चांदी की गाय- "गोदान या दिखावा : धर्म के नाम पर लूटा जा रहा गाय का निवाला"
संपादकीय
27 मई 2025
*"गोदान या दिखावा : धर्म के नाम पर लूटा जा रहा गाय का निवाला"*
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे जन्म से मृत्यु तक जीवन के हर पड़ाव पर धर्म से जुड़ी किसी न किसी परंपरा में लिपटी मिलती हैं। इन परंपराओं का उद्देश्य आत्मा की शांति, समाज की सद्भावना और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता रहा है। लेकिन जब धर्म व्यापार बन जाए, परंपरा प्रदर्शन बन जाए और आस्था अवसरवादियों का औजार बन जाए, तब केवल परंपराएं ही नहीं, संवेदनाएं भी घायल होती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
ऐसी ही एक संवेदनशील परंपरा है — गोदान। मृत्यु के बाद ब्रह्मपुरी या पिंडदान से पहले गोदान की परंपरा को धार्मिक शास्त्रों में महत्वपूर्ण माना गया है। इसका उद्देश्य मृतक आत्मा को मोक्ष दिलाने के साथ-साथ गाय जैसे पूजनीय प्राणी के कल्याण में योगदान देना रहा है। लेकिन आज यह परंपरा अपने मूल भाव से भटक गई है।
पंडितजन गोदान के नाम पर चांदी की गाय, बाल्टी, रस्सी, पानी का पात्र, चारा आदि दान स्वरूप मांगते हैं। लेकिन यह पूरा आयोजन एक दिखावे की रस्म बनकर रह गया है। न वह गाय कहीं दिखती है, न उसका भोजन, और न ही उसका संरक्षण। चांदी की गाय संदूक में बंद हो जाती है और असली गाय सड़कों पर भूखी-प्यासी भटकती रहती है — कचरा खाती, बीमारियों से ग्रसित, कभी किसी वाहन से कुचली जाती तो कभी क्रूरता की शिकार बनती।
यह कैसा गोदान है? यह कैसा धर्म है? यह कैसी श्रद्धांजलि है?
जब धर्म किसी का निवाला छीन ले, तो वह धर्म नहीं, धंधा होता है। और जब समाज इस धंधे में मौन भागीदार बन जाए, तो वह धर्मांधता नहीं, दोगलापन है।
क्या हम गोदान के नाम पर मृत आत्मा को शांति दे रहे हैं, या उसके नाम पर किसी जीवित गाय को भूख और कष्ट की ओर धकेल रहे हैं?
गौमाता के नाम पर राजनीति करने वाले हों या अनुष्ठानों के नाम पर चांदी की गाय की मांग करने वाले — दोनों ही उस गोमाता के गुनहगार हैं, जो हमारी आस्था की प्रतीक है। यह विडंबना है कि हम गाय को माता तो कहते हैं, लेकिन उसकी भूख-प्यास की चिंता करना भूल जाते हैं।
समाधान क्या है?
गोदान की परंपरा को केवल प्रतीकात्मक न बनाकर वास्तविक सेवा से जोड़ना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति गोदान करना चाहता है, तो वह किसी गौशाला में चारा दान करे, किसी घायल गाय के इलाज के लिए सहयोग करे, या किसी लावारिस गाय को आश्रय दिलाए। यही होगा सच्चा गोदान, यही होगा धर्म का न्याय, यही होगी आत्मा को सच्ची श्रद्धांजलि।
आज जरूरत है धर्म को पुनः जाग्रत करने की, दिखावे से मुक्त कर कर्म से जोड़ने की। हमें इस दोहरे चरित्र से बाहर आकर गाय के सम्मान को केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाना होगा।
गोदान का पुनर्परिभाषित होना ही धर्म का पुनर्जन्म होगा।
Comments
Post a Comment