*संविधान की सर्वोच्चता: लोकतंत्र की त्रिस्तरीय आधारशिला का आत्ममंथन*

संपादकीय
दिनांक 21-05-2025 
 *संविधान की सर्वोच्चता: लोकतंत्र की त्रिस्तरीय आधारशिला का आत्ममंथन* 
भारतीय लोकतंत्र की नींव तीन प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिकी है। ये तीनों अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर राष्ट्र के संचालन में योगदान देते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई ने मुंबई में यह अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “यदि कोई सर्वोच्च है, तो वह है संविधान।” यह वक्तव्य केवल औपचारिक या प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि उस गंभीरता का संकेत है जो वर्तमान समय में लोकतंत्र की संस्थाओं के बीच संतुलन को लेकर आवश्यक हो चला है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

प्रधान न्यायाधीश की यह टिप्पणी इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि आज के परिप्रेक्ष्य में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव, विवाद और परस्पर अविश्वास की घटनाएं बढ़ रही हैं। इन संस्थाओं में मतभेद होना अस्वाभाविक नहीं, लेकिन जब यह मतभेद सार्वजनिक बहस, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और प्रशासनिक असंतुलन का कारण बनने लगे, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरे का संकेत है।

विधायिका की कार्यप्रणाली की बात करें तो संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही कई बार हंगामों और शून्य घंटों में ही समाप्त हो जाती है। नीतिगत बहसों का स्तर गिरता जा रहा है और कानून निर्माण की प्रक्रिया अक्सर अधूरी तैयारी और बहस के अभाव में संपन्न होती है। कार्यपालिका की बात करें तो भ्रष्टाचार, लापरवाही और जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता आम आलोचना के विषय हैं।

न्यायपालिका को लेकर जनता की उम्मीदें सबसे अधिक होती हैं, लेकिन वहां भी देरी से न्याय, निर्णयों में असंगतता और कोलेजियम व्यवस्था को लेकर असंतोष व्याप्त है। हालिया घटनाएं, जैसे तमिलनाडु में राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमाएं तय करने वाले फैसले या न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर उत्पन्न विवाद, न्यायपालिका की भूमिका पर गहन विमर्श की मांग करते हैं।

जब प्रधान न्यायाधीश संविधान की सर्वोच्चता को रेखांकित करते हैं, तो यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि तीनों स्तंभों के लिए आत्मचिंतन का आह्वान है। क्या विधायिका को अपने स्तर पर और अधिक उत्तरदायी नहीं होना चाहिए? क्या कार्यपालिका को जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं बढ़ानी चाहिए? क्या न्यायपालिका को अपनी सीमाओं का पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए?

संविधान की सर्वोच्चता केवल एक सैद्धांतिक धारणा नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रणाली है, जो तभी सशक्त रह सकती है जब तीनों स्तंभ अपनी-अपनी भूमिका निष्ठा, मर्यादा और परस्पर सम्मान के साथ निभाएं। इसलिए आवश्यक है कि तीनों संस्थाएं आत्ममंथन करें, अपने-अपने दोषों को स्वीकारें और संविधान के मूल्यों को सर्वोपरि मानते हुए समन्वय और संतुलन की दिशा में कार्य करें।
   लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं की परिपक्वता में है। और परिपक्वता का सबसे बड़ा परिचायक है—संविधान की सर्वोच्चता का सामूहिक सम्मान।

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