मर्यादा की सीमा लांघते मंत्री और मौन होती राजनीति"

संपादकीय 
19मई2025
 *"मर्यादा की सीमा लांघते मंत्री और मौन होती राजनीति"* 
लोकतंत्र की बुनियाद भाषा और आचरण की मर्यादाओं पर टिकी होती है, लेकिन आज भारतीय राजनीति में यह बुनियाद बार-बार हिलती दिखाई दे रही है। मंत्रियों और नेताओं की बदजुबानी अब एक अपवाद नहीं, बल्कि चलन बनती जा रही है। मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह का ताज़ा मामला इसका ताज़ा उदाहरण है, जिसमें उन्होंने भारतीय सेना की एक महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर जिस स्तर की भाषा का प्रयोग किया, उसे “गटर की भाषा” कहने से भी संकोच होता है। ऐसे वक्तव्य न केवल व्यक्तिगत मर्यादा का उल्लंघन हैं, बल्कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति अवमानना की श्रेणी में भी आते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 

यह घटना तब और गंभीर हो जाती है जब हम देखते हैं कि सेना जैसी संस्था, जो धर्म, जाति, भाषा और लिंग से ऊपर केवल ‘भारतीयता’ की भावना से कार्य करती है, उसके अधिकारी निशाने पर लिए जाते हैं — कभी मजहब के नाम पर, कभी राजनीतिक एजेंडे के तहत। क्या यह हमारी तथाकथित राष्ट्रवादी राजनीति का असली चेहरा है?

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती इस बात का संकेत है कि कानून की आंखें पूरी तरह बंद नहीं हैं। अदालतों ने न केवल ऐसे अपमानजनक वक्तव्यों का संज्ञान लिया, बल्कि यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों से गरिमा की अपेक्षा की जाती है। किंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मंत्री के खिलाफ प्राथमिकी भी तब दर्ज होती है जब अदालत अवमानना की चेतावनी देती है। क्या यह पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता नहीं दर्शाता?

राजनीति का उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन और विकास होना चाहिए, न कि समाज में ज़हर घोलना। विजय शाह का इतिहास यह दिखाता है कि बदजुबानी उनके राजनीतिक चरित्र का स्थायी हिस्सा रही है — चाहे वह विपक्ष के नेताओं पर अशोभनीय टिप्पणियां हों या फिर समाज के संवेदनशील वर्गों पर तंज। उनकी टिप्पणियों से ना केवल महिलाओं का, बल्कि लोकतंत्र की मूल आत्मा का भी अपमान हुआ है।

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव का यह जातिगत खुलासा कि सैन्य अधिकारी किस समुदाय से आते हैं, यह बताता है कि राजनीतिक फसल काटने के लिए नेता अब सेना को भी विभाजित करने की सोच रखने लगे हैं। यह देश की सबसे अनुशासित संस्था के लिए अपमानजनक है और नागरिकों के लिए चिंता का विषय।

यह समय है जब राजनीतिक दलों को खुद आत्ममंथन करना चाहिए। किसी भी नेता की लोकप्रियता, उसकी बदजुबानी से नहीं, बल्कि उसकी दूरदृष्टि, संवेदनशीलता और जनहित के कार्यों से तय होनी चाहिए। केवल चुनाव जीतना ही राजनीति नहीं है, बल्कि भाषा, व्यवहार और दृष्टिकोण से समाज को जोड़ने और उसका मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी होती है।

 यदि बदजुबानी को सत्ता का हथियार बनने दिया गया, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल होगी। यह वक्त है कि राजनीतिक दलों को ऐसे तत्वों को संरक्षण देने के बजाय सार्वजनिक जीवन से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। और अगर वे ऐसा नहीं करते, तो जनता को तय करना होगा कि लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा की क्या कीमत है।

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।