शिक्षा का दीप: ज्ञान से जीवन तक की यात्रा
संपादकीय
29 मई 2025
*"शिक्षा का दीप: ज्ञान से जीवन तक की यात्रा"*
शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह केवल डिग्री या परीक्षा उत्तीर्ण करने की प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाली शक्ति है। जिस प्रकार दीपक अंधकार में प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार शिक्षा जीवन की अज्ञानता, भ्रम और कुंठाओं का नाश करती है। बौद्ध ग्रंथ महापरिनिर्वाण सुत्त में तथागत बुद्ध ने कहा था – "अप्पो दीपो भव", अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस समय था। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली और परीक्षा परिणामों पर चिंता व्यक्त करें तो वर्तमान समय में शिक्षा का स्वरूप कई बदलावों के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में बोर्ड परीक्षाओं में आए कुछ चौंकाने वाले परिणामों ने शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन पद्धति को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। आज कई छात्र 95% से ऊपर अंक प्राप्त कर रहे हैं, फिर भी उनमें आत्मविश्वास, संप्रेषण क्षमता, नैतिक मूल्यों और व्यावहारिक ज्ञान की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
शिक्षा आज अधिकतर एक अंकों की दौड़ बन गई है। विद्यार्थियों को रट्टा मारने और परीक्षा पास करने की मशीन के रूप में ढाला जा रहा है। जबकि शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तीर्ण होना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संस्कार, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है। यदि छात्र अंकों के पीछे भागते-भागते मानवीय गुणों से ही वंचित हो जाएं, तो यह व्यवस्था एक खोखली इमारत की तरह हो जाती है।
शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसमें संस्कारों का समावेश आवश्यक है। आज के युवा यदि आत्मकेन्द्रित, अधीर और संवेदनहीन हो रहे हैं तो हमें यह सोचने की जरूरत है कि क्या हमने उन्हें केवल किताबी ज्ञान देकर शिक्षा दी, या जीवन के लिए तैयार किया?
संस्कारों के बिना शिक्षा ऐसी है जैसे बिना सुगंध के फूल। विद्यार्थियों में सम्मान, सहनशीलता, सेवा-भाव, और आत्म-अनुशासन जैसे गुणों का विकास ही उन्हें भविष्य में एक अच्छा नागरिक और सच्चा मानव बनाता है।
आज की युवा पीढ़ी अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव, और डिजिटल दुनिया की आभासी चमक के बीच भटक रही है। उन्हें ऐसे शिक्षकों, अभिभावकों और मार्गदर्शकों की ज़रूरत है जो न केवल पाठ्यक्रम पढ़ाएं, बल्कि जीवन के पाठ भी सिखाएं।
उन्हें यह समझाना जरूरी है कि
हर असफलता अंत नहीं होती, बल्कि सीखने का अवसर होती है। हर उच्च अंक सफलता की गारंटी नहीं होते। जीवन में संतुलन, अनुशासन और उद्देश्य होना सबसे बड़ा मूल्य है। कुछ समाधान की दिशा में कदम
1. शिक्षा में नैतिक मूल्यों का समावेश: पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, ध्यान, योग, सेवा कार्यों को नियमित स्थान मिलना चाहिए।
2. मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव: केवल अंक आधारित नहीं, बल्कि आचरण, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल, और समस्या समाधान को भी आंकना चाहिए।
3. अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका: बच्चों को नंबरों की मशीन नहीं बनाएं, उन्हें आत्मनिर्भर, संवेदनशील और जागरूक नागरिक बनने दें।
4. प्रेरणा आधारित शिक्षण: बच्चों को प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवन कहानियों से जोड़ें – जैसे डॉ. भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, और तथागत बुद्ध।
आज जब समाज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, तब शिक्षा को केवल अंकों और डिग्रियों की कैद से निकालकर उसे संस्कारों, आत्मज्ञान और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम बनाना होगा।
हर विद्यार्थी को चाहिए कि वह केवल परीक्षा में पास होने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों को स्वीकार कर अपने भीतर एक दीपक जलाने के लिए पढ़े –
"ज्ञान का वह दीप जो न केवल स्वयं को रोशन करे, बल्कि समाज और राष्ट्र को भी आलोकित करे।"
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