पंचायती राज में भ्रष्टाचार – रेवड़ी तंत्र बनाम जनकल्याण

संपादकीय: 
1 जून2025
 *पंचायती राज में भ्रष्टाचार – रेवड़ी तंत्र बनाम जनकल्याण* 
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें गांवों में बसे पंचायती राज संस्थानों तक फैली हुई हैं। इन्हें स्थानीय शासन की आत्मा कहा गया था, जहां जनभागीदारी से विकास की कल्पना की गई थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि यह प्रणाली अनेक स्थानों पर भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई है – एक ऐसी रेवड़ी व्यवस्था, जहां अधिकार वंचितों से छीनकर अपात्रों में बांटे जा रहे हैं और योजनाओं के नाम पर लूट की दुकान चल रही है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

केंद्र और राज्य सरकारें गांवों के विकास के लिए अनेक योजनाएं लाती हैं – जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, स्वच्छ भारत अभियान या जल जीवन मिशन। कागज़ों में यह योजनाएं समाज के सबसे निचले तबके तक राहत पहुंचाने का दावा करती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि फर्जीवाड़े, कमीशनखोरी और अपात्र लाभार्थियों की सूची बनाकर इन योजनाओं को “कमाई का जरिया” बना दिया गया है। आजकल देश में योजनाओं के नाम पर बंदरबांट की राजनीति हो रही है।
पंचायतें जनहित के बजाय गुटबाजी, सिफारिश और निजी लाभ का अड्डा बन चुकी हैं। जो पंचायत प्रतिनिधि सत्ता के करीब हैं, उन्हें ही फंड और योजनाओं का लाभ दिलवाया जाता है। बाकी जनता हाथ मलती रह जाती है। पात्र व्यक्ति लाइन में खड़ा है, पर रेवड़ी उन्हीं के हिस्से में है जिनकी जेबें पहले से भरी हुई हैं।

जनता की चुप्पी और मजबूरी कई सवाल उत्पन्न करती है।चौंकाने वाली बात यह है कि जिनके हिस्से में यह ‘रेवड़ी’ आ रही है, वे सत्ता का गीत गुनगुना रहे हैं। वहीं जिनके हाथ खाली हैं, वे “भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार” चिल्लाते घूम रहे हैं – लेकिन उनकी आवाज़ पंचायती गलियारों की दीवारों में गूंजकर दम तोड़ देती है। सूचना का अधिकार, शिकायत पोर्टल, ऑडिट और जांच समितियां सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।

देश में व्याप्त करप्शन पर आम जनता सुधार की आवश्यकता महसूस करें और अमल में लाकर विचार करें। क्योंकि अब समय आ गया है कि पंचायती राज की इस जर्जर होती व्यवस्था में गहरी सर्जरी की जाए:

1. पारदर्शिता: सभी योजनाओं की जानकारी ग्राम सभा में सार्वजनिक की जाए। लाभार्थियों की सूची ऑनलाइन और पंचायत भवन में चस्पा होनी चाहिए।
2. उत्तरदायित्व: पंचायत प्रतिनिधियों की संपत्ति की वार्षिक जांच अनिवार्य की जाए।
3. जन भागीदारी: सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) को अनिवार्य और प्रभावशाली बनाया जाए।

4. सख्त दंड: भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर तत्काल निलंबन और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया हो।

वास्तव में पंचायती राज अगर लोकतंत्र की नींव है, तो यह नींव खोखली हो चुकी है। जब तक इस व्यवस्था में से भ्रष्टाचार का दीमक नहीं निकाला जाएगा, तब तक कोई भी विकास योजना केवल दिखावे की होगी। यह जनता का धन है, जनता का अधिकार है – इसे लूट की दुकान नहीं बनने दिया जा सकता। “रेवड़ी संस्कृति” को समाप्त कर “उत्तरदायी शासन” की ओर बढ़ना समय की मांग है।
पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र की वह नींव है जिस पर देश की ग्रामीण प्रगति की पूरी इमारत खड़ी होती है। इसे जनहित और जनभागीदारी की सबसे प्रभावशाली प्रणाली माना गया था, जहां गांव का आम नागरिक अपनी जरूरतों और समस्याओं को सीधे उठाकर उनके समाधान में सहभागी बन सके। लेकिन आज, यह व्यवस्था एक बीमार ढांचे में तब्दील हो चुकी है, जहां नीयत कमजोर है, प्रणाली अपारदर्शी है और ईमानदारी विलुप्तप्राय स्थिति में है।
गांवों में विकास योजनाओं का हाल यह है कि कागजों पर सब कुछ होता है – सड़कें बनती हैं, शौचालय तैयार होते हैं, आवास बन जाते हैं – लेकिन हकीकत यह है कि बहुत कुछ सिर्फ कागज़ों में ही रह जाता है। मनरेगा जैसी ऐतिहासिक योजना में हजारों “भूतिया मजदूर” दिखाए जाते हैं, जिन्हें कभी काम पर देखा ही नहीं गया। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के घरों की सूची में उन्हीं लोगों के नाम होते हैं जो पहले से संपन्न हैं, जबकि जिनके सिर पर छत नहीं, वे सूची में नाम ढूंढते रह जाते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो भ्रष्टाचार कर रहे हैं, वे अपने किए पर शर्मिंदा नहीं हैं, बल्कि गर्व से उसे अपनी “राजनीतिक कुशलता” बता रहे हैं। पंचायतों में रेवड़ी संस्कृति चरम पर है – योजनाओं का लाभ अपनों में बांटा जा रहा है, पद और प्रभाव की बंदरबांट हो रही है। जिनके हाथ रेवड़ी लगती है, वे सत्ता के गीत गाते हैं; और जिनके हाथ खाली रह जाते हैं, वे “भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार” चिल्लाते हुए न्याय की भीख मांगते हैं। लेकिन न्याय की कुर्सी तक उनकी आवाज़ पहुंच ही नहीं पाती।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है – क्या हम पंचायतों को केवल सत्ता का सीढ़ी बनाना चाहते हैं, या सच में ग्रामीण भारत को सशक्त बनाना चाहते हैं? यदि जवाब उत्तरार्द्ध है, तो फिर इस व्यवस्था को जड़ से सुधारने की आवश्यकता है। ग्राम सभाएं केवल औपचारिकता न बनें, उन्हें निर्णय का असली मंच बनाया जाए। लाभार्थियों की सूची डिजिटल और सार्वजनिक हो, फर्जीवाड़े की हर कोशिश पर कानूनी हथौड़ा चले। पंचायत प्रतिनिधियों की संपत्ति की नियमित जांच हो और जवाबदेही तय की जाए।
यह मत भूलिए, जब नींव ही खोखली हो जाए, तो महलों की मजबूती भ्रम साबित होती है। यदि हम सच में लोकतंत्र को ज़मीन तक मजबूत करना चाहते हैं, तो पंचायती राज को भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना ही होगा। गांवों का विकास सिर्फ सड़क और भवनों से नहीं होता – वह तब होता है जब एक गरीब को उसका हक, बिना सिफारिश और रिश्वत के, समय पर मिल जाए। यही सच्चा लोकतंत्र है, और यही असली विकास।

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