सच्ची खूबसूरती: आईने में नहीं, अंतःकरण में बसती है

संपादकीय
28मई 2025

 *"सच्ची खूबसूरती: आईने में नहीं, अंतःकरण में बसती है"* 
इस तेज़ी से भागती दुनिया में जहाँ सौंदर्य का अर्थ अधिकतर चमकते चेहरे, दमकती त्वचा और सजे-संवरे शरीर से लगाया जाता है, वहीं कुछ लोग आज भी यह मानते हैं कि खूबसूरती की परिभाषा इससे कहीं गहरी, कहीं सच्ची और कहीं स्थायी होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज के दौर में सोशल मीडिया, फैशन इंडस्ट्री और ग्लैमर की चकाचौंध ने सुंदरता को बाज़ारू बना दिया है। चेहरे की रेखाओं, त्वचा के रंग और शरीर की बनावट को खूबसूरती का पैमाना बना दिया गया है। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि जिस शरीर को आज सुंदर मान कर सर-आँखों पर बिठाया जाता है, वही शरीर मृत्यु के बाद घर में भी नहीं रखा जाता? उसे अग्नि को सौंप दिया जाता है। क्यों? क्योंकि सच्चाई यही है कि असली सुंदरता उस शरीर में नहीं होती, बल्कि उस शरीर में बसी आत्मा, उसके संस्कार, उसकी सोच, उसका व्यवहार और उसके कर्म ही किसी इंसान को सुंदर बनाते हैं।

जिस तरह एक वृक्ष की सुंदरता उसके पत्तों और फूलों से होती है, परंतु उसकी असली मजबूती उसकी जड़ों में होती है, उसी प्रकार मनुष्य की सच्ची खूबसूरती भी उसके विचारों और व्यवहार में छिपी होती है। एक मीठी मुस्कान, एक सहायक हाथ, एक करुणा से भरा दिल, एक सच्चा शब्द – यही वो आभूषण हैं जो इंसान को भीतर से सुंदर बनाते हैं।

कबीरदास जी ने भी यही सत्य उजागर किया –
"नहाए धोए क्या हुआ, जब मन मैल न जाए।
मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।"

इस दोहे के माध्यम से संत कबीर स्पष्ट करते हैं कि बाहरी शुद्धता तब तक व्यर्थ है जब तक मन के विकार न हटें। मछली पूरे जीवन जल में रहती है, फिर भी उसमें से दुर्गंध आती है। उसी तरह इंसान चाहे जितना सजा-संवरे, जब तक उसका अंतर्मन स्वच्छ नहीं होगा, तब तक वह सुंदर नहीं कहा जा सकता।

आज के समाज को ज़रूरत है उस दृष्टिकोण को बदलने की, जहाँ सुंदरता केवल बाहरी रूप-रंग में देखी जाती है। हमें यह समझना होगा कि आत्मविश्वास, दया, विनम्रता और सकारात्मक सोच – ये ऐसे आभूषण हैं जो न तो फीके पड़ते हैं और न ही समय के साथ पुरातन होते हैं।

यह  सिर्फ सुंदरता की पुनर्परिभाषा भर नहीं है, यह एक पुकार है उस भीतरी सौंदर्य की ओर लौटने की, जो आत्मा की गहराई में बसी होती है। दुनिया को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को सजाने के लिए सुंदर बनिए – विचारों से, कर्मों से और व्यवहार से।

अंततः यही कहा जा सकता है –
"चेहरे की रौनक तो वक्त के साथ ढल जाती है,
पर मन की सुंदरता उम्र भर महकती रहती है।"
अगर अगली बार आप किसी को "खूबसूरत" कहें, तो एक बार उनके स्वभाव और विचारों को भी देखकर कहें, क्योंकि असली सौंदर्य चेहरे पर नहीं, दिल और सोच में बसता है।

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