसरों को जलाना रह गई है।

परंतु असली महानता दिखावे से नहीं, बल्कि चुपचाप अच्छे कर्म करने से होती है। गुमनाम लोग ही समाज को बदलते हैं, न कि वो जिनके काम से ज्यादा “पोस्ट” वायरल होती हैं। इतिहास ने यही सिखाया है कि अहंकार चाहे सोने के सिंहासन पर हो या मोबाइल की स्क्रीन पर, उसका अंजाम पतन ही है।

 आज का इंसान अपने नाम के आगे “फॉलोअर्स की गिनती” देखकर मुस्कुराता है और असली रिश्तों की गिनती भूल जाता है। सच तो यह है कि विनम्रता लाइक्स में नहीं मिलती, वह आपके कर्मों और व्यवहार में झलकती है। अगर दिखावा ही सब कुछ है, तो फिर याद रखिए – अहंकार का ताज ज्यादा देर तक सिर पर टिकता नहीं, गिरते ही चेहरा भी साथ ले डूबता है।

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